छत्तीसगढ़ एवं ओड़िसा की साझा संस्कृति में एक त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है, जिसका नाम है  नुआखाई, इसे वैदिक काल में नवान्न ग्रहण पर्व भी कहा जाता था। सम्बलपुरी भाषा में नुआ का अर्थ है नया और खाई का अर्थ है खाना, यानी नए अन्न का पहला ग्रहण। यह पर्व गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन मनाया जाता है, संबलपुर, बोलांगीर, कालाहांडी, बरगढ़ और सुबरनपुर सहित पूरे पश्चिमी ओडिशा में तथा सीमावर्ती छत्तीसगढ़ के, सराईपाली, पिथौरा, गरियाबंद, महासमुंद, रायगढ़ और बस्तर संभाग के कुछ जिलों में भी यह पर्व उसी उत्साह से मनाया जाता है। नुआखाई केवल एक भोज नहीं, बल्कि खेत, देवालय, रसोई और परिवार को एक ही धागे में पिरोने वाला उत्सव है, जिसमें किसान की मेहनत, प्रकृति का उपहार और परिवार का स्नेह तीनों एक साथ जुड़ते हैं।

पर्व का एक और रोचक पक्ष यह है कि पुराने समय में राजा या जमींदार को ही सबसे पहले नई फसल भेंट करने की प्रथा थी, राजा स्वयं देवी को अन्न अर्पित करने के बाद ही प्रजा को नई फसल काटने और उपयोग करने की अनुमति देते थे। रियासतों के विलय के बाद यह भूमिका स्थानीय मंदिरों और सामुदायिक नेतृत्व ने संभाल ली, परंतु मूल भावना आज भी अक्षुण्ण है, व्यक्ति से पहले समाज और समाज से पहले देवत्व का सम्मान।

नुआखाई की मौखिक परंपरा को इतिहासकार बारहवीं शताब्दी तक पीछे ले जाते हैं, जब पाटनागढ़ के चौहान राजा रमई देव ने इस पर्व को राजसी संरक्षण देकर इसे संगठित रूप दिया। परंतु इसकी जड़ें उससे भी प्राचीन हैं, पश्चिमी ओडिशा के जनजातीय समुदाय सदियों से नई फसल आने पर प्रकृति और पूर्वजों को धन्यवाद देने की परंपरा निभाते रहे हैं। समय के साथ जो पर्व राजदरबार की शोभा बना, वही आगे चलकर आम किसान के आँगन तक पहुँचा और समूचे पश्चिमी ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन गया। आज नुआखाई को सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक माना जाता है, और प्रवासी उड़िया समुदाय इसे देश विदेश में भी उसी श्रद्धा से मनाते हैं।

गाँवों में एक और परंपरा भी जुड़ी हुई है, नुआखाई से पहले कोई भी किसान परिवार खेत से नई फसल का एक दाना भी अपने उपयोग के लिए नहीं काटता, चाहे घर में अन्न कितना भी कम क्यों न बचा हो। यह संयम आर्थिक दृष्टि से कठिन जरूर लगता है, परंतु सामाजिक दृष्टि से यह पूरे समुदाय को एक साथ एक ही दिन कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए बाँधे रखता है, कोई परिवार अकेले जल्दबाजी में नुआखाई नहीं मनाता, बल्कि सब मिलकर एक साथ ही प्रकृति प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

नुआखाई की जड़ें वर्षा ऋतु की उसी लय में बसी हैं, जिसमें भादों के महीने तक खेतों में धान की बालियाँ पकने लगती हैं। पर्व से पहले किसान परिवार अपने खेत से धान की कुछ बालियाँ लाकर घर में रखते हैं, और नुआखाई के दिन सबसे पहला भोग संबलपुर की अधिष्ठात्री देवी समलेश्वरी को अर्पित किया जाता है। मुख्य पुजारी देवी को नए अन्न से बना नैवेद्य चढ़ाते हैं, उसके बाद ही यह प्रसाद श्रद्धालुओं में बाँटा जाता है। इसी क्रम में घर घर में कुलदेवता और लक्ष्मी माता की पूजा होती है, इसके पश्चात ही परिवार का कोई भी सदस्य नए चावल का कौर मुँह में लेता है। यह क्रम इस भावना का प्रतीक है कि धरती की पहली उपज मनुष्य के भोग से पहले प्रकृति और परमात्मा दोनों की भेंट है, मनुष्य तो उसका भोक्ता बाद में बनता है। खेत में उगे अन्न को सीधे उदरस्थ करने के बजाय पहले देवालय ले जाना, दरअसल कृतज्ञता को अनुष्ठान का रूप देने की वही प्राचीन सोच है जो भारत के लगभग हर कृषि प्रधान समाज में किसी न किसी रूप में मौजूद रही है।

