मनुष्य का जीवन चुनौतियों से भरा है। हर चुनौती के समाधान का अपना मार्ग होता है। जीवन को सफल और समुन्नत बनाने के लिए स्वयं को योग्य बनाने का मार्ग बताने वाला शिक्षक ही होता है। इसीलिए पूरे संसार में सर्वाधिक सम्मान और महत्व शिक्षकों का है। समाज में यह महत्व एवं सम्मान सदैव स्मरण रहे, इसके लिए ही संसार भर में प्रतिवर्ष शिक्षक दिवस का आयोजन होता है। विभिन्न देशों में शिक्षक दिवस मनाने की अपनी-अपनी तिथियाँ और प्रतीक हैं। भारत में यह शिक्षक दिवस राष्ट्रपति रहे सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन के जन्मदिन पाँच सितंबर को मनाया जाता है।

किसी भी व्यक्ति की योग्यता, प्रतिभा और समझ को विकसित करने के दो माध्यम होते हैं—एक ज्ञान और दूसरा शिक्षा। माता-पिता के अनुभव, स्वयं के जीवन में आए उतार-चढ़ावों से मिले अनुभव एवं व्यक्ति विशेष की रुचि, प्रतिभा, क्षमता और मेधा-शक्ति का आकलन करके गुरु द्वारा उस व्यक्ति विशेष की विकसित बौद्धिक समझ को "ज्ञान" कहा गया है। रुचि एवं समय की आवश्यकता के अनुरूप निर्धारित पाठ्यक्रम में वर्णित सिद्धांतों के अनुसार किए गए अध्ययन कार्य को "शिक्षा" कहा गया है। अध्यापन या शिक्षण कराने वाले को अध्यापक और "शिक्षक" कहा गया।

मनुष्य जन्म के साथ ही जिज्ञासु होता है। सीखना, समझना और समझाना उसके स्वभाव में होता है। यह दिशा सकारात्मक हो, निर्माणात्मक हो, गलत दिशा में जाकर मनुष्य विध्वंसक न बन जाए—इसकी चिंता पूर्वजों ने की और एक शिक्षण परंपरा आरंभ हुई।

संसार में व्यवस्थित शिक्षण की परंपरा सबसे पहले भारत में आरंभ हुई। यह दो प्रकार की थी। एक निर्धारित विषय और उसके क्रमानुसार तथा दूसरी बालक की प्रतिभा, क्षमता, रुचि आदि का आकलन करके उसका मानसिक और बौद्धिक विकास आरंभ करना। निर्धारित विषय और पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा देने वाले को "आचार्य" कहा जाता था। पुरातन काल के आचार्य के कार्य-दायित्व का निर्वहन आज शिक्षक करते हैं। आरंभिक शिक्षण के बाद बालक के गुणों और प्रतिभा की दिशा का आकलन करके अध्यापन आरंभ करने वाले को गुरु कहा जाता था।

समय के साथ गुरुकुल परंपरा एक प्रकार से समाप्त जैसी हो गई और उसके स्थान पर शिक्षालय यानी विद्यालय आरंभ हुए। संसार का प्रत्येक देश शिक्षा और शिक्षण पर जोर देता है। प्रत्येक व्यक्ति शिक्षित बने—यह प्रयास हर स्तर पर हो रहे हैं। व्यक्तिगत, सामूहिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी। इसलिए अनेक देशों ने अपने स्तर पर शिक्षक दिवस की परंपरा आरंभ की और विश्व स्तर पर भी शिक्षक दिवस आयोजित होता है।

विश्व शिक्षक दिवस

शिक्षा और शिक्षक की महत्ता स्थापित करने के लिए प्रत्येक देश अपने प्रयास करता है। इसके निरंतर शोध और अनुसंधान के साथ शिक्षण व्यवस्था तो हो ही रही है, साथ ही शिक्षा और शिक्षण की महत्ता स्थापित करने के लिए लगभग सभी देशों में शिक्षक दिवस के आयोजन होते हैं। सबकी अपनी तिथियाँ हैं और सबके अपने आदर्श हैं।

जैसे चीन में महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस की स्मृति में 8 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। इसी प्रकार थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि देशों में शिक्षक दिवस मनाने की अपनी तिथियाँ हैं। फिर विश्व स्तर पर भी शिक्षक दिवस मनाने की पहल आरंभ हुई। संसार की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने वर्ष 1960 में इस विषय पर विमर्श किया और शिक्षक दिवस मनाने की पहल की। विश्व स्तर पर "विश्व शिक्षक दिवस" मनाने का आयोजन 1966 से आरंभ हुआ। "विश्व शिक्षक दिवस" की तिथि 5 अक्टूबर है। यह पहल यूनीसेफ ने की और संसार के विभिन्न देशों में बैठकें करके सरकारों को सहमत किया। 1994 तक इस अभियान में सौ से अधिक देश सम्मिलित हो गए, जो पाँच अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाते हैं।

