देश में जेन जी और उसके मनोविज्ञान पर खूब बहस हो रही है। जिस आयु वर्ग को जेन जी कहा जा रहा है, उसका आँकड़ा करीब 40 करोड़ है। जेन जी यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी। अलग-अलग अध्ययन और सरकारी रिपोर्ट बता रहे हैं कि भारत में केवल शिक्षा और रोजगार ही जेन जी की सबसे बड़ी समस्या नहीं है।

नशे की लत, प्रभाव और इससे जुड़ा मानसिक संत्रास इस पीढ़ी के साथ ही समानांतर रूप से भारतीय समाज-जीवन के सामने खड़ा हो चुका है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हाल ही में सम्पन्न अखिल भारतीय समन्वय बैठक में युवाओं के मध्य नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर गंभीर चिंतन हुआ है और इस समस्या से निपटने के लिए समाज के प्रबोधन और सामुदायिक प्रयास पर जोर दिया गया है।केंद्र सरकार ने भी नक्सल मुक्त भारत अभियान के बाद नशा मुक्त भारत अभियान की शुरुआत कर दी है। असल में 40 करोड़ जेन जी के डेमोग्राफिक लाभांश का सपना तभी साकार हो सकता है, जब हमारे युवा अपनी प्रतिभा और कौशल का पूर्ण उपयोग अपने समाज के लिए सुनिश्चित कर पाएँगे। नशे की बढ़ती त्रासदी ने इस सपने को बड़ी चुनौती दे दी है।

वस्तुतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस भावी सामाजिक चुनौती को देख पा रहा है, उसका समाधान किसी सरकार, सख्त कानून या दंड के प्रावधानों से संभव ही नहीं है। इसलिए संघ ने समाज के सामूहिक प्रयासों को अधिमान्यता दी है।

यह सही है कि केंद्र सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाकर देश से नक्सलवाद को समाप्त कर दिखाया है, लेकिन नशा मुक्त भारत किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में आम और खास का विभेद भुलाकर समग्रता के साथ युवा तन-मन को अपनी चपेट में ले रहा है।

जाहिर है, जेन जी के शोर में अगर स्कूल, कॉलेज, स्किल, रोजगार, प्रशिक्षण की बात हो रही है, तो नशे से मुक्ति और उससे स्वाभाविक दूरी की चर्चा शुरू करने का समय भी आ गया है। आधुनिकता और उन्नत होते जीवनस्तर के साथ नशे की समानांतर मौजूदगी हमारे विकसित भारत के सपने को भी चुनौती दे रही है। जिस तेजी और सर्वव्यापकता के साथ नशा भारतीय समाज को घेर रहा है, वह भविष्य के भारत की अवश्यंभावी उजली संभावनाओं को अभी से विद्रूप करता दिख रहा है।

हर पाँचवाँ बच्चा जोखिम में है…!

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल लैंसेट की एक रिपोर्ट, "Substance Use Risk Among School-Going Adolescents in India 2026", कहती है कि भारत का हर पाँचवाँ किशोर मध्यम से उच्च स्तर के नशे के जोखिम में है। लैंसेट का कहना है कि लड़कियों में जोखिम का असर लड़कों से ज्यादा है। यह रिपोर्ट बताती है कि नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता ने जोखिम को 75 प्रतिशत और उच्च डिजिटल एक्सपोजर (यानी स्मार्टफोन) ने भारत में 49 प्रतिशत किशोर आबादी को नशे के जोखिम से जोड़ दिया है।

एम्स, नई दिल्ली ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के साथ किए एक संयुक्त अध्ययन में बताया है कि भारत में हर सातवें स्कूली छात्र ने कम से कम एक बार नशे का स्वाद ले लिया है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019-21) के आँकड़े सार्वजनिक हैं, जो बताते हैं कि 15 से 24 साल की आयु-वर्ग में 10.9 प्रतिशत युवा सीधे नशे के शिकार हैं।

एम्स ने एनडीडीटीसी के साथ डॉ. अंजू धवन के नेतृत्व में किए अध्ययन में इस बात का अनुमान दिया है कि करीब 32 प्रतिशत भारतीय युवा पारिवारिक-सामाजिक परिस्थितियों में नशे की दहलीज पर हैं।

जाहिर है, समस्या सरकार से कहीं बड़ी परिवार और परवरिश पर खड़ी है। क्या आधुनिकता और सम्पन्नता हम पीढ़ियों की कीमत पर तो नहीं खड़ी कर रहे हैं?

