कोलकाता की लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स सरणी और हो ची मिन्ह सरणी के नाम बदले जा रहे हैं, एक बार को लग सकता है कि सत्‍ता बदलने के साथ इन नामों का बदलना कोई साधारण प्रक्रिया है, जिसकी सत्‍ता होती है, वह अपने हिसाब से निर्णय लेता है, किंतु जो बदलाव इन दिनों पश्‍चिम बंगाल में दिख रहा है, उसे आप साधारण मानने की भूल नहीं कर सकते हैं। 

वस्‍तुत: यह विशेष इसलिए है क्‍योंकि यहां आप भारत को उसके पुराने अतीतकालीन वैभव की ओर लौटता हुआ पाते हैं। फिर वह समृद्धि‍ का विषय हो, जिसमें कि रोजगार के आवश्‍यक संसाधन, आधुनिक संदर्भों में बड़ी-बड़ी कंपनियों का होना आवश्‍यक है या फिर अन्‍य विषय ही क्‍यों न हो, सभी में असाधारण निर्णय लिए जा रहे हैं। वैसे, भाजपा सरकार आए यहां बहुत वक्‍त नहीं बीता है, पर जिस तरह के निर्णय यहां लिए जा रहे हैं, उनसे यही लग रहा है कि पश्‍चिम बंगाल अब नए स्‍वरूप में अपने को गढ़ रहा है, जिसमें अतीत का वैभव वर्तमान में पुन: प्रकट होता हुआ दिखाई देता है। 

आप यहां स्‍थानों के नाम बदलने को सामान्‍य न मानिए, क्‍योंकि यह विषय इससे कहीं बड़ा है। यह ठीक वैसा ही मामला है जैसे हम अपने जीवन में तय करते हैं कि किसे स्‍थान दें और किसे प्रतिष्‍ठ‍िता। अभी पश्‍चिम बंगाल के माध्‍यम से आप नए भारत को अनुभूत कीजिए, जो अपनी सार्वजनिक स्मृति में किन व्यक्तित्वों को प्रतिष्ठित करता है, किन विचारों को आने वाली पीढ़ियों के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है और अपनी सभ्यता को समझने के लिए किस वैचारिक दृष्टि को आधार बनाता है, उस पर कार्य कर रहा है। 

मार्क्सवाद ने आधुनिक विश्व को प्रभावित किया, इसमें संदेह नहीं। उसने पूंजी, श्रम, वर्ग और आर्थिक असमानता के प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया। भारत में भी वामपंथ ने श्रमिक अधिकार, भूमि-संबंध, आर्थिक विषमता और सामाजिक शोषण जैसे प्रश्नों पर महत्वपूर्ण बहसें खड़ी कीं, यहां तक ठीक है, किंतु समस्या वहां आरंभ होती है जहां मार्क्सवादी दृष्टि को भारत को समझने का एकमात्र वैध चश्मा बना दिया जाता है। वस्‍तुत: तब भारत अपने इतिहास, धर्म, दर्शन, संस्कृति, जातीय-सामुदायिक संरचनाओं, लोकपरंपराओं और आध्यात्मिक चेतना के साथ एक जीवंत सभ्यता न रहकर मुख्यतः आर्थिक वर्गों और संघर्षों की प्रयोगशाला बन जाता है।

सच पूछिए तो यहीं से भारत के वैचारिक आत्मविस्मरण की कहानी शुरू होती है, इसके लिए स्वयं मार्क्स की भारत संबंधी दृष्टि को पढ़ना जरूरी है। मार्क्स भारत को “एशियाई आयामों का इटली” और सामाजिक दृष्टि से “पूर्व का आयरलैंड” कहते हैं। इसी लेख में भारतीय समाज की जटिलता और उसके विखंडन पर उनकी दृष्टि सामने आती है।(द ब्रिटिश रूल इन इंडिया, मार्क्स एंड एंगेल्स: कलेक्टेड वर्क्स, खंड 12, पृष्ठ 125–133) और 22 जुलाई 1853 में  मार्क्स लिखते हैं कि अंग्रेजी शासन का भारत में एक “विनाशकारी” और दूसरा “पुनर्सृजनकारी” मिशन था और पुराने एशियाई समाज के विनाश के साथ पश्चिमी समाज की भौतिक नींव रखने की बात करते हैं।(द फ्यूचर रिजल्ट्स ऑफ ब्रिटिश रूल इन इंडिया, कलेक्टेड वर्क्स, खंड 12, पृष्ठ 217–222)। 

