बाह्य स्वरूप में नवरात्र के नौ दिन नौ देवियों की साधना, उपासना, आराधना और पूजा के दिन हैं। पर वास्तव में इन नौ दिनों की दिनचर्या के माध्यम से शरीर की समस्त कोशिकाओं को ऊर्जावान बनाकर अंतरिक्ष की एनर्जी से जुड़कर स्वयं को अधिक सामर्थ्यवान बनाने की प्रक्रिया है।वर्ष में कुल चार नवरात्र आते हैं—दो प्रकट और दो गुप्त। दो प्रकट नवरात्र चैत्र और अश्विन माह में तथा गुप्त नवरात्र आषाढ़ एवं माघ माह में आते हैं। इस वर्ष शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से प्रारंभ हो गए हैं।


नवरात्र का विधान और महत्व
भारतीय वाङ्मय में ये नवरात्र अलग-अलग समय और ऋतुओं में आते हैं। चारों नवरात्र के कुल 36 दिनों तक शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक अनुशासन का निर्देश है। चार नवरात्र का विधान केवल उत्सव भर नहीं है। इसके पीछे गहरा शोध और अनुसंधान है। नवरात्र के दिनों का निर्धारण प्राणी-देह एवं उसकी जीवन-प्रक्रिया, प्रकृति और सृष्टि की ऊर्जा तथा उसके प्राणियों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करके ही किया गया। प्रत्येक नवरात्र में व्यक्ति की आंतरिक एवं बाह्य ऊर्जा को सशक्त करके सृष्टि की ऊर्जा से जोड़ने के लिए इनकी तिथियाँ और आयोजन का तरीका सुनिश्चित किया गया है। वर्ष में पड़ने वाले इन चारों नवरात्र के विधान और महत्व को समझने के लिए हमें सृष्टि की ऊर्जा और उसका प्राणियों के जीवन से संबंध पर एक दृष्टि डालनी होगी।
सृष्टि की अदृश्य और अनंत ऊर्जा
संसार का प्रत्येक प्राणी सृष्टि की ऊर्जा से ही संचालित है। वह ऊर्जा अदृश्य है, अनंत है। लघुतम चींटी से विशाल हाथी तक सभी प्राणियों की एक श्वास उसी से चलती है। यह बात हम इसी से समझ सकते हैं कि मौसम बदलते ही हमारे मन के विचार भी बदलने लगते हैं और शरीर की आवश्यकता भी। मौसम के अनुरूप ही अनाज, फल, फूल एवं सब्जियों की फसल आती है। मौसम के साथ बीमारियाँ भी बदल जाती हैं। अब ये मौसम बदलता कौन है? कौन संचालित कर रहा है इन चाँद और सूरज को, दिन और रात को? कौन संचालित कर रहा है जीवन और मरण की प्रक्रिया को? यह सृष्टि की वही अदृश्य, अनादि और अनंत ऊर्जा है, जिससे कोई मुक्त नहीं।


आधुनिक विज्ञान ने इसे "यूनिवर्स की एनर्जी" नाम दिया और स्वीकारा है कि इस ऊर्जा को न नष्ट किया जा सकता है, न पैदा किया जा सकता है। वह रूप बदलती है और कभी इस पदार्थ के रूप में तो कभी उस पदार्थ के रूप में। प्राणियों की देह के रूप में भी वही ऊर्जा आकार लेती है। एक पदार्थ के नष्ट होने पर वह दूसरे पदार्थ का रूप ले लेती है। विज्ञान की इस परिभाषा को प्राचीन भारत के चिंतकों ने "परम शक्ति" या "आदि शक्ति" कहा, जिसका अंश जीवात्मा है।