हमें यह जानकर आश्चर्य होगा कि दुनिया में 2014 से 2024 के बीच कैनबिस यानी चरस, गाँजा, अफीम, ड्रग्स की खपत 40 प्रतिशत बढ़ी है और यह खपत उत्तरी अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड के साथ भारत में भी सर्वाधिक तेजी से बढ़ रही है।

थिंक टैंक न्यू इंडिया ने दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, मैसूर, इंदौर, रायपुर, नोएडा, गुरुग्राम समेत 26 बड़े शहरों में किए अध्ययन में बताया है कि जिन प्राइवेट स्कूलों की सालाना फीस दो लाख या उससे ऊपर है, उनके कैंपस में नशे की संभावना कस्बाई, मझौले शहरों की तुलना में 76 प्रतिशत अधिक पाई गई है। यानी जिस उच्च और महँगी जीवनशैली को हम आधुनिक भारत कह रहे हैं, उसकी नींव हम कहीं नशे के गारे से तो नहीं खड़ी कर रहे हैं? यह आत्मावलोकन का पड़ाव है।

थिंक एलोन संस्थान ने नोएडा, फरीदाबाद, गुड़गाँव, इंदौर, जालंधर, चंडीगढ़, चेन्नई स्थित प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालयों के कैंपस-केंद्रित एक अध्ययन में इस बात पर चिंता जताई है कि सरकारी यूनिवर्सिटी की तुलना में निजी कैंपस तेजी से नशे के केंद्र बनते जा रहे हैं। इस अध्ययन ने लैंसेट के उस तथ्य की भी पुष्टि की है, जिसमें स्कूली लड़कियों में जोखिम को बड़ी चिंता बताया गया है। प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में नशे से दोस्ती करने वाली लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा पीछे नहीं है।

ब्रिटेन और फ्रांस बराबर जेन जी बेकार बैठे हैं…!

नीति आयोग ने पिछले सप्ताह “री-इमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत” रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार 15 से 29 साल के 8.7 करोड़ जेन जी इस समय न तो शिक्षा या ट्रेनिंग ले रहे हैं, न उनके पास कोई रोजगार है। नीति आयोग इन्हें नीट श्रेणी में रखता है, यानी नॉट इन एजुकेशन, एम्प्लॉयमेंट, ट्रेनिंग (NEET)।

यह सरकारी आँकड़ा असल में सरकार के लिए नीतिगत अलर्ट है। बेशक, सरकारों ने स्किल इंडिया से लेकर तमाम अभियानों और योजनाओं की शुरुआत की है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि योजनाओं के केवल नाम बदले हैं, उनकी मेथडोलॉजी नहीं और न ही मशीनरी की मानसिकता। नीट की यह संख्या जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की आबादी से अधिक है। यानी एक बड़ा वर्कफोर्स या तो घर बैठा है या ऐसे कामों में ऊर्जा खपा रहा है, जिसकी उत्पादकता का मूल्यांकन ही नहीं है।

पिछले स्वतंत्रता दिवस पर कॉरपोरेट घरानों के साथ एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप कराने की घोषणा हुई थी, लेकिन जमीन पर इसके कोई अवशेष नहीं हैं। मप्र में 2023 में एकमुश्त स्टाइपेंड देकर ऐसी ही ट्रेनिंग शुरू हुई, लेकिन कुछ सैकड़ा संख्या के बाद योजना लापता हो गई।

कैरियर काउंसलर श्रीमती रक्षा दुबे कहती हैं कि इस बड़ी युवा आबादी को भावनात्मक रूप से सतर्कतापूर्वक हैंडल करने की जरूरत है। असल में जिस नशा मुक्त भारत के संकल्प को साकार करने की बात हो रही है, उसके साथ नीति आयोग का नीट वाला आँकड़ा सह-संबद्ध ही है। इसलिए नीतिगत स्तर पर सभी सरकारों को इस नीट समुदाय के सुप्त कौशल पर विचार करना ही होगा।

ध्यान देने वाला तथ्य यह है कि भारत में जेन जी की संख्या जहाँ 40 करोड़ है, वहीं चीन में इस आयु-वर्ग की संख्या केवल 25 करोड़, अमेरिका में 7.2 करोड़ और पूरे यूरोप में मिलाकर 12 करोड़ है। इन आँकड़ों को अगर नीतिगत आधार पर जवाबदेही और सामाजिक वातावरण के साथ संयुक्त कर दिया जाए, तो भारत के भविष्य की सुनहरी तस्वीर को हम आसानी से देख सकते हैं।

शराब पीने में तीसरा बड़ा देश भारत…

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश में नशे की चुनौती से निपटने के लिए सरकारों से अलग जिस सामाजिक चेतना और पारिवारिक प्रबोधन पर जोर दे रहा है, वह बहुत ही सुचिंतित और व्यवहारिक समाधान है। असल में सरकारों के लिए शराब राजस्व का एक बड़ा और सबसे सरल स्रोत है। देश में सालाना 5.5 लाख करोड़ का कारोबार अकेले शराब का दर्ज हो रहा है।

