‘हवा प्रतिकूल है’, ‘आदेश के विरुद्ध कार्य हुआ’, ‘चित्र उलटा है’, ‘गिलास औंधा पड़ा है’ और ‘प्रतिलोम क्रम में गिनिए’— इन पाँच वाक्यों में दिशा या स्थिति के सामान्य भाव में कुछ साम्य अवश्य है, पर इनमें प्रयुक्त शब्दों– उलटा, औंधा, प्रतिकूल इत्यादि को परस्पर बदलकर नहीं रखा जा सकता। इन सभी शब्दों में अर्थपरक विभेद है। आइए, देखते हैं–

उलटा सामान्य व्यवहार का विशेषण शब्द है। किसी वस्तु की स्वाभाविक दिशा, स्थिति या क्रम बदल जाए तो वह ‘उलटा’— उलटा चित्र, उलटा क्रम, उलटा उत्तर। यह ध्यान रहे कि इसे ‘उल्टा’ लिखना सर्वथा अशुद्ध है। हम कुछ उलटते हैं, ‘उल्टते’ नहीं हैं और इसका विलोम सुल्टा नहीं, ‘सुलटा’ होता है।

औंधा का प्रयोग प्रायः मुख या खुला भाग नीचे होने के अर्थ में होता है— औंधे मुँह गिरना, गिलास औंधा रखना आदि। अतः, प्रत्येक औंधी वस्तु में उलटने का भाव हो सकता है, किंतु प्रत्येक उलटी वस्तु ‘औंधी’ नहीं होती।
 
प्रतिलोम में क्रम या दिशा के विपरीत होने, तुच्छ होने का भाव प्रमुख है। ‘अनुलोम’ के विपरीत ‘प्रतिलोम’— जैसे प्रतिलोम क्रम। गणित में भी किसी संख्या के व्युत्क्रम के लिए इसका विशिष्ट प्रयोग होता है। इसलिए जहाँ ‘उलटा क्रम’ बोलचाल का सहज प्रयोग है, वहीं ‘प्रतिलोम क्रम’ अधिक पारिभाषिक और सुनिश्चित है।
 
अब प्रतिकूल को देखें। कूल  का अर्थ ‘किनारा’ है और ‘प्रति’ उपसर्ग सम्मुखता, विरोध आदि का भाव देता है। ‘अनुकूल’ अर्थात् कूल की ओर या सहायक दशा में; ‘प्रतिकूल’ अर्थात् उसके विपरीत— जो हमारे पक्ष में न हो अथवा बाधक हो। इसीलिए हवा प्रतिकूल, परिस्थिति प्रतिकूल और समय के साथ भी ‘प्रतिकूल’ विशेषण ही प्रयुक्त होगा। ध्यातव्य है कि जो प्रतिकूल है, उसका उलटा होना आवश्यक नहीं। हवा आपके गंतव्य की दिशा के विरुद्ध बह रही है तो वह प्रतिकूल है; ‘उलटी’ कहना हर संदर्भ में वही अर्थ नहीं देगा।

विपरीत में किसी दिशा, दशा, गुण या स्थिति के दूसरे छोर पर होने का व्यापक भाव है। इसकी व्युत्पत्ति ‘वि + परि + ई (गतौ) + क्त’ से मानी जाती है; मूल भाव है— मुड़ा हुआ, पलटा हुआ, दूसरी ओर गया हुआ अर्थात् ‘प्रतिवर्तित’ अथवा ‘विपर्यस्त’।
 
विरुद्ध की रचना ‘वि + रुध् + क्त’ से है। ‘रुध्’ धातु का मूल भाव है— रोकना या अवरुद्ध करना। इसी ‘रुध्’ धातु से विरोध (वि + रुध् + घञ्) भी बना है। इसलिए विरुद्ध में केवल विपरीत दिशा नहीं, बल्कि टकराव, असंगति, रोकने या विरोध का भाव भी है, जैसे– नियम के विरुद्ध, सिद्धांत के विरुद्ध, परस्पर विरुद्ध कथन इत्यादि।
 
संक्षेप में— उलटा स्थिति या क्रम बदलता है, औंधा मुख नीचे करता है, प्रतिलोम दिशा या क्रम पलटता है, प्रतिकूल साथ नहीं देता, विपरीत दूसरे छोर पर होता है और विरुद्ध सामने खड़ा होकर विरोध करता है।

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