यहां आप मार्क्‍स के कहे शब्‍दों पर गहराई से गौर कर सकते हैं, ““पुनर्सृजनकारी” मिशन”, “पूर्व का आयरलैंड”, “एशियाई आयामों का इटली” जब आप इसके पूरे संदर्भ पढ़ रहे होते हैं, तब एक बात बहुत स्‍पष्‍टता के साथ सामने आती है कि मार्क्‍स कोई भारत की प्रशंसा नहीं कर रहे थे। यहीं एक बड़ा वैचारिक प्रश्न पैदा होता है। वस्‍तुत: जिस भारत को अपनी सभ्यता की निरंतरता, ग्राम-समाज, दर्शन और सांस्कृतिक संस्थाओं के आधार पर समझना चाहिए था, उसके विश्लेषण में यूरोपीय ऐतिहासिक विकास का प्रतिमान क्यों लगाया गया?

मार्क्स ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आलोचना की, पर उनकी ऐतिहासिक दृष्टि स्वयं यूरोप के औद्योगिक विकास और सामाजिक परिवर्तन से निर्मित थी। बाद में भारत में आए मार्क्सवादी इतिहासलेखन ने इसी आर्थिक-सामाजिक विश्लेषण को भारतीय अतीत के अध्ययन में एक प्रभावशाली पद्धति बनाया।

इतिहास जब वर्ग-संघर्ष में सिमटने लगे

भारत में मार्क्सवादी या मार्क्स से प्रभावित इतिहासलेखन का प्रभाव बहुत व्यापक रहा। डी. डी. कोसांबी, आर. एस. शर्मा, इरफान हबीब, रोमिला थापर, बिपिन चंद्र और अन्य इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास के आर्थिक, सामाजिक और वर्गीय पक्षों पर जो कार्य किया, उनमें इन सभी ने मार्क्‍स की थ्‍योरी के अनुसार, वर्गसंघर्ष ही ढूंढ़ा। इतिहासलेखन के अध्ययन में आप भारतीय मार्क्सवादी परंपरा को आर्थिक विकास, भूमि-स्वामित्व, वर्ग-संघर्ष और औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था जैसे प्रश्नों पर केंद्रित कर सकते हैं, जिसके विवाद आज भी इतने हैं कि लगता है आखिर इन मार्क्‍सवादी इतिहासकारों को इतने झूठ गढ़ने की जरूरत क्‍या थी? फिर इन अध्ययनों की एक समस्या ओर है जब इतिहास की व्याख्या में आर्थिक कारण प्रमुख से सर्वग्रासी बन गए हैं।

भारत में मंदिर कभी भी संपत्ति का केंद्र नहीं रहे हैं, वह तीर्थाटन के केंद्र रहते आए हैं, जोकि आर्थिक गतिविधि नहीं थी। गुरुकुल अपने अस्‍तित्‍वकाल से ही उत्पादन-व्यवस्था से बहुत ऊपर रहते रहे हैं। परिवार सिर्फ श्रम-विभाजन की इकाई कभी नहीं थे। धर्म सिर्फ सामाजिक नियंत्रण का उपकरण नहीं था, पर मार्क्‍सवादियों ने अपनी सोच से इन सभी को विकृत कर दिया। 

बेशक, भारत को समझने के लिए अर्थशास्त्र का ज्ञान भी हो तो अच्‍छा है, पर इसका होना कभी भी पर्याप्त नहीं है। क्‍योंकि भारतीय सभ्यता-दृष्टि और शुद्ध भौतिकवादी दृष्टि के बीच गहरा अंतर विद्यमान है। मगर मार्क्‍स, लेनिन और हो ची मिन्ह जैसे अनेक मार्क्‍सवादियों के चेले इस बात को समझने को तैयार ही नहीं हैं। यदाकदा आज भी यह दृष्‍य देखने में आ जाता है। 