- रेटिंग्स एजेंसी क्रिसिल के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025-26 में शराब की बिक्री 10 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है।

- देश में पिछले दो साल में शराब की उत्पादन क्षमता 15 से 20 प्रतिशत बढ़ी है।

- 2024 में करीब 12 अरब लीटर अल्कोहल का सेवन भारत में किया गया।

- अमेरिका, चीन के बाद भारत ऐसा देश है, जहाँ सर्वाधिक शराब का उपभोग किया जा रहा है। इस मामले में हम इंग्लैंड को पीछे छोड़ चुके हैं।

- ड्रग्स के ओवरडोज से सर्वाधिक मौतें वर्ष 2024 में तमिलनाडु, पंजाब के बाद मप्र में दर्ज की गई हैं।

- देश में सर्वाधिक शराब पीने के मामले में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, मप्र के साथ छत्तीसगढ़ का नाम भी शामिल है।

नशीली जमीन पर इंदौर की उजली तस्वीर…?

मध्य प्रदेश में इंदौर, भोपाल, उज्जैन, जबलपुर; छत्तीसगढ़ में रायपुर, बिलासपुर; उत्तर प्रदेश में नोएडा, लखनऊ, कानपुर, मेरठ, आगरा जैसे शहर नशे की राजधानी बन गए हैं। मप्र के आलीराजपुर, झाबुआ, डिंडोरी, खरगोन, खंडवा, धार; छत्तीसगढ़ में जशपुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा, कवर्धा, सरगुजा जैसे जनजातीय जिले तेजी से शराब और दूसरे नशे के हॉटस्पॉट के रूप में चिन्हित किए जा चुके हैं।

मप्र में इंदौर सर्वाधिक शराब खपत वाला जिला बन गया है। साल 2025-26 के लिए अकेले इंदौर से मप्र सरकार को 1701.91 करोड़ की कमाई हुई है। इसी तरह भोपाल ने 1159.31, जबलपुर ने 826, ग्वालियर ने 659 और उज्जैन ने 629 करोड़ की राशि सरकार के खजाने में जमा की है।

इन आँकड़ों को केवल यहीं तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि शराब का यह कारोबार जितना एक नंबर में नजर आता है, उससे दोगुना दो नंबर यानी बिना टैक्स के होता है। यानी इंदौर में अगर सालाना 1700 करोड़ का विनियमित कारोबार आँकड़ों में है, तो इसे करीब 4000 करोड़ का नेक्सस समझा जाना चाहिए।

सवाल यह कि इतने बड़े कारोबार के ग्राहक कौन हैं? करीब दो दशक पहले दो प्रमुख वर्ग शराब का सेवन कर रहे थे: पहला, उच्च आय वर्गीय और दूसरा, निम्न आय वाला श्रमिक तबका।

रेटिंग एजेंसी फिनकैप ने इस साल शराब कंपनियों की बैलेंस शीट के आधार पर बताया है कि भारत में प्रीमियम क्वालिटी की शराब की खपत डेढ़ दशक में करीब चार गुना तक बढ़ गई है। अकेले इंदौर और भोपाल में प्रीमियम शराब की बिक्री का आँकड़ा पूरे मप्र की बिक्री से दोगुना ज्यादा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि शराब की खपत किस समुदाय में बढ़ रही है।

इंदौर, रायपुर, भोपाल—इन तीन शहरों में गाँजा, चरस और सिंथेटिक ड्रग्स को लेकर आँकड़े घबराहट पैदा करने वाले हैं। सेंट्रल नारकोटिक्स से जुड़े रहे एक आला अधिकारी ने स्वदेश को बताया है कि इन तीनों शहरों में पिछले दस साल में ड्रग्स का कारोबार शराब की तुलना में 50 फीसदी स्तर को प्राप्त कर चुका है।

गुजरात और राजस्थान से सप्लाई

मप्र और छत्तीसगढ़ में ड्रग्स की सप्लाई चेन राजस्थान, गुजरात से जुड़ी हुई है। दोनों राज्यों में पाकिस्तान से ड्रग्स आ रहा है। मप्र के गुना, शिवपुरी, ग्वालियर, मुरैना, आगर, उज्जैन, विदिशा में राजस्थान के रास्ते ड्रग्स सप्लाई हो रही है। मप्र की गुजरात से लगी सीमा से भी ऐसी ही सप्लाई चेन काम कर रही है। हालत यह है कि प्रदेश में एक भी जिला ऐसा नहीं है, जहाँ ड्रग्स उपलब्ध नहीं हो।

‘टिकट’ के नाम से ड्रग्स की पुड़िया 500 से 1000 रुपए में उपलब्ध हैं। ग्वालियर, शिवपुरी और गुना में पिछले दो साल में 150 प्रकरण एनडीपीएस के दर्ज किए गए हैं। इंदौर में पिछले साल 200 प्रकरण दर्ज हुए हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये सभी पुलिस प्रकरण तस्करी से जुड़े हैं, यानी उपयोग करने वाले नहीं।

पूरे मध्य प्रदेश में नेशनल क्राइम ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि 2023 में 6,537 और 2024 में 4,351 एनडीपीएस प्रकरण दर्ज किए गए हैं।चिंता की बात यह है कि ड्रग्स का यह नेटवर्क इंदौर, भोपाल, रायपुर ही नहीं, जिला और तहसील से लेकर कस्बों तक खड़ा हो गया है।

शराब, सत्ता और दरकता समाज….