यदि हम इस रहस्य को जान गए कि हमें श्वास लेने में, हमारे रक्त-संचार में, भोजन-पाचन प्रक्रिया में अथवा काम करने की सामर्थ्य के केंद्र में कोई ऊर्जा है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम उस ऊर्जा से कुछ अतिरिक्त शक्ति-सामर्थ्य ले सकते हैं, जिससे जीवन और सफल तथा सक्षम बने? क्या हम कुछ ऐसा कर सकते हैं, जिससे न शरीर कमजोर हो और न मन-बुद्धि? इस प्रश्न का समाधान और इस आवश्यकता की पूर्ति नवरात्र के आयोजन-विधान में है, जो बदलते मौसम के प्रभाव का मन, बुद्धि और शरीर पर पड़ने वाले असर का अध्ययन करके निर्धारित किए गए। ताकि मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा सृष्टि की अनंत ऊर्जा से अतिरिक्त शक्ति ले सके।
चेतन और अवचेतन मस्तिष्क की शक्ति
व्यक्ति में दो मस्तिष्क होते हैं। एक चेतन (कॉन्शस) और दूसरा अवचेतन (सबकॉन्शस)। हमारा अवचेतन मस्तिष्क सृष्टि की अनंत ऊर्जा से और चेतन मस्तिष्क संसार से जुड़ा होता है। चेतन मस्तिष्क से हम जो भी काम करते हैं, उसकी क्षमता केवल पंद्रह प्रतिशत ही है, जबकि अवचेतन की सामर्थ्य 85 प्रतिशत है। सुषुप्त अवस्था में तो दोनों का संपर्क जुड़ता है। पर यदि जाग्रत अवस्था में चेतन मस्तिष्क अपने अवचेतन से शक्ति लेने की क्षमता प्राप्त कर ले, तो वह अनंत ऊर्जा से भी संपन्न हो सकता है।
प्राचीनकाल में ऋषियों की वचन-शक्ति अवचेतन की इसी ऊर्जा के कारण रही है। नवरात्र में पूजा-साधना की विधि जनसामान्य को अवचेतन की इसी शक्ति से संपन्न करने का प्रयास है। इससे आरोग्य तो प्राप्त होगा ही, साथ ही अलौकिक ऊर्जा की संपन्नता भी बढ़ती है।


ऋतु परिवर्तन और नवरात्र का संबंध :
मौसम के परिवर्तन के अनुरूप वर्ष को छह ऋतुओं में बाँटा गया है। चारों नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल में आते हैं, ताकि शरीर को ऋतु-परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव से बचाने के लिए अतिरिक्त शक्ति प्राप्त हो। संयोग से ऋतुओं के संधिकाल की यह अवधि सृष्टि के पाँचों तत्वों के संतुलन की अवधि होती है। अतिरिक्त क्षमता अर्जित करने के लिए पाँचों तत्वों का संतुलन आवश्यक होता है।असंतुलन की स्थिति में उस तत्व से संबंधित प्रगति तीव्र होती है, जिसका अनुपात अधिक होता है, पर जिन तत्वों की गति कम रहती है, वे क्षीण होने लगते हैं, जिससे असंतुलन होता है। यह असंतुलन ही शरीर और मन, दोनों की बीमारी लाता है। शरीर रुग्ण होने लगता है और मन भटकने लगता है। शरीर के आंतरिक तत्वों और कोशिकाओं के संतुलित विकास से ही व्यक्ति स्वस्थ और सामर्थ्यवान रहता है।प्राणी-देह की कोशिकाओं और तत्वों के विकास एवं उनके ह्रास की अपनी प्रक्रिया है। देह की इस आंतरिक विकास-प्रक्रिया को अतिरिक्त ऊर्जा-संपन्न बनाने के लिए ही नवरात्र में यह साधना-सिद्धांत है। नवरात्र की दिनचर्या चित्त को शांत करती है और प्राणशक्ति को इस योग्य बनाती है कि व्यक्ति सृष्टि की अनंत ऊर्जा से जुड़ सके। इसीलिए नवरात्र में यम, नियम, संयम, आहार और प्राणायाम पर जोर दिया गया है।


नवरात्र में देवी के नौ रूपों की उपासना क्यों?


अब एक प्रश्न और उठता है कि नवरात्र के इस साधना-विधान को देवी से और देवी के नौ रूपों से क्यों जोड़ा गया है? एक ही देवी की नौ दिन पूजा की जा सकती थी। इस प्रश्न का समाधान भी सरल है। सृष्टि में व्याप्त "ऊर्जा" या "एनर्जी" स्त्रीलिंग शब्द है। इसलिए भारतीय चिंतन में इस ऊर्जा की कल्पना देवी के रूप में की गई और देवी को आदिशक्ति माना। इसीलिए नारी को "आद्या" और पुरुष को "पूर्णा" कहा गया।
 