ओड़िसा में नुआखाई अकेले एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि कई दिनों पहले से आरंभ होने वाली अनुष्ठानों की शृंखला है, जिसे स्थानीय भाषा में नुआखाई के नौ रंग कहा जाता है। इसका आरंभ बेहेरेन से होता है, जिसमें गाँव का पुरोहित या मुखिया पर्व की तिथि की औपचारिक घोषणा करता है। इसके बाद लग्न देखा में ज्योतिषी शुभ मुहूर्त तय करते हैं, ताकि देवी को अन्न अर्पित करने का क्षण सर्वोत्तम हो। डाका हाका के अंतर्गत परिवार अपने रिश्तेदारों और समुदाय को उत्सव में सम्मिलित होने का निमंत्रण भेजते हैं, जबकि सफा सुतुरा और लिपा पुछा के दौरान घरों की साफ सफाई और परंपरागत ढंग से लिपाई पुताई की जाती है। घिना बीका में उत्सव के लिए आवश्यक वस्त्र, बर्तन और सामग्री की खरीदारी होती है। इन तैयारियों के बाद मुख्य दिन देवी को नए अन्न का भोग लगाया जाता है, फिर परिवार में नवान्नभोज होता है, और अंत में नुआखाई भेटघाट की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें छोटे बड़ों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेते हैं। यह सुव्यवस्थित क्रम दिखाता है कि पश्चिमी ओडिशा के समाज ने कृतज्ञता के भाव को भी कितनी बारीकी से एक सामाजिक अनुशासन में ढाल दिया है।

नुआखाई का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामाजिक होना है। पूजा और भोज के बाद दोपहर से नुआखाई भेटघाट का सिलसिला शुरू होता है, जिसमें परिवार का हर छोटा सदस्य अपने से बड़े बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेता है, और बड़े उन्हें सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। इस अभिवादन को नुआखाई जुहार कहा जाता है, और यह केवल परिवार तक सीमित नहीं रहता, पड़ोसी, मित्र और यहाँ तक कि वर्षभर के मनमुटाव रखने वाले लोग भी इस दिन एक दूसरे से मिलकर संबंध सुधारने की पहल करते हैं। शाम होते ही गाँव और मोहल्लों के सामुदायिक भवनों में सांस्कृतिक कार्यक्रम सजते हैं, जहाँ रासकेली, दलखाई, मैलाजाड़ा और साजनी जैसे पारंपरिक लोक नृत्य तथा संबलपुरी लोकगीत प्रस्तुत किए जाते हैं। इस तरह एक कृषि पर्व केवल खेत और रसोई तक सीमित न रहकर पूरे समाज को एक लय में बाँधने वाला उत्सव बन जाता है।

शहरीकरण और प्रवासन के इस दौर में नुआखाई भेटघाट का महत्व और भी बढ़ गया है। संबलपुर, बोलांगीर और उसके आसपास के जिलों से रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में गए लाखों लोग इस पर्व पर अपने गाँव लौटने का प्रयास करते हैं, और जो लौट नहीं पाते, वे फोन और वीडियो कॉल के माध्यम से ही सही, अपने बड़ों से आशीर्वाद अवश्य लेते हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और यहाँ तक कि विदेश में बसे उड़िया समुदाय भी अपने प्रवास स्थल पर छोटे स्तर पर ही सही, नुआखाई अवश्य मनाते हैं, जिससे यह पर्व भौगोलिक दूरी को पाटकर सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का माध्यम बन गया है।

नुआखाई की गहराई में उतरें तो यह पर्व चार भिन्न आयामों, पर्व, कृषि, प्रकृति और आध्यात्मिकता को बड़ी सहजता से एक साथ पिरो देता है। कृषि इसका शरीर है, क्योंकि पूरा अनुष्ठान धान पकने के ठीक उसी क्षण के इर्द गिर्द बुना गया है, प्रकृति इसकी आत्मा है, क्योंकि यह पर्व मनुष्य को स्मरण कराता है कि अन्न किसी कारखाने की उपज नहीं बल्कि मिट्टी, वर्षा और सूर्य के सम्मिलित उपहार का परिणाम है, आध्यात्मिकता इसकी चेतना है, क्योंकि देवी को प्रथम भोग अर्पित करने का भाव मनुष्य के अहंकार को विनम्र बनाता है, और पर्व स्वयं इसका सामाजिक रूप है, जो इस कृतज्ञता को उत्सव और मिलन में बदल देता है।

पहली उपज को सीधे उपभोग में न लाकर पहले देव को अर्पित करने की यह प्रथा एक सूक्ष्म पारिस्थितिक संयम भी सिखाती है, यह मनुष्य को यह सोचने पर विवश करती है कि प्रकृति के संसाधनों पर सबसे पहला अधिकार उसका अपना नहीं, बल्कि उस समूची सृष्टि व्यवस्था का है जिसका वह स्वयं एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। आज जब खेती मशीनों और बाजार में सिमटती जा रही है, नुआखाई जैसा पर्व यह याद दिलाता है कि अन्न के हर दाने के उपभोग के लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता एवं धन्यवाद व्यक्त करना चाहिए।

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