संघ कार्य के विस्तृत विराट आकाश में अनेक नक्षत्र अपने तेज से पीढ़ियों को आलोकित करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक, 93 वर्ष की आयु में दिवंगत हुए श्रद्धेय शांताराम शर्राफ जी भी ऐसे ही तेजस्वी नक्षत्र थे, जिनका जीवन कर्मठ साधना, कार्यपद्दिति का अनुशासन और आत्मीयता का अद्वितीय उदाहरण रहा। उनका व्यक्तित्व ऐसा था, जिसमें संघ का प्रचारक जीवन, मधुर मानवीय संबंध और सतत अध्ययनशीलता तीनों का सुन्दर संगम देखने को मिलता था।

मेरा व्यक्तिगत परिचय शांताराम जी से वर्ष 2011 में हिमाचल से स्थान परिवर्तन के बाद छत्तीसगढ़, रायपुर में हुआ। उनके कक्ष के निकट के ही अतिथि कक्ष में निवास होने के कारण यह प्रथम भेंट ही ऐसी थी कि उनका व्यक्ति, कार्य एवं विचार से परिपूरित स्नेह और आत्मीय दृष्टि मुझे सदैव बाँधती रही। वे संघ की द्वितीय पीढ़ी के प्रचारक थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन संघ माध्यम से समाज कार्य में और राष्ट्रीय जीवन के उत्थान के लिए समर्पित किया।

शांताराम जी का एक अद्भुत गुण था—आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति, स्वयंसेवक या कार्यकर्ता पर अंतिम समय तक सतत दृष्टि रखना। चर्चा में स्थानीय पुराने संघ स्वयंसेवक, प्रतिष्ठित सामाजिक व्यक्ति की चर्चा करते हुये उनका आत्मीय भाव यह सुनिश्चित करता था कि हर स्वयंसेवक स्वयं को महत्त्वपूर्ण समझे और संघ जीवन से गहरे जुड़ाव का अनुभव करे। उनके पास आने वाला कोई भी व्यक्ति केवल अतिथि नहीं, बल्कि संघ परिवार का आत्मीय अंग बन जाता।

वे घोष वादक थे और उनके भीतर ताल और लय की गहरी साधना भी थी। अपने मधुर कंठ से गीत गाना उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा था। घोष के ताल और स्वर के साथ जब वे गान करते, तो वातावरण स्वतः ही प्राणवान हो उठता। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि संघ कार्य में निहित अनुशासन, ऊर्जस्विता और सांस्कृतिक चेतना का संदेश भी था।

संघ कार्यालय में उनका दिन विशेष रूप से पत्र-पत्रिकाओं के अध्ययन और विश्लेषण में व्यतीत होता। कोई भी पत्रिका, पत्रक या समाचार पत्र उनकी दृष्टि से ओझल नहीं रहता। वे गहराई से शब्दों का अवलोकन करते, गुण एवं दोषों की चर्चा तरते, उनके पीछे के भावार्थ को पकड़ते और फिर उन पर संबंधित कार्यकर्ताओं से चर्चा करते। यही उनका स्वभाव था, जिसे उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों तक अक्षुण्ण बनाए रखा।

प्रारम्भ में मेरे पास छत्तीसगढ़ का महाविद्यालय कार्य का दायित्व आया। विद्यालय एवं महाविद्यालय के वातावरण की पुछताछ कर जानकारी लेते, फिर वहां चलने वाली अनिष्टकारी, अधार्मिक, अराष्ट्रीय गतिविधि पर कार्य करने को कहते रहे। नित्य की सामाजिक व्यवहार, घटनाओं पर बहुत ही एकाग्रता से चर्चा मेरे साथ होती रही है।पूजनीय सरसंघचालक सुदर्शन जी के साथ उनके भावनात्मक आवेग चरम पर रहता, उनको देखते ही हाथ जोड़कर सदैव प्रथम वाक्य कहते सुदर्शन जी के सु-दर्शन प्राप्त हो गये। नमस्कार|