भारत में वामपंथ को विश्वविद्यालयों, इतिहासलेखन, साहित्यिक आलोचना, सामाजिक विज्ञान और सांस्कृतिक विमर्श में वर्ग, शोषण, सत्ता और आर्थिक संरचना को केंद्रीय विश्लेषणात्मक श्रेणियों के रूप में स्थापित करने की लम्‍बी प्रक्रिया चलाई गई है। अरुण शौरी की पुस्तक “एमिनेंट हिस्टोरियन्स: देयर टेक्नोलॉजी, देयर लाइन, देयर फ्रॉड” वस्‍तुत: इसी इतिहासलेखन की तीखी आलोचना करती है। 271 पृष्ठों की पुस्तक 1998 में प्रकाशित हुई थी। शौरी ने इस पुस्तक में विस्तार से बताया है कि किस तरह एक खास वैचारिक सोच (Cabal) ने भारत के शैक्षणिक संस्थानों पर कब्जा किया और देश के इतिहास को अपने एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़ कर पेश किया।

शौरी का आरोप है कि वामपंथी इतिहासकारों ने 'इंडियन काउंसिल ऑफ ऐतिहासिक रिसर्च' (आईसीएचआर), एनसीईआरटी और बड़े विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण कर लिया। वे आपस में ही एक-दूसरे को सरकारी अनुदान और पुरस्कार बांटते रहे, लेकिन उन परियोजनाओं को कभी पूरा नहीं किया। शौरी लिखते हैं, "वास्तव में इन 'प्रख्यात' लोगों का असली अपराध सिर्फ पैसों के नुकसान में नहीं है, जो इन्होंने देश को पहुँचाया है। बल्कि इनका असली अपराध उस स्थिति में है जिसमें इन्होंने इन संस्थाओं को ला खड़ा किया है। उनका अपराध उनके कर्तव्य की घोर उपेक्षा में है- जिसके कारण हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण परियोजनाएं सालों तक लटकी रहीं।"

शौरी के अनुसार, मार्क्सवादी इतिहासकारों का यह तय 'एजेंडा' (Line) रहा है कि भारत के मूल इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना को हमेशा हीन या शोषक के रूप में दिखाया जाए।  "उन्होंने भारत को एक खाली भूमि के रूप में चित्रित किया है, जिसे केवल एक के बाद एक आने वाले विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भरा गया।" यानी भारत का अपना कुछ कभी वैभवपूर्ण कभी कुछ रहा ही न हो! 

पुस्तक में शौरी ने दस्तावेजी सबूतों के साथ दिखाया है कि किस तरह वामपंथी इतिहासकारों ने मध्यकालीन भारत में मंदिरों को तोड़े जाने और इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा किए गए रक्तपात को पाठ्यपुस्तकों से गायब कर दिया ताकि एक झूठा 'धर्मनिरपेक्ष' नैरेटिव सेट किया जा सके। बनारस (काशी) और अन्य मस्जिदों के इतिहास का उदाहरण देते हुए वे लिखते हैं, "जो लोग इस तरह के सनकभरे और राजनीतिक नफा-नुकसान के अनुमानों से चलते हैं, वे हम सभी के लिए- हिंदुओं, मुस्लिमों, सबके लिए तबाही का बीज बोते हैं। जो लोग इस सनक और गणनाओं के सामने चुप रहते हैं, वे भी इस तबाही को बोने में उनकी मदद करते हैं। क्या हम कभी अपने इस टालमटोल और सच को छुपाने की आदत को छोड़ेंगे? क्या हम आखिरकार पूरे सच को बोलना और उसका सामना करना सीखेंगे?"

शौरी ने आरोप लगाया कि वामपंथी इतिहासकार मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष के सिद्धांत को भारतीय इतिहास पर जबरन थोपने के लिए खुद ही साक्ष्य गढ़ते हैं या पुराने साक्ष्यों को आधा-अधूरा पेश करते हैं। जब बात उनके वैचारिक पाखंड को उजागर करने की आती है, तो वे किसी भी बहस से भागते हैं। "उनकी चिंताओं और झूठ को केवल एक ही तरीके से बचाए रखा जा सकता था- यह सुनिश्चित करके कि किसी भी चीज़ की (वैज्ञानिक या निष्पक्ष) जांच ही न होने पाए। तदनुसार, यही इस वैचारिक निष्ठा (वामपंथ) की पहचान रही है।"

