मैक्स मूलर  1847 में ईस्ट इंडिया कंपनी के ठेके पर रखा हुआ कर्मचारी था। उसके इरादे क्या थे ये उसकी अपनी चिट्ठियों ने ही बता दिया। उसकी कुछ चिट्ठियों को आप पढ़ें।

25 अगस्त 1856 को उसने बंसेन को लिखा कि भारत ईसाइयत के लिए रोम से ज्यादा तैयार है ये सड़ा हुआ पेड़ नकली सहारों पर टिका है मैं पुरोहितवाद को उखाड़ कर ईसाई शिक्षा का रास्ता खोलना चाहता हूँ।

9 दिसंबर 1867 को अपनी पत्नी को लिखता है मुझे पूरा भरोसा है भले मैं वो दिन न देखूं कि मेरा ये वेद संस्करण भारत के भाग्य पर बड़ा असर डालेगा ये उनके धर्म की जड़ है और उन्हें जड़ दिखाना ही पिछले 3000 साल में उससे निकली हर चीज को उखाड़ने का एक ही तरीका है।

और 1868 में ड्यूक ऑफ आर्गिल को लिखता है भारत का पुराना धर्म खत्म होने वाला है और अगर उसकी जगह ईसाइयत नहीं आई तो दोष किसका होगा। ये तीनों चिट्ठियां आज भी ऑक्सफोर्ड में रखी हैं और उसकी किताब लाइफ एंड लेटर्स में छपी हैं, ये साबित करती हैं कि वो कोई विद्वान नहीं मिशनरी एजेंट था।

उसने हथियार के तौर पर एक झूठ गढ़ा कि आर्य बाहर से आए थे। ये बात न वेद में है न पुराण में न किसी शिलालेख में ये सिर्फ उसके दिमाग की बनाई हुई थी। इस एक झूठ से उसने भारत को दो हिस्सों में बांट दिया उत्तर बनाम दक्षिण, आर्य बनाम द्रविड़, सवर्ण बनाम दलित और इसी झूठ पर अंग्रेजों ने फूट डालो राज करो को सही ठहराया।

1947 में देश आजाद हुआ तो लगा ये जहर फेंका जाएगा पर नेहरू की कांग्रेस ने उल्टा किया। उसी मैक्स मूलर को उठा कर बच्चों की किताब में हीरो बना दिया। आज भी ICSE की दसवीं में पढ़ाया जाता है कि मैक्स मूलर ने भारत के गौरवशाली अतीत की खोज की। एनसीआरटीई में 70 साल तक उसी की आर्यन थ्योरी रटाई गई और दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू में उसकी किताब को जरूरी बना दिया गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस को मैकाले का सपना पूरा करना था कि खून से भारतीय पर दिमाग से अंग्रेज लोग बनाओ और वही लोग बने जो मैक्स मूलर को भगवान मानते रहे।

तो सच ये है कि हिंदुत्व का तोड़फोड़ तलवार के बाद तलवार वाले लोगों की किताबों से हुआ। एक विदेशी ने वेद को उखाड़ने की स्क्रिप्ट लिखी और एक देसी पार्टी ने उस स्क्रिप्ट को स्कूल की किताब बना दिया। हम जंग में नहीं सिलेबस में हारे।

आज वर्तमान सरकार से अपेक्षा है कि औपनिवेशिक चिन्हों को पाठ्यक्रम से भी हटाए। मैक्स मूलर वही है जिसपे भारत सरकार ने 1974 में डाक टिकट जारी किया।

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