एक बात विगत तीन दशक से भी अधिक समय से और खासकर 2014 से रोज़ कहीं जा रही है ।सिर्फ़ कहीं नहीं जा रही ,लिखी  जा रही  है , बोली जा रही  है और चिल्ला चिल्ला कर हर तरफ़ एक शोर पैदा किया जा रहा है ।देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तानाशाह हैं ।विरोध को वह कुचल देते हैं ।असहमति उन्हें नापसंद हैं ।वह एक क्रूर शासक हैं ।श्रीमती सोनिया गांधी उन्हें “मौत का सौदागर “भी कह चुकीं हैं ।श्रीमान राहुल गांधी मोदी की पीठ पर डंडे बरसाने की धमकी दे चुके हैं ।ममता दीदी उन्हें “दुष्ट “कह चुकीं हैं ।मणिशंकर अय्यर अन्हें “नालायक “कह चूकें हैं ।सूची और लंबी की जा सकती है ।गूगल कर लें । देश के मीडिया का एक बड़ा भाग और यू ट्यूबर्स विगत एक दशक से योजनाबद्ध मोदी के ख़िलाफ़ आग उगल ही रहे हैं ।

और इस बार …
दिल्ली के जंतर मंतर पर जो कहा गया ,जो बोला गया ,उसे सुना भी नहीं जा सकता ।पर छात्रों के वेश में अपना बौद्धिक संतुलन खो चुके ,विक्षिप्त युवाओं ने और खासकर नव युवतियों ने देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ जो अश्लील ,अभद्र और बेशर्मी से भरी टिप्पणियां की ,वह भारतीय इतिहास में एक काला अध्याय है ।

पर ,ये नरेंद्र मोदी कैसे तानाशाह हैं ? क्या तानाशाह ऐसा होता है ? एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत मोदी की हर स्तर पर आलोचना करना आज एक फ़ैशन बन गया है ।

वे निर्णय लें—तानाशाह।

वे निर्णय बदलें—कमजोर।

वे कठोर हों—तानाशाह।

वे पीछे हटें—डरपोक।

वे चुप रहें—अहंकारी।

वे जवाब दें—असहिष्णु।

आलोचना सिर्फ़ मोदी की ही नहीं ,उनकी दिवंगत माँ को भी नहीं बख्शा जा रहा है ।उनकी धर्म पत्नी श्रीमती जसोदा बेन जिनसे एक सुविचारित परस्पर सहमति से उनकी दूरी है ,उनको राजनीतिक विवादों के केंद्र में लाया जा रहा है ।

क्या तानाशाह ऐसा होता है ?चीन जाइए ।
उत्तर कोरिया घूम कर आइए और देश में ही आपातकाल को याद कीजिए । देश को जेल बना दिया गया था । प्रेस का गला घोंट दिया गया था ।
आज क्या है ,जिसके मन में जो आ रहा है ,बक रहा है ।पूरे देश में घृणित शब्दों का संसार रचा जा रहा है ।चैनल ,आग उगल रहे हैं,मोदी के ख़िलाफ़संपादकीय लिखे जा रहे हैं ।

क्या कोई नेता जेल गया ?

क्या चैनल बंद हुए ?
अख़बार चल रहे हैं न ?

जंतर मंतर पर क्या मंत्र और श्लोक पढ़े गए ?

क्या मोदी ने सुने नहीं होंगे ?

मोदी तानाशाह होते तो चीन का थ्यान मन चौक बनता जंतर मंतर ।

पर मोदी ने क्या किया ?

शांत रहे ।

जेंन जी को उन्हीं की भाषा में ,उन्हीं के प्लेफॉर्म पर “हाय फ्रेंड्स “कह कर संबोधित किया ।

क्या तानाशाह भूमि अधिग्रहण बिल वापस लेता ?
क्या तानाशाह कृषि भूमि सुधार विधेयक वापस लेता ?
वह कहते …
मैं चाहे यह करूँ ,मैं चाहे वो करूँ ,मेरी मर्जी ।
मोदी ने क्या कहा था ,याद कीजिए । मैं देश हित में किसानों के हित में लिया गया विधेयक वापस लेता हूँ ।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा नरेंद्र मोदी के घुटने टेकने का परिचायक नहीं है ।सोनम वांगचुक कह चुके थे ,नहीं चाहिए इस्तीफ़ा ।

पर एक पालक ,एक अभिभावक देख रहा था कि प्रधान के इस्तीफे को ढाल बना कर देश की युवा शक्ति को गुमराह कर देश को एक आग में झोंकने की पूरी तैयारी है ।

मोदी कृष्ण नहीं है ।मोदी शिवाजी भी नहीं है ।
पर ,वह प्रेरणा लेते हैं ,इनसे ।कृष्ण ,रणछोड़दास भी बने ,मथुरा की रक्षा के लिए । समय पर जरासंध का नाश भी हुआ ।शिशुपाल के सौ अपराध पर ही सुदर्शन चक्र चला । शिवाजी ने आगरा के क़िले से पलायन मंज़ूर  किया ।

कारण ,अंतिम लक्ष्य प्राप्त करना है ।

मोदी और भारत सरकार जानती है कि बड़ी लड़ाई जीतने के लिए छोटी लड़ाई से बच कर निकलना भी एक युद्ध नीति है । आने वाले दो वर्ष में देश को निर्णायक कदम उठाने हैं।विपक्ष और विदेशी ताकतें भी यह जानती है इसलिए देश में कई जंतर मंतर सजाने की तैयारी है । मोदी तानाशाह होते तो दिल्ली में भी एक छोटा ऑपरेशन सिंदूर करते । पर ,वह घर में घुसकर दुश्मन देश के नापाक मंसूबों को कुचलना भी जानते हैं और उन्ही के निर्दोष नागरिकों को यूक्रेन युद्ध में तिरंगे के कवच से बचाते भी हैं ।इसलिए अपने ख़िलाफ़ हुई अब तक की पराकाष्ठा को भी वह सहन कर गए ।

कारण ,वह देख रहे थे जो दिख रहा है ,वह उतना गंभीर नहीं ,जितना पर्दे के पीछे का षड्यंत्र है ।

प्रधान का इस्तीफ़ा एक रणनीतिक क़दम है ।और निश्चित ही मोदी सरकार को यह भी ध्यान आया होगा कि आक्रोश भी ज़मीनी स्तर पर कहीं न कहीं पनप रहा है ।यह सिर्फ़ नीट का गुस्सा नहीं है ।संवाद का सेतु टूट तो रहा है ।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत का बयान उल्लेखनीय है कि आज का युवा आदेश की नहीं ,संवाद की भाषा समझेगा ।उदाहरण भी प्रस्तुत कीजिए । इसलिए ,दिल्ली के प्रदर्शन के सबक भी हैं। सिर्फ़ चुनावी विजय ही पर्याप्त नहीं ।जन मत बेशक जरूरी है। पर जन  मन भी जीतना होगा ।
मन की बात कहनी भी चाहिए ।और सुननी भी ।नहीं तो योगेंद्र यादवों जैसे अराजक संसद नहीं ,सड़क से फैसले करवाने की तैयारी में हैं हीं ।

और अंत में फिर ,

मोदी या तो तानाशाह नहीं है या फिर क्या हम तानाशाह की परिभाषा बदल लें ?