वर्तमान समय में संत रविदास का संदेश
आज जब समाज को जाति, वर्ग और विभिन्न पहचान के आधार पर बाँटने के प्रयास दिखाई देते हैं, तब संत रविदास का संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति विभाजन में नहीं, बल्कि समरसता और एकात्मता में है। मनुष्य की असली पहचान उसका जन्म नहीं, बल्कि उसका आचरण और उसका मानवीय दृष्टिकोण है।

संघ का शताब्दी वर्ष और पंच परिवर्तन का अभियान
इसी सामाजिक समरसता की दिशा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में “पंच परिवर्तन” के माध्यम से व्यापक समाज-जागरण का अभियान चला रहा है। यह पाँच परिवर्तन—
* सामाजिक समरसता,
* परिवार प्रबोधन,
* पर्यावरण संरक्षण,
* स्वदेशी जीवनशैली,
* नागरिक कर्तव्यबोध—
समाज में मानवीय विकास की नई चेतना उत्पन्न करने के प्रयास हैं।
इन अभियानों के माध्यम से संघ देशभर में समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने, पारस्परिक सम्मान बढ़ाने और सेवा-कार्य के माध्यम से संवेदना जागृत करने का प्रयास कर रहा है। सामाजिक समरसता के कार्यक्रमों, सेवा-प्रकल्पों, ग्राम-विकास कार्यों और सांस्कृतिक जागरण के माध्यम से संघ का प्रयास है कि समाज के प्रत्येक वर्ग में आत्मीयता और एकत्व का भाव मजबूत हो।

समरस समाज की दिशा में संकल्प
संत रविदास का जीवन और संदेश हमें यह सिखाता है कि समाज में परिवर्तन केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि आचरण से आता है। जब हम श्रम का सम्मान करेंगे, भेदभाव को त्यागेंगे और सेवा को जीवन का आधार बनाएँगे, तभी सच्चे अर्थों में समरस समाज का निर्माण होगा।
आज संत रविदास के 650वें प्राकट्य वर्ष का अवसर हमें यही प्रेरणा देता है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें और समाज में समता, करुणा और भाईचारे की भावना को मजबूत करें।
यदि संत रविदास की समता-दृष्टि और समाज-जागरण की चेतना को हम अपने जीवन और सामाजिक व्यवहार में स्थान दें, तो निश्चित ही एक ऐसा भारत निर्मित होगा जहाँ हर व्यक्ति सम्मान के साथ जी सके—एक ऐसा भारत जो वास्तव में समरस, संवेदनशील और मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण हो।

- कैलाश चन्द्र
( लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ स्तंभकार हैं)