डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

"बिहार में उर्दू दूसरी भाषा है। हम दूसरी भाषा को इस तरह खत्म नहीं होने देंगे। हम चाहते हैं कि उर्दू, जो हिंदुस्तान के लोगों की भाषा है और बाहर से नहीं आई है, उसे बचाया जाए। संस्कृत बाहर से आई, अंग्रेजी बाहर से आई। हिंदी और उर्दू हमारी भाषाएं हैं; वे हिंदुस्तान में पैदा हुईं।" ये बोल हैं, बिहार के किशनगंज से कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद के। 

वस्‍तुत: यह सार्वजनिक वक्तव्य भारत के इतिहास, भाषाविज्ञान और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े ऐसे प्रश्न खड़े करता है, जिनका उत्तर प्रमाणों, शोध और इतिहास से दिया जाना चाहिए। यह ठीक है कि लोकतंत्र में प्रत्येक जनप्रतिनिधि को अपनी बात रखने का अधिकार है, किंतु जब संसद का सदस्य भारत की प्राचीन भाषा, उसकी सभ्यता और उसके सांस्कृतिक इतिहास पर कोई दावा करता है, तब उसके मायने कई संदर्भों में अहम हो जाते हैं, इसलिए वक्‍तव्‍य का परीक्षण अकादमिक कसौटी पर भी होना आवश्यक है।

प्रश्न यहां उर्दू का नहीं है, क्‍योंकि यह तो सभी जानते हैं कि उर्दू भारत की ही भाषा है। वस्‍तुत: वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या यह कहना कि "संस्कृत बाहर से आई" उपलब्ध भाषावैज्ञानिक और ऐतिहासिक शोध से मेल खाता है? यदि इसका उत्तर "नहीं" है, तो फिर ऐसे कथन समाज में भ्रम उत्पन्न करते हैं। 

संस्कृत है भारतीय भाषाओं की विकासधारा का प्रमुख आधार

भारतीय भाषाओं के इतिहास का सबसे प्रामाणिक अध्ययन करने वाले विद्वानों में डॉ. भोलानाथ तिवारी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक "आधुनिक भाषाविज्ञान" (किताब महल, इलाहाबाद) में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं का विकास वैदिक एवं लौकिक संस्कृत → पालि एवं प्राकृत → अपभ्रंश → आधुनिक भारतीय भाषाओं की क्रमिक ऐतिहासिक प्रक्रिया से हुआ है। (पृष्ठ 210–215)

डॉ. तिवारी बताते हैं कि शौरसेनी अपभ्रंश से पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी और गुजराती विकसित हुईं। मागधी अपभ्रंश से भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, उड़िया और असमिया जैसी भाषाओं का विकास हुआ। अर्धमागधी से अवधी तथा पूर्वी हिंदी की अन्य बोलियाँ विकसित हुईं, जबकि महाराष्ट्री अपभ्रंश से आधुनिक मराठी का जन्म हुआ। 

वस्‍तुत: यह भाषाई विकासक्रम भाषाविज्ञान के दशकों के अध्ययन का परिणाम है नकि राजन‍ीति का। इसलिए यदि कोई यह दावा करता है कि ‘संस्कृत’ भारत की भाषा न होकर बाहर से आई हुई भाषा है, तब इस दावे को किसी भी मुख्यधारा के भाषावैज्ञानिक या साहित्य से कोई समर्थित प्राप्‍त नहीं होता है, क्‍योंकि जो भी यह बोल रहा है, वह झूठ बोलता है। 

संस्कृत का वैश्विक महत्व

इसी तरह से संस्कृत सिर्फ धार्मिक अनुष्ठानों की भाषा होने तक सीमित नहीं है। यह भारत की दार्शनिक, वैज्ञानिक और साहित्यिक परंपरा का आधार है। वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण, योगसूत्र, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, आर्यभटीय, न्याय, मीमांसा, वेदांत जैसे अनेक ग्रंथ और इन सभी ज्ञान परंपराओं का मूल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है। इसका अर्थ यह है कि संस्कृत बाहर से नहीं आई। यह भारत की मूल परिष्‍कृत भाषा है। 

क्या दक्षिण भारत संस्कृत से अलग था?

यह भी एक बड़ा भ्रम है कि संस्कृत का दक्षिण भारत से कोई संबंध नहीं था। वस्तुतः तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम द्रविड़ भाषा परिवार की भाषाएँ हैं, किंतु इन भाषाओं के साहित्य, दर्शन और शब्दावली पर संस्कृत का गहरा प्रभाव विद्यमान है।  प्रसिद्ध भाषाविदों के अनुसार तेलुगु और मलयालम की शब्दावली का बड़ा भाग संस्कृत मूल के शब्दों से समृद्ध हुआ। इसका अर्थ है यह भारत की सांस्कृतिक अंतःक्रिया का प्रमाण है। भारत की शक्ति इसी समन्वय में रही है, जिसमें तमिल भी अपनी है, संस्कृत भी अपनी है, उर्दू भी अपनी है और हिंदी भी अपनी है।

आर्य सिद्धांत : क्या बहस समाप्त हो चुकी है?

उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहासकारों ने तथाकथित "आर्य आक्रमण सिद्धांत" प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार आर्य मध्य एशिया से भारत आए और उन्होंने यहाँ की सभ्यता का निर्माण किया। बाद में इस सिद्धांत में अनेक संशोधन हुए। अनेक विद्वानों ने इसे "आक्रमण" के बजाय "आगमन" (Migration) के रूप में देखा, जबकि अनेक भारतीय इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इस पूरी परिकल्पना पर गंभीर प्रश्न उठाए।

आज स्थिति यह है कि "आर्य आक्रमण सिद्धांत" यानी कि आर्यन इन्वेजन थ्योरी पूरी तरह से ध्‍वस्‍त हो चुकी है। इसी संदर्भ में हरियाणा के राखीगढ़ी और भिराणा से प्राप्त पुरातात्त्विक साक्ष्यों ने भारतीय सभ्यता की प्राचीनता, उसके विकास और सांस्कृतिक निरंतरता पर अनेक नवीनतम जानकारियों को सामने ला दिया है। यही वे प्रमाण हैं जिन्होंने इतिहासकारों को भारत के अतीत को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया है।

राखीगढ़ी और भिराणा के उत्खननों ने भारतीय इतिहास की चर्चा को विश्वविद्यालयों के परिसर से बाहर निकाल कर आज घर-घर पहुंचा दिया है। इसके साथ ही पूरे देश के सामने एक प्रश्न खड़ा किया है कि क्या भारत के अतीत को औपनिवेशिक काल में स्थापित सिद्धांतों के आधार पर ही हमेशा पढ़ाया जाना चाहिए, या फिर नए वैज्ञानिक और पुरातात्त्विक प्रमाणों के आलोक में उसका पुनर्मूल्यांकन भी होना चाहिए?

राखीगढ़ी, जिसे आज सिंधु-सरस्वती सभ्यता के सबसे बड़े नगरों में गिना जाता है, वहाँ हुए उत्खननों का नेतृत्व प्रख्यात पुरातत्वविद् प्रो. वसंत शिंदे ने किया। उनके नेतृत्व में हुए शोधों से यह स्पष्ट हुआ कि यह क्षेत्र अत्यंत विकसित नगरीय जीवन, धातु विज्ञान, जल-प्रबंधन, कृषि और व्यापार का केंद्र था। प्राचीन डीएनए अध्ययन ने भी इस क्षेत्र की आबादी और उसके विकास पर नई बहस को जन्म दिया। 

इसी प्रकार भिराणा (फतेहाबाद, हरियाणा) में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक प्रो. के.एन. दीक्षित के निर्देशन में हुए उत्खननों ने ऐसे सांस्कृतिक स्तरों की पहचान की, जिन्हें अनेक शोधकर्ताओं ने हड़प्पा सभ्यता के प्रारम्भिक चरणों से जोड़ा। रेडियो-कार्बन डेटिंग के आधार पर कुछ अध्ययनों ने यह संभावना व्यक्त की कि इस क्षेत्र में मानव बसावट का इतिहास पूर्व में मानी गई समय-सीमा से भी अधिक प्राचीन हो सकता  यही कारण है कि इतिहासकार प्रो. कपिल कुमार बार-बार कहते हैं कि "इतिहास राजनीतिक आग्रहों से नहीं, साक्ष्यों से लिखा जाना चाहिए।" 

सरस्वती सभ्यता : नए प्रमाण अनेक संकेत देते हैं! 

भारत के इतिहास का एक बड़ा विमर्श सरस्वती नदी को लेकर भी है। प्रख्यात पुरातत्वविद् पद्मश्री विष्णु श्रीधर वाकणकर, जिन्होंने भीमबेटका की खोज कर भारतीय पुरातत्व को नई दिशा दी, उनका मत था कि उत्तर-पश्चिम भारत में अनेक प्राचीन स्थलों का विकास एक विशाल नदी तंत्र के किनारे हुआ था। बाद के वर्षों में डॉ. एस. कल्याण रमन सहित अनेक शोधकर्ताओं ने घग्घर-हाकड़ा नदी तंत्र और वैदिक सरस्वती के संबंध पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किए। 

उपग्रह चित्रों के आधार पर इसरो तथा अन्य संस्थानों द्वारा उत्तर-पश्चिम भारत में प्राचीन नदी-मार्गों का अध्ययन भी किया गया है। इन अध्ययनों ने स्‍पष्‍ट संकेत दिया कि इस क्षेत्र में कभी विशाल नदी तंत्र विद्यमान था, जहां भारत की प्राचीन सनातन संस्‍कृति का विकास हुआ। 