भारत में शिक्षक दिवस

ज्ञान परंपरा को सर्वोच्च सम्मान देने की परंपरा भारत में अति प्राचीन है। अतीत में जहाँ तक दृष्टि जाती है, यह परंपरा मिलती है। तब भारत में विद्यालय को गुरुकुल कहा जाता था। इसमें आचार्य द्वारा शिक्षा एवं गुरु द्वारा दीक्षा देने की परंपरा रही है। भारत में गुरु को सर्वोच्च स्थान रहा है और गुरु-पूजन के लिए तिथि आषाढ़ की पूर्णिमा रही है, जिसे गुरु पूर्णिमा कहते थे। आज भी गुरु पूर्णिमा पर गुरु-पूजन होता है।

वर्तमान में आधुनिक शिक्षा ग्रहण करने वाली पीढ़ी पाँच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाती है। प्रतिवर्ष पाँच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाना 1962 में आरंभ हुआ। पाँच सितंबर की तिथि भारत के द्वितीय राष्ट्रपति और महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है।

एक बार राधाकृष्णन जी के कुछ शिष्यों ने मिलकर उनका जन्मदिन मनाने का विचार बनाया। जब वे डॉ. राधाकृष्णन जी से अनुमति लेने पहुँचे तो राधाकृष्णन ने सहमति नहीं दी। डॉ. राधाकृष्णन जी के इंकार करने पर शिष्यों ने उनके जन्मदिन पर उन्हें एक शिक्षक के रूप में सम्मानित करने की अनुमति माँगी, जिस पर डॉ. राधाकृष्णन जी सहमत हो गए।

1962 के इस प्रथम आयोजन में डॉ. राधाकृष्णन जी उपस्थित हुए और उन्होंने कहा था कि पूरी दुनिया एक विद्यालय है, जहाँ प्रतिक्षण कुछ-न-कुछ सीखने को मिलता है। कार्यक्रम में उन्होंने अपने जीवन की उपलब्धियों का श्रेय अपने शिक्षकों को दिया और कहा कि जीवन में शिक्षक हमें केवल पढ़ाते ही नहीं हैं, बल्कि जीवन के अनुभवों से गुजरने के दौरान अच्छे-बुरे के बीच फर्क करना भी सिखाते हैं, जो जीवन-पथ पर आगे बढ़ने का संबल होते हैं।

आगे चलकर भारत सरकार ने पाँच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की अधिकृत घोषणा कर दी। इस प्रकार भारत में 1962 से पाँच सितंबर को शिक्षक दिवस मनाने की परंपरा आरंभ हुई।

जीवन परिचय : सर्वपल्ली राधाकृष्णन

भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद्, महान दार्शनिक और सनातन परंपरा के आस्थावान विचारक सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के चित्तूर जिले के तिरुत्तनी ग्राम में हुआ था। यह तिरुत्तनी ग्राम चेन्नई से लगभग 84 किलोमीटर दूर है। तब यह ग्राम आंध्र प्रदेश के अंतर्गत था, लेकिन अब तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले के अंतर्गत है।

उनके पूर्वजों की परंपरा अति विद्वान और सम्मानित रही है। उनके पिता 'सर्वपल्ली वीरासमियाह' संत प्रकृति के एक आध्यात्मिक पुरुष थे और माता 'सीताम्मा' भारतीय संस्कृति और परंपराओं के लिए समर्पित गृहिणी थीं। पिता राजस्व विभाग में काम करते थे। राधाकृष्णन जी पाँच भाई-बहन थे। एक भाई उनसे बड़े और तीन उनसे छोटे थे।

उनका बाल्य जीवन अपने जन्म ग्राम तिरुत्तनी एवं तिरुपति जैसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थानों में बीता। पिता आध्यात्मिक जीवन के साथ आधुनिक शिक्षा के भी समर्थक थे। इसलिए उन्होंने राधाकृष्णन जी को प्रारंभिक शिक्षा के लिए क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में पढ़ने के लिए भेजा। आगे की शिक्षा वेल्लूर में हुई। महाविद्यालयीन शिक्षा चेन्नई के क्रिश्चियन कॉलेज में हुई।

वे पढ़ने और विषयों को समझने में बहुत कुशाग्र थे। उन्होंने अपनी सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं और छात्रवृत्ति भी प्राप्त की। वे अपना पाठ्यक्रम तो स्मरण करते ही थे, आसपास घटी घटनाओं का भी अनूठा विश्लेषण करते थे। इससे वे अपने साथियों और शिक्षकों दोनों में लोकप्रिय थे।

उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण का अध्ययन किया और बाइबिल के भी अनेक महत्त्वपूर्ण अंश कंठस्थ किए। इसके लिए उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान मिला। अपने शिक्षण काल में उन्हें एक विषय ने बहुत कचोटा। वह था कुछ ईसाई परंपरा के कट्टरपंथी शिक्षकों और छात्रों का भारतीय परंपराओं का परिहास करना और उसके अनुरूप जीवन जीने वालों का अपमान करना। इस कारण उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन में ही भारतीय दर्शन और परंपराओं का अध्ययन आरंभ कर दिया था।

उन्होंने दयानंद सरस्वती और स्वामी विवेकानंद जैसे विचारकों का तो अध्ययन किया ही, साथ ही आदि शंकराचार्य एवं वेदों के भाष्य का भी अध्ययन किया। उन्होंने मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता प्राप्त की। दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के बाद वे 1918 में मैसूर महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। फिर उसी कॉलेज में प्राध्यापक बने।

अपने महाविद्यालयीन दायित्वों के साथ अध्ययन और लेखन कार्य भी निरंतर रहा। उनके लेखों और संगोष्ठियों में दिए गए भाषणों में प्रमुख विषय भारतीय दर्शन और संस्कृति होता था। वे हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखते थे, जिसकी प्रशंसा विश्व भर के बुद्धिजीवियों में होती थी।

उनका जीवन विभिन्न विशेषताओं और दायित्वों से भरा था। उन्हें अपने जीवन में संसार भर से अनेक सम्मान प्राप्त हुए। स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज सरकार ने उन्हें "सर" की उपाधि से सम्मानित किया तो स्वतंत्रता के बाद उन्हें "भारत रत्न" से भी सम्मानित किया गया।

वे 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और 1939 से 1948 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चांसलर रहे। स्वतंत्रता के बाद उन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे।

यह निर्णय संविधान सभा ने लिया कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर-राजनीतिक व्यक्ति हैं, इसलिए स्वतंत्रता की मध्यरात्रि को उनका ही संभाषण होना चाहिए। अतएव 14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि को राधाकृष्णन जी का ऐतिहासिक संबोधन हुआ, जो ठीक बारह बजे तक चला और इसके बाद ही पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।

स्वतंत्रता के बाद 1952 में वे देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और दस वर्ष तक इस पद पर रहे। 1962 में देश के राष्ट्रपति बने और 1967 तक रहे। उनका निधन 1975 में चेन्नई में हुआ।

शिक्षक दिवस के उद्देश्य

भारत में शिक्षक दिवस का आयोजन केवल एक पक्षीय नहीं है। यह विद्यार्थियों द्वारा अपने शिक्षक के प्रति सम्मान करने का दिवस तो है ही, साथ ही शिक्षक को भी सतत अध्ययनशील रहने और आदर्श जीवन का संदेश देता है।

यूँ तो जीवन में प्रगति के लिए सतत सीखने, समझने और अध्ययन की आवश्यकता होती है, पर शिक्षक पर यह दोहरा दायित्व होता है। अध्ययन तो अपेक्षाकृत अधिक करना ही चाहिए। इसके साथ जीवन-शैली और व्यवहार में भी आदर्शवाद आवश्यक है।

विद्यार्थियों के मन में अनेक ऐसी जिज्ञासाएँ उठती हैं, जो पाठ्यक्रम के बाहर से हो सकती हैं। एक आदर्श शिक्षक वही है, जो उनका उचित समाधान कर सके। शिक्षक में यह क्षमता सतत अध्ययन से ही आती है।

राधाकृष्णन जी सतत अध्ययनशील रहे। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने अध्ययन किया ही, पर जब वे अध्यापक बने, तब भी लेखन और अध्ययन निरंतर रहा और अध्ययन तब भी नहीं छूटा, जब वे राष्ट्रपति रहे।

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों के लिए दूसरा संदेश शिक्षक के एक आदर्श व्यवहार और जीवन-शैली जीने के लिए है। विद्यार्थी शिक्षक की शैली से प्रेरणा लेते हैं। एक आदर्श शिक्षक ही विद्यार्थी में आदर्श गुणों का विकास कर सकता है।

यह बात अनेक बार डॉ. राधाकृष्णन जी ने शिक्षक दिवस पर अपने संदेश में कही। उन्होंने जहाँ शिक्षकों से सतत अध्ययनशील रहने और जीवन की आदर्श शैली अपनाने का आह्वान किया था, वहीं विद्यार्थियों से अपने विद्यार्थी जीवन में अपने नैसर्गिक गुणों का विकास करके भारत के श्रेष्ठ नागरिक बनने का आह्वान किया था। शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए यह संदेश आज भी महत्वपूर्ण है।

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