पूरे देश में शराब की खपत जिस तेजी के साथ बढ़ी है, उसे सत्ता के संरक्षण के साथ विश्लेषित करने की आवश्यकता है। सत्ता मतलब सभी राजनीतिक दलों की सत्ता का गठजोड़, ब्यूरोक्रेसी और कारोबारियों के साथ स्थापित हो गया है। सालाना 5.5 लाख करोड़ के राजस्व और इससे दो गुने के अवैध कारोबार के हमाम में सब नंगे हैं।शराब के ठेके और ठेकेदारों के पीछे बराबरी की भागीदारी सत्ता की रहती है। असल में यह अकेला ऐसा क्षेत्र है, जहाँ तत्काल पैसा बरसता है। इसलिए हर राजनीतिक सत्ता को इसमें शामिल होना पसंद होता है।

हर जिले में शराब की अवैध कमाई का हिस्सा नेता, अफसर और पुलिस को जाता है। चुनाव से लेकर सत्ता के राजनीतिक खर्चों की प्रतिपूर्ति भी इसी धंधे की बंदरबाँट से होती है।

कमाई में बेदर्द और दवा का ढोंग

नशे से मुक्ति का संकल्प सिद्धि तक पहुँचना नक्सल मुक्त भारत की तरह आसान नहीं है। शराब से राज्यों की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों चलती हैं। मप्र में 2004 में शराब से कमाई 1085 करोड़ थी, लेकिन आज यह आँकड़ा 15258 करोड़ है। मप्र के राज्य कर का 16 फीसदी हिस्सा शराब से आ रहा है।

छत्तीसगढ़ में 2019 में शराब से 4952 करोड़ की कमाई होती थी, लेकिन 2025 में यह 10751 करोड़ जा पहुँची है। यूपी में यह आँकड़ा सालाना 52575 करोड़ है। देश के सभी राज्यों का शराब राजस्व 2015 से 2025 के बीच औसत 173 प्रतिशत तक बढ़ गया है। शराब की इस कमाई में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी नहीं होती है, क्योंकि सेंट्रल जीएसटी के दायरे में शराब नहीं आती है।

कमाई का दशमलव भी खर्च नहीं

अब इस कमाई के साथ सरकारों का सामाजिक सरोकार भी देखा जाना चाहिए। मप्र में एक भी नशा मुक्ति केंद्र राज्य की निधि से संचालित नहीं है। छत्तीसगढ़ में रायपुर और दुर्ग-भिलाई, मप्र के रतलाम, भोपाल, मंदसौर में केंद्रीय सरकार के एटीएफ (Addiction Treatment Facility) केंद्र सरकार के सहयोग से संचालित हैं।

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जानना जरूरी है

पीजीआईएमईआर एवं एम्स, नई दिल्ली के अध्ययन के अनुसार अकेले शराब से जुड़ी बीमारियों पर इलाज का स्वास्थ्य तंत्र पर खर्च 3.13 लाख करोड़ है, जो जीडीपी का 1.5 प्रतिशत होता है।

- 2025 में शराब से खोए स्वास्थ्य का सार्वजनिक मूल्य 15 लाख करोड़ अनुमानित था, जबकि राज्यों की कमाई 5 लाख करोड़ थी।

- मप्र शराब से 15000 करोड़ कमाता है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक क्षति 35000 करोड़ की सालाना हो रही है। इसे सरल अर्थ में ऐसे समझा जा सकता है कि अगर शराब से पैदा होने वाली स्वास्थ्यगत और पारिवारिक समस्या नहीं हो, तो मप्र को सालाना 35 हजार करोड़ का फायदा हो सकता है, लेकिन यह फायदा प्रत्यक्ष नहीं दिखता, जबकि शराब की कमाई सिंडिकेट को सीधे मिलती है।

- एम्स और स्वतंत्र अध्ययन के अनुसार देश में सालाना 10 लाख लोग शराब और अन्य नशीले पदार्थों के कारण अपनी जान गंवाते हैं।

- देश में करीब 37 करोड़ लोग नशे का सेवन कर रहे हैं।

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