पुस्तक में नालंदा विश्वविद्यालय के विनाश को लेकर वामपंथी इतिहासकारों के किस झूठ का पर्दाफाश किया गया है, उन्‍होंने वामपंथी इतिहासकारों के दावों को चुनौती दी है। संक्षेप में, अरुण शौरी ने इस पुस्तक के माध्यम से वामपंथ को एक ऐसे 'बौद्धिक माफिया' के रूप में चित्रित किया है जिसने भारत की भावी पीढ़ियों को उनके वास्तविक इतिहास और सांस्कृतिक जड़ों से काटने का सुनियोजित प्रयास किया। कुल मिलाकर, वामपंथियों के इतिहास लेखन में वैचारिक चयन और तथ्यों के चयनात्मक उपयोग ने इतिहास की प्रस्तुति को प्रभावित किया। 

भारत को अपनी सभ्यता के भीतर से पढ़ना होगा

समझ लें कि यहां कोई भारत की जड़ों की ओर लौटने का अर्थ में यह नहीं कह रहा है कि अतीत को आलोचनारहित महिमामंडित किया जाए, क्‍योंकि भारत में सदियों से तर्क की कसौटी पर किसी भी विषय को कसाजाना अनिवार्य माना जाता रहा है, इसलिए यहां तर्क मीमांसा सदैव विद्यमान रही है। इसे आप चार्वाक से वेदांत तक, बुद्ध से मीमांसा तक, भक्ति से तंत्र तक, शंकर से रामानुज तक, कबीर से तुलसी तक भारत ने अनेक विचारों के बीच द्वैत अद्वैत, विशिष्‍टाद्वैत के रूप में देख सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त भी दर्शन के कई स्‍वरूप यहां विद्यमान रूप से देखे जा सकते हैं।  अर्थात भारत की सभ्यता की रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम विचार-विरोध को दबाना कभी न होकर भारतीय धरती पर विचारों का स्वतंत्र पुनर्पाठ है।

अब मार्क्सवाद बदल गया है

बीसवीं सदी का मार्क्सवाद मुख्यतः आर्थिक वर्ग-संघर्ष पर केंद्रित था। मजदूर बनाम पूंजीपति, उत्पादन के साधन, निजी संपत्ति, वर्गीय राज्य और क्रांति उसके प्रमुख विषय थे, लेकिन पश्चिमी समाजों में औद्योगिक पूंजीवाद के विकास, सोवियत मॉडल की सीमाओं और 1960 के दशक के बाद के सामाजिक आंदोलनों ने वामपंथी चिंतन को बदल दिया। यहीं से हमें फ्रैंकफर्ट स्कूल, आलोचनात्मक सिद्धांत, उत्तर-मार्क्सवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद और पहचान-आधारित सामाजिक विमर्शों के बीच संबंधों को समझना होगा।

आज जिसे राजनीतिक बहस में “कल्चरल मार्क्सिज्म” कहा जाता है, वह कोई एकल, सर्वमान्य अकादमिक सिद्धांत नहीं है। यह मार्क्सवाद का नया रूप है, एक ऐसा छद्म रूप जिसे मार्क्‍सवादी सांस्कृतिक रूपांतरण के लिए इस्तेमाल करते हैं, इसलिए अनेक विद्वान भी यह मान चुके हैं कि यह एक राजनीतिक और कभी-कभी षड्यंत्रकारी अवधारणा है, जिसमें संघर्ष का केंद्र योजना से अर्थव्यवस्था से संस्कृति की ओर स्थानांतरित किया गया है।

पहले प्रश्न था कि  उत्पादन के साधनों पर किसका नियंत्रण है? अब प्रश्न बनते हैं कि भाषा कौन तय करेगा? इतिहास की व्याख्या कौन करेगा? कौन-सी पहचान वैध है? कौन-सी परंपरा दमनकारी मानी जाएगी? परिवार की परिभाषा क्या होगी? धर्म की सार्वजनिक भूमिका क्या होगी? बहुसंख्यक संस्कृति को किस दृष्टि से देखा जाएगा? औपनिवेशिक इतिहास की आलोचना कैसे होगी? वास्‍तव में यही चयनात्‍मक इसकी दृष्टि ही आधुनिक सांस्कृतिक राजनीति में पुराने वर्ग-संघर्ष का एक नया रूप प्रस्‍तुत करती है।

संस्कृति अब संघर्ष का नया मैदान है

फ्रांज फैनन की “द रैचेड ऑफ द अर्थ” में राष्ट्रीय संस्कृति और उपनिवेशवाद के संबंध पर विचार करते हुए पृष्ठ 147 से आगे यह तर्क मिलता है कि उपनिवेशित समाज की संस्कृति और उसकी राजनीतिक मुक्ति का प्रश्न एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। पृष्ठ 177 पर वह संस्कृति को राष्ट्र की अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित करते हुए उसके अस्तित्व को राष्ट्र और राज्य के साथ जोड़ते हैं। 