शक्ति के विभिन्न रूप हैं—शरीर की शक्ति, मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, चेतना की शक्ति और प्रकृति की शक्ति। यदि शरीर सबल है, किंतु मन भयभीत है; शरीर और मन ठीक हैं, लेकिन बुद्धि कमजोर है; शरीर, मन और बुद्धि सब ठीक हैं, लेकिन चेतना कम है और शरीर में आलस्य है, तो परिणाम कतई अनुकूल नहीं होंगे। सब ठीक होने पर यदि प्रकृति विपरीत हो, तो भी परिणाम प्रभावित होगा। सब प्रकार की शक्ति अर्जित करना और विपरीत मौसम में भी अपनी गति बनाए रखने की ऊर्जा प्राप्त करना ही नवरात्र की अवधि है।


नवरात्र में नौ देवियों के पूजन का विधान है। मनुष्य के शरीर में कुल आठ चक्र होते हैं। प्रत्येक चक्र की अपनी ऊर्जा का प्रकार है। नौ में से आठ देवियाँ शरीर के सभी चक्रों से संबंधित होती हैं और नवमी देवी सभी चक्रों की संपूर्ण ऊर्जा की प्रतीक है। इसलिए प्रत्येक देवी का नाम अलग है, रूप अलग है, पूजन-विधि भी अलग है। देवी-पूजन की साधना-विधि से शुरुआती आठ दिन इन आठों चक्रों और उनसे संबंधित शरीर की सभी कोशिकाओं को सक्रिय और समृद्ध बनाया जाता है। जब सभी कोशिकाएँ और चक्र अधिक ऊर्जावान होंगे, तो व्यक्ति अधिक ऊर्जा से संपन्न होकर सफलता के नए आयाम स्थापित कर सकेगा।

