प्रकृति और पुरुष के सायुज्य से निर्मित इस विराट जगत में माँ जन्मदात्री है। वह सर्जन करती है। माँ की कोख से एक अस्तित्व जन्म लेता है। माँ उसका पोषण करती है, वही उसका संरक्षण भी करती है। अतएव माँ में ममता अधिक है। ममता अर्थात् मम् का भाव, ' यह मेरा है ' होने की चिंतना। जहाँ ममत्व है, वहाँ अस्तित्व है। जहाँ ममत्व है, वहाँ संरक्षण हेतु शौर्य का वरण है। यही कारण है कि क्षत्रिय शाक्त परंपरा के अनुयायी रहे। 

हमारे देवी मंदिर सदियों से शक्ति के केंद्र रहे हैं; जहाँ से हिंदू जाति अपनी अस्मिता के लिए आशीष और प्रेरणा लेती रही है। अकारण नहीं कि देवियों को रक्त चढ़ता रहा। पशुबलि देना मेरे लिए शक्य नहीं था, तो क्या ? इस नवरात्र की प्रतिपदा के थापना अवसर पर मैंने अपने अंगूठे पर चीरा लगा दिया। रक्त बहना चाहिए; यह न्यूनतम अभ्यास है।

हम मावा चढ़ा रहे माता जी को, पूकी पोज में सेल्फी ले रहें। शक्ति के केंद्र अब पर्यटन स्थल मात्र हैं। हमारी प्रेरणाप्रदायिनी तरंगे प्रभावहीन होती जा रहीं। 

प्रकृति नैतिकता नहीं जानती। प्रकृति में शक्ति की महत्ता है। सत्त्व का संरक्षण बिना शक्ति संभव नहीं, कुटिलता कटार की भाषा समझती है; यही गीता ज्ञान है। " योग्य जन जीता है; पश्चिम की नहीं गीता है, गीता है। " यही महाप्राण निराला का उद्घोष है। 

रावण से लड़ने को संकल्पबद्ध राम व्यथित थे कि क्योंकर शक्ति रावण की सहाय हो रही ? " अन्याय जिधर, है उधर शक्ति " ? जांबवान ने तब सुझाया था कि यह प्रश्न में मस्तिष्क मथने का समय नहीं, प्रभु आप भी यह शक्ति धारण कीजिए। 


विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,
तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर।
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सकता त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,
शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन।
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनन्दन!

राजस्थानी के कवि चंदबरदाई ज्वालामुखी स्तुति आरम्भ करते हुए लिखते हैं — 


नमो आदि अन्नादि तूंही भवानी।
तुंही जोगमाया तूंही बाक बानी।
तुंही धर्नि आकाश विभो पसारे।
तुंही मोह माया बिखे शूल धारे॥

लेकिन, अंत में —


रिद्धि दे, सिद्धि दे, अष्ट नव निधि दे, वंश में वृद्धि दे, बाकबानी।
ह्रदयमें ज्ञान दे, चित्तमें ध्यान दे, अभय वरदान दे, शंभुरानी।
दुःख को दुर कर, सुख भरपुर कर, आश संपुर कर दास जानी।
सज्जन सों हित दे, कुटुम्ब सो प्रीत दे, जंग में जीत दे मां भवानी॥

" जंग में जीत दे " एक आवश्यक और अनिवार्य मंत्र है। यह हिंसा नहीं, अस्तित्व का आधार है। 

शत्रु बोध की अल्पता से जूझता हिंदू समाज प्रायः यह कहते हुए दिख जाएगा कि हम लड़े हैं, हम लड़ सकते हैं, हम लड़ेंगे; इसलिए कृपया हमें इस्लाम का नाम लेकर डराएं नहीं। 

बिल्कुल उपयुक्त बात। भारत का इतिहास संघर्ष का इतिहास है। लाखों योद्धाओं के खप जाने का, हजारों क्षत्राणियों के अग्नि-स्नान कर जाने का इतिहास। किंतु एक क्षण के लिए विचारिए कि हम कहाँ तक हुआ करते थे, अब कहाँ तक सिमट गए हैं। आज हम जहाँ हैं, वे स्थान कितने बरसों तक सुरक्षित रह सकेंगे ?
मारा सुमेरु पर्वत कहाँ है ? शिवभक्तिनी माँ गांधारी का पीहर ? माँ सीता की जन्मस्थली ? शक्ति का अनन्य केंद्र माँ हिंगलाज का मंदिर ? राम द्वारा विजित लंका ? चोल साम्राज्य की पताका से मंडित इंडोनेशिया, मलेशिया ? अटक से कटक ? 

कितनी भूमि, कितने सांस्कृतिक केंद्र, कितने अपने स्वजन खोने के बाद, हम यह कहें कि हम लड़ेंगे; लेकिन अपना शत्रु-बोध न जगाएंगे; यह किस कोटि की धूर्त्तता है ? यह कैसा भोलापन ? यह कैसा स्वार्थ ? जलते पड़ोसी देख, एक मज़हब विशेष की कट्टरता का जीवंत आख्यान सुनकर भी शत्रुबोध न जागे, तब इस विडंबना पर क्या ही कहा जाए ? मर जाना मुक्ति नहीं है। अधिक दार्शनिक हो जाना अथवा मोक्ष की कामना सांसारिक सत्यों से पीछा नहीं छुड़ा सकती। ऐसा संभव होता, तो म्यांमार के बौद्ध हिंसा का वरण नहीं करते।

" पाँच ने मार पच्चीस वश कर ले, उणने कैवे रजपूती " — पाँच इंद्रियों एवम् उनसे संबद्ध पच्चीस प्रवृत्तियों को वश में कर लेना असल रजपूती है। यह दर्शन की उच्च स्थिति है। यह भी वही लोग कर पाए, तो शौर्यवान थे, जो योद्धा थे। 

गांधी की अहिंसा की स्थूल व्याख्याओं से राष्ट्र कमजोर होता है। हिंसा इतनी हेय होती तो, कृष्ण महाभारत न करवाते। भगवान कृष्ण हमें गांधी से कम विवेकी लगें, तो अलग बात है। 

देवी अस्तित्व का राग गाती हैं। सर्जना का उच्चतम स्तर यह है कि तम चीरती माँ काली का एक पाँव स्वयं शिव की छाती पर आ जाता है। सर्जना मूल्य माँगती है, वह संरक्षण के अभाव में मृतप्राय ही है। अतिशय लोकतांत्रिकता एवं स्वार्थों के महासमुद्र में डूबे इस भारत राष्ट्र के समक्ष यह चुनौती है कि वह माँ चामुंडा से क्या प्रेरणा लेता है ? क्योंकि प्रथमतः हिंदू जाति में एकता का संकट है। कुछ हिन्दुओं को लगता है कि वे अकेले लड़ लेंगे, उन्हें पिछड़ों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। कुछ नवबौद्धों को लगता है कि शत्रु उनके सगे हैं; इसलिए जब भी आमना-सामना होगा, तब वे बच लेंगे, उनकी महिलाओं का शील अक्षुण्ण रहेगा। अतः में, इस प्रार्थना के साथ ... 
एक थारो आसरो माँ! लाज थारे हाथ छै। 

भारत वर्ष का कल्याण हो। धर्म की जय हो। जय भवानी। 
 

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