वस्‍तुत: यहीं से भारत के लिए एक उलटा प्रश्न खड़ा होता है। यदि किसी समाज को अपनी सांस्कृतिक स्मृति से काट दिया जाए, उसकी परंपराओं को लगातार पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाए और उसकी ऐतिहासिक चेतना को अपराध-बोध में बदल दिया जाए, तो उस समाज की आत्मविश्वासपूर्ण राष्ट्रीय पहचान कैसे बनेगी? वस्‍तुत: यहीं स्‍वभाविक रूप से आधुनिक कल्चरल मार्क्सवाद की आलोचना आवश्यक हो जाती है।

भारत के लिए खतरा क्या है?

खतरा यह नहीं कि कोई भारतीय मार्क्स पढ़ रहा है। खतरा यह भी नहीं कि विश्वविद्यालय में फ्रैंकफर्ट स्कूल पढ़ाया जा रहा है। खतरा तब पैदा होता है जब एक ही वैचारिक दृष्टि समाज को अपनी परंपरा से शर्मिंदा करना शुरू कर दे। जब धर्म को समझने से पहले उसे संदेह की दृष्टि से देखना अनिवार्य बना दिया जाए। जब भारतीय परिवार को केवल पितृसत्ता की संरचना मान लिया जाए। जब भारतीय इतिहास को सिर्फ शासक और शोषित की श्रेणियों में बांट दिया जाए। जब जाति की आलोचना आवश्यक होने के बावजूद भारतीय समाज की संपूर्ण सभ्यता को केवल जाति-व्यवस्था के चश्मे से देखा जाने लगे। इतना ही नहीं तो जब भारतीय ज्ञान परंपरा में उपलब्ध गणित, दर्शन, भाषाविज्ञान, चिकित्सा, खगोल और तर्कशास्त्र की वास्तविक उपलब्धियों पर चर्चा को “राष्ट्रवादी” कहकर खारिज कर दिया जाए! इसलिए भारत को मार्क्सवाद से अधिक एकांगी विचारधारा से सावधान रहने की आवश्यकता है।

आधुनिकता बनाम भारतीयता का झूठा द्वंद्व

भारत के अभी भी तमाम लोगों को समझना होगा कि आधुनिक होना और अपनी सभ्यता में विश्वास रखना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। विज्ञान चाहिए, पर वैज्ञानिकता के नाम पर सांस्कृतिक आत्महीनता हम भारतीय कैसे स्‍वीकार्य कर सकते हैं?  सामाजिक न्याय चाहिए, पर न्याय के नाम पर इतिहास का वैचारिक पुनर्लेखन नहीं। स्त्री-स्वतंत्रता चाहिए, पर भारतीय स्त्री की अपनी ऐतिहासिक भूमिकाओं और उपलब्धियों का निषेध नहीं। दलित अधिकार चाहिए, पर भारतीय सभ्यता को सिर्फ उत्पीड़न की कथा में सीमित कर देना कहां से उचित ठहराया जा सकता है?  असहमति चाहिए, पर असहमति के नाम पर राष्ट्र की सांस्कृतिक निरंतरता को ही खारिज कर देना भी स्वीकार्य नहीं किया जाना चाहिए, इसलिए लेनिन और मार्क्स के नाम का प्रश्न महत्वपूर्ण है। 

बेशक, कोलकाता में सड़क का नाम बदलना किसी विचार का अंत नहीं है। मार्क्स की पुस्तकें रहेंगी। लेनिन का इतिहास पढ़ाया जाएगा। सोवियत क्रांति का अध्ययन होगा। साम्यवाद की उपलब्धियों और विफलताओं पर बहस होगी, मगर ध्‍यान रहे, यहां किसी सड़क का नाम देना सार्वजनिक सम्मान का संकेत है। वस्‍तुत: यदि बंगाल अपनी सड़कों का नाम माइकल मधुसूदन दत्त, रंगलाल बंद्योपाध्याय, देबप्रसाद घोष या श्रीचैतन्य जैसे अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक व्यक्तित्वों के नाम पर रखता है, तो यह इतिहास को मिटाना न होकर उसे गौरवान्‍वित एवं संमृद्ध ही करना कहलाएगा। यह अपनी सार्वजनिक स्मृति को पुनर्संतुलित करना है।