एक भावुक प्रसंग पूजनीय सुदर्शन जी के निधन का भी है। निधन का दुखान्त एवं मार्मिक समाचार मेरे द्वारा ही शांताराम जी को कार्यलय पर मिला था। पहले तो विस्मय एवं आश्चर्य से मेरी तरफ हीन दृष्टि से देखकर कहा "कैसी गलत बात कहता है अभी तो सैर से लौटे है।" जब पुन: कहा नहीं रहे तो तेज गति से चलते हुये आये और कक्ष के बाहर से ही भावुक हो पुन: वापिस अपने कक्ष में आ गये। बहुत देर तक भावुकता में शब्द विहीन निशब्द एवं शून्य होकर रह गये थे।

जब मेरे पास संघ के प्रचार विभाग का दायित्व आया, तब शांताराम जी के साथ मेरा संवाद जागरण पत्रिका और पत्र-पत्रिकाओ को लेकर और भी प्रगाढ़ हो गया। वे निरंतर इस पर चर्चा करते रहते कि समाचार-पत्रों में संघ का समाचार किस प्रकार आ रहा है, कहां कहां आया है, उसका स्वरूप कैसा है और विशेषकर ‘जागरण’ पत्रिका का संदेश प्रत्येक कार्यकर्ता तक कैसे पहुँचे। उनके लिए यह केवल सूचना का साधन नहीं था, बल्कि विचार प्रसार का माध्यम था। वे कभी-कभी ‘पाञ्चजन्य’ पत्रिका के गहन लेखों पर विमर्श करते और कई बार ‘वनबंधु’ पत्रिका की विशिष्टता की प्रशंसा भी किया करते। उनके लिए इन पत्रिकाओं का अध्ययन केवल बौद्धिक जिज्ञासा भर नहीं था, बल्कि संगठनात्मक कार्य का एक आवश्यक अंग था।

शांताराम जी से जब भी कोई मिलने आता, वे मंद-मंद मुस्कान के साथ अभिवादन करते। फिर सहज भाव से पूछते—“संघ में आजकल क्या चल रहा है?” इस सामान्य से प्रश्न के माध्यम से वे व्यक्ति के भीतर चल रही हलचलों, उसकी सक्रियता और उसके दृष्टिकोण को जानने का प्रयास करते। इसके बाद वे पत्रिकाओं की चर्चा करते, कभी हल्की-फुल्की फटकार देते और तुरंत ही पुनः मुस्कुराते हुए कहते—“बहुत अच्छा... करते रहो, आशीर्वाद है।” यही उनकी शैली थी—सख्ती और स्नेह का अद्भुत संतुलन।

उनका जीवन यह सिखाता है कि प्रचारक का कार्य केवल संगठन चलाना या कार्यक्रम बनाना नहीं है, बल्कि प्रत्येक स्वयंसेवक के मन में विचार और संस्कार की ज्योति प्रज्वलित करना भी है। शांताराम जी ने यही कार्य अपने जीवन पर्यन्त किया।संघ जीवन में शारीरिक, बौद्धिक और आत्मीयता—इन तीनों का समन्वय आवश्यक है। शर्राफ जी इन तीनों में प्रखर रहे। अनुशासित जीवनचर्या, संवेदनशील ह्रदय, सतत अध्ययन और असीम आत्मीयता—ये उनकी अमूल्य धरोहरें थीं, जो उनके समीप रहने वालों पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करेंगी।

आज जब हम श्रद्धेय शांताराम जी को स्मरण करते हैं, तो यह अनुभव होता है कि उन्होंने भले ही देह का परित्याग किया हो, किंतु उनका व्यक्तित्व, उनके संस्कार और उनका दिया हुआ मार्गदर्शन हमारे बीच निरंतर जीवित रहेगा।संघ परिवार और समस्त राष्ट्रभक्त समाज उनकी स्मृति को नमन करता है और संकल्प लेता है कि उनके आदर्शों को आत्मसात कर राष्ट्र कार्य की साधना में निरंतर आगे बढ़ेगा।वरिष्ठ स्वयंसेवक एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, छत्तीसगढ़ के पूर्व प्रांत प्रचारक श्री शांताराम सर्राफ जी की प्रथम पुण्य स्मृति पर शत् शत् नमन आपका मार्गदर्शन और स्मरण सदैव बना रहेगा।

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