देवी के स्वरूप और उनका संदेश

देवी के सभी रूपों का संबंध शरीर के चक्रों, औषधियों और वनस्पतियों तथा अलग-अलग ऊर्जा से है।
पहला दिन : देवी शैलपुत्री
नवरात्र के प्रथम दिन देवी के शैलपुत्री स्वरूप का पूजन होता है। इनका संबंध प्लाज्मा ऊर्जा और हरड़ वनस्पति से होता है। प्लाज्मा जहाँ पाचन-शक्ति को सक्रिय करता है, वहीं हरड़ अनेक प्रकार के रोगों के नियंत्रण में काम आने वाली औषधि है। हरड़ को हिमायती कहा गया है, जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथ्या, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है और सात प्रकार के रोगों का उपचार करती है।
दूसरा दिन : देवी ब्रह्मचारिणी
देवी का द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी का है। इन्हें ब्राह्मी भी कहा गया है। ये मन, वचन और विचार से संयम का संदेश देती हैं। शरीर और मन की कितनी ही बीमारियाँ मन के विचारों, खानपान में सावधानी न रखने और अनियमित दिनचर्या से उत्पन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त ब्राह्मी एक औषधि का भी नाम है, जो स्मरण-शक्ति बढ़ाती है। व्यक्ति आचरणहीनता तभी करता है, जब उसे यह स्मरण न रहे कि वह कौन है और उसका सम्मान क्या है। इसके साथ ही ब्राह्मी औषधि रक्त-विकारों को दूर करती है और वाणी को भी मधुर बनाती है। मधुर वाणी संबंधों को मधुर बनाने के लिए आवश्यक है। ऊर्जा की दृष्टि से देखें, तो देवी का यह स्वरूप क्वार्क से संबंधित है। यह ऊर्जा शरीर की समस्त कोशिकाओं के बीच समन्वय का काम करती है।
तीसरा दिन : देवी चंद्रघंटा
देवी का तृतीय स्वरूप चंद्रघंटा है। इन्हें चंद्रस्वर भी कहा गया है। चंद्रस्वर को साधारण बोलचाल में चंद्रसूर भी कहते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, चंद्रस्वर सौम्यता और संतुलन का प्रतीक है। चंद्रस्वर एक पौधा भी है, जो धनिए के समान होता है। यह औषधि मोटापा दूर करती है, सुस्ती दूर करती है, शरीर को सक्रिय रखती है और त्वचा-रोगों में भी लाभप्रद है। एनर्जी की दृष्टि से यह एंटी-क्वार्क कहलाती है। अर्थात अदृश्य ऊर्जा का वह प्रकार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करता है।
चौथा दिन : देवी कूष्मांडा
नवरात्र के चौथे दिन देवी के कूष्मांडा स्वरूप का पूजन होता है। यह एनर्जी के पार्टिकल स्वरूप से संबंधित माना जाता है और वनस्पति में इनका प्रतीक कुम्हड़ा है। हालाँकि इस दिन कुम्हड़े की बलि देने का प्रचलन हो गया है, जो कुप्रथा है और समय के साथ जुड़ गई। वस्तुतः कुम्हड़ा भी एक प्रकार की औषधि है, जो रक्त-विकार दूर करती है और रक्तचाप भी संतुलित करती है। इससे एक मिष्ठान्न पेठा बनता है, जो रक्त-रोगों की औषधि के साथ मानसिक रोगों पर नियंत्रण के लिए मानो अमृत के समान है।
पाँचवाँ दिन : देवी स्कंदमाता
नवरात्र के पाँचवें दिन देवी के स्कंदमाता स्वरूप का पूजन होता है। यह एनर्जी के एंटी-पार्टिकल स्वरूप से संबंधित है। एनर्जी का यह भाग प्राणी में जीवन-शक्ति का प्रादुर्भाव करता है। इस स्वरूप का प्रतीक अलसी है। कहते हैं कि देवी अलसी में विद्यमान रहती हैं। अलसी वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है।
छठा दिन : देवी कात्यायनी
देवी का षष्ठम स्वरूप कात्यायनी है। इनमें एनर्जी का एटम स्वरूप माना जाता है। इन्हें मोइया भी कहा गया है। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।
सातवाँ दिन : देवी कालरात्रि
नवरात्र में देवी का सप्तम स्वरूप कालरात्रि है। एनर्जी के रूप में इन्हें मॉलिक्यूल माना जाता है। इन देवी का वास औषधि नागदौन में माना गया है। यह औषधि नागदौन सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी होती है और मनोविकारों को दूर करती है।
आठवाँ दिन : देवी महागौरी
देवी का अष्टम स्वरूप महागौरी है। इन्हें धरती का रूप माना गया है। इनका निवास तुलसी में माना गया है। तुलसी कितनी गुणकारी होती है, इससे हम परिचित हैं। तुलसी सात प्रकार की होती है—सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुआ, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र तुलसी। शरीर, मन और मस्तिष्क का ऐसा कोई रोग नहीं, जिसमें तुलसी लाभकारी न हो। पिछले दिनों पूरी दुनिया में कोरोना नामक बीमारी फैली। जिन घरों में तुलसी-पत्ती की नियमित चाय बनती थी, वहाँ इस बीमारी का प्रभाव नगण्य ही रहा।
नौवाँ दिन : देवी सिद्धिदात्री
देवी का नवम स्वरूप सिद्धिदात्री है। इन्हें समस्त ग्रहों और नक्षत्रों में व्यापक माना गया है। इनका वास औषधि शतावरी में माना गया है। इसे नारायणी शतावरी भी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।

नवरात्र में दिनचर्या

देवी के नौ स्वरूप, उनका एनर्जी और औषधि से संबंध तथा पूरे नौ दिन की दिनचर्या समझकर यह स्पष्ट हो जाता है कि एक सक्षम, सबल और समुन्नत जीवन के लिए यह दिनचर्या कितनी महत्वपूर्ण है।
प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठना, बहते हुए पवित्र जल में स्नान करना और सूर्योदय के ऊषाकाल में सूर्य नमस्कार का योग करना। फिर घर आकर पूजन और प्राणायाम करना। नौ दिन में पहले दिन से अन्न का आहार कम करना और इसकी पूर्ति फलाहार से करना। चौथे दिन अन्न का आहार बिल्कुल नहीं, केवल फलाहार। चौथे दिन से थोड़ा-थोड़ा करके आहार की वृद्धि करना। नौवें दिन पूर्णाहार करना।
यह एक प्रकार से नौ दिन का कायाकल्प है, जो शरीर को आंतरिक व्याधियों से मुक्त करके आरोग्य प्रदान करता है, जबकि यम, नियम, संयम और प्राणायाम आत्मशक्ति को जाग्रत करते हैं, जिससे यूनिवर्स की एनर्जी ही तो दैवी कृपा है।

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