भारत को रूस, चीन या यूरोप से आए विचारों को आवश्यकता के अनुरूप अध्‍ययन करना ही चाहिए, किंतु उसमें बहजाना वास्‍तव में अपने मूल से दूर हो जाना है, इसलिए हमें अपने बच्चों को यह बताना ही होगा कि भारत के पास अपना दर्शन है, अपना समाज-शास्‍त्र है, अपनी राजनीति है, अपनी अर्थचिंतन परंपरा है, अपना न्यायशास्त्र है और मनुष्य तथा प्रकृति के संबंध पर हजारों वर्षों का विमर्श भी है, वह भी इतना प्राचीन-अवार्चनीय कि उसके बराबर विश्‍व का कोई देश नहीं ठहरता है! 

असली लड़ाई : स्मृति की स्वतंत्रता

मार्क्सवाद की सबसे बड़ी आलोचना यहां से शुरू नहीं होती कि उसने वर्ग-संघर्ष की बात की। सबसे बड़ी समस्या तब उत्पन्न होती है जब वर्ग-संघर्ष की पद्धति समाज को समझने की एकमात्र कुंजी बन जाती है और आधुनिक कल्चरल मार्क्सिज्म नए संदर्भों में भारतीय समाज जीवन को अनेक झूठों के सहारे समाज जीवन को प्रभावित करता हुआ नजर आता है। आप स्‍वयं विचार करें- क्या संस्कृति को लगातार संघर्ष, सत्ता और पहचान की प्रतिस्पर्धा में बदल देने से समाज अधिक स्वतंत्र होता है या अधिक विभाजित? यह प्रश्न भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

सैमुअल हंटिंगटन ने द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स एंड द रीमेकिंग ऑफ वर्ल्ड ऑर्डर में आधुनिक विश्व-राजनीति में संस्कृति को केंद्रीय तत्व माना। पुस्तक के अध्याय “द फेडिंग ऑफ द वेस्ट: पावर, कल्चर एंड इंडिजेनाइजेशन” की शुरुआत पृष्ठ 81 से होती है। वस्‍तुत: भारत के संदर्भ में इसका अर्थ स्पष्ट है- भविष्य की प्रतिस्पर्धा सिर्फ अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति की नहीं होगी। सभ्यताएं अपनी सांस्कृतिक आत्मविश्वास के आधार पर भी प्रतिस्पर्धा करेंगी, इसलिए भारत को अपनी जड़ों से जोड़ना किसी प्रतिक्रियावादी राजनीति का कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यह राष्ट्रीय आत्मविश्वास का कार्यक्रम होना चाहिए।

बेशक हम मार्क्स को पढ़े, लेनिन को पढ़े, फ्रैंकफर्ट स्कूल को पढ़े, फूको को पढ़े, उत्तर-आधुनिकतावाद को पढ़िए। पर साथ ही उपनिषद, बुद्ध, महावीर, कौटिल्य, पतंजलि, चरक, आर्यभट, शंकर, रामानुज, वीर सावरकर, श्रीगुरुजी, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य, तुलसी, विवेकानंद, गांधी, आंबेडकर, अरविंद और टैगोर को भी हम सभी को लगातार पढ़ते रहना चाहिए । यकीन मानिए, जिस दिन भारत अपने बच्चों को दोनों पक्षों को पढ़ाकर अपना निष्कर्ष स्वयं निकालने देगा, उस दिन कोई विदेशी विचारधारा भारत को भीतर से कमजोर नहीं कर पाएगी। 

वस्‍तुत: यही असली सांस्कृतिक स्वतंत्रता है और इसी कारण कोलकाता की लेनिन सरणी और कार्ल मार्क्स सरणी के नाम पर चल रही बहस को सड़क के नामों से आगे ले जाकर इस प्रश्न पर ठहराना होगा कि क्‍या भारत की सार्वजनिक स्मृति का केंद्र भारत स्वयं होगा या किसी आयातित विचारधारा का चश्मा। मार्क्स, लेनिन या अन्‍य कुछ ओर ….?, इसलिए पश्‍चिम बंगाल में एक बार फिर जो पुनर्जागरण बेला मुख्‍यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्‍व में आई है, उसका हम सभी को ह्दय से स्‍वागत करना चाहिए!

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