कीझड़ी ने भी बदला विमर्श

इतिहास को उत्तर और दक्षिण के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करना भी तथ्यों के अनुरूप नहीं है। तमिलनाडु के कीझड़ी (Keezhadi) उत्खनन ने दक्षिण भारत की प्राचीन नगरीय और सांस्कृतिक समृद्धि को सामने रखा। इससे यह स्पष्ट हुआ कि दक्षिण भारत की सभ्यता अत्यंत विकसित थी, किंतु इसका अर्थ उत्तर और दक्षिण का विरोध नहीं है। वास्तव में राखीगढ़ी, धौलावीरा और कीझड़ी ये तीनों स्‍थान मिलकर यह बताते हैं कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में समानांतर रूप से विकसित होती हुई अनेक सांस्कृतिक धाराएँ थीं, जोकि परस्पर जुड़ी हुईं थीं और एक व्यापक भारतीय सभ्यता का निर्माण कर रही थीं।

भाषा का सम्मान बनाम इतिहास का पुनर्लेखन

उर्दू भारत की विरासत है। इसमें असंख्य साहित्यकारों ने भारतीय संवेदना को अभिव्यक्त किया है और आज भी यह अभिव्‍यक्‍ति जारी है। इसी प्रकार तमिल का संगम साहित्य, कन्नड़ के पंप, तेलुगु के नन्नय, मलयालम के एझुत्ताचन और हिंदी के तुलसीदास जैसे अनेक साहित्‍यकार ये सभी भारत की सांस्कृतिक संपदा हैं, किन्तु एक सांसद द्वारा किसी भाषा के सम्मान के लिए दूसरी भाषा के इतिहास को नकारना न तो भाषाविज्ञान स्वीकार करता है और न ही इतिहास। 

यदि संस्कृत को भारत की ज्ञान-परंपरा की मूल भाषा के रूप में हजारों वर्षों से स्वीकार किया जाता रहा है, यदि आधुनिक भारतीय-आर्य भाषाओं के विकासक्रम में उसका केंद्रीय स्थान भाषावैज्ञानिक ग्रंथों में दर्ज है, तो उसके विपरीत कोई भी दावा प्रस्तुत करने वाले पर यह दायित्व है कि वह उसके समर्थन में समकक्ष स्तर के शोध और प्रमाण प्रस्तुत करे।

भारत की एकता का आधार सम्‍म‍िलित  संस्कृति है

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने संस्कृति के चार अध्याय में लिखा था, "भारतीय संस्कृति किसी एक जाति या प्रदेश की संस्कृति नहीं, बल्कि अनेक धाराओं के संगम से बनी राष्ट्रीय संस्कृति है।" इसी तरह से डॉ. भीमराव आंबेडकर ने Thoughts on Pakistan में भारत की सांस्कृतिक एकता को स्वीकार करते हुए लिखा कि भारत सिर्फ भौगोलिकता से ही नहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक इकाई है। वहीं स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत का भविष्य उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता में निहित है, इसीलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास को राजनीति का उपकरण मानना बंद किया जाए। वह सत्य की खोज का माध्यम है। 

निश्‍चित ही संसद में बैठा प्रत्येक जनप्रतिनिधि जब भाषा, संस्कृति और इतिहास पर बोलता है, तब उसे यह अवश्‍य ध्‍यान रखना चाहिए कि उसके बोले गए शब्द एक राजनीतिक दल का मत नहीं रखते, वे करोड़ों लोगों तक पहुँचते हैं, इसलिए ऐसे विषयों पर बोलते समय तथ्यात्मक शुद्धता और अकादमिक उत्तरदायित्व अत्यंत आवश्यक है।

कहना होगा कि भारत की सभ्यता किसी एक जाति, एक भाषा, एक क्षेत्र या एक पंथ की देन नहीं है। यह हजारों वर्षों की सतत सांस्कृतिक यात्रा का परिणाम है। संस्कृत ने इस यात्रा को ज्ञान दिया, तमिल ने उसे साहित्य दिया, पालि और प्राकृत ने उसे लोक से जोड़ा, उर्दू ने उसे नई अभिव्यक्तियाँ दीं, हिंदी ने उसे व्यापक संवाद दिया और भारत की सभी भाषाओं ने मिलकर इस राष्ट्र की चेतना को परस्‍पर वह स्वर दिए, जिसके परिणाम में भारत  आज अपने वर्तमान स्‍वरूप में साक्षात दिखाई देता है।

यही भारत का सत्य है। भाषा का सम्मान होना चाहिए, परंतु इतिहास का सम्मान उससे भी अधिक आवश्यक है। क्योंकि यदि इतिहास को तथ्यों के स्थान पर राजनीतिक आग्रहों से गढ़ा जाने लगे, तो विभाजन की रेखाएँ लोगों के मन में खिंचने लगती हैं और जब मन बँटते हैं, तभी राष्ट्र कमजोर होता है, इसलिए भारत को जोड़ने का सबसे बड़ा दायित्व सत्य, प्रमाण और सांस्कृतिक चेतना के पक्ष में दृढ़ता से खड़े रहने का है, न कि सांसद मोहम्मद जावेद की तरह झूठ फैलानेवाला बनने में है ।