मनीषा :– ‘मन्’ धातु में सोचने, चिंतन करने, पूजा, आदर करने अथवा सम्मान देने का भाव है। मन वह है, जो सोच-विचार करता है, जो जानना चाहता है, अनुभव करना चाहता है। मन की क्रिया को ‘मनन’ कहा जाता है। इसलिए जो ज्ञात है अथवा समझा हुआ है, उसे ‘मनित’ कहा जाता है। अगर किसी चीज को प्रत्यक्ष समझा है तो कह सकते हैं– “यह मुझे ‘मनित’ है; अर्थात् ज्ञात है”। 

विदित है कि हमारा मन विविध दिशाओं में विचरता है, भटकता है; लेकिन अगर हम इसे नियंत्रित कर लें तो कमाल होता है। नियंत्रित करनेवाली शक्ति ‘ईषा’ है। ईषा का मूल अर्थ हल का वह हिस्सा है, जिससे हल को दिशा दी जाती है, उसे नियंत्रित किया जाता है। इस प्रकार मनीषा मन की वह विशेष शक्ति, चाह, कामना, समझ अथवा प्रज्ञा है, जिससे वह विचार आदि करता है। इसी से व्युत्पत्न्न शब्द ‘मनीषिका’ का अर्थ भी समझ अथवा प्रज्ञा है।

जानना चाहिए कि मनीषा का विशेषण ‘मनीषी’ है। यह भी ध्यान रहे कि मनीषा से ही बने ‘मनीषित’ शब्द में केवल कामना अथवा इच्छा का भाव है। कुछ इच्छित, वांछित अथवा अभिलषित है तो कहेंगे यह ‘मनीषित’ है।

मेधा– मेधा में धारण करने की शक्ति अथवा स्मरणशक्ति के अच्छे होने का भाव है। मेधावी बच्चे न केवल पाठ को शीघ्र ही समझ लेते हैं, अपितु अधिक समय तक याद भी रखते हैं।

बुद्धि– ‘बुध्’ धातु से बने बुद्धि में जानने अथवा समझने का भाव है। जिसे बुद्धि, मति अथवा समझ आ गई, वह बुद्धिमान् हो गया। 

प्रज्ञा– ‘प्र’ का अर्थ प्रकृष्ट अथवा विशिष्ट होता है और ‘ज्ञ’ का अर्थ जाननेवाला। प्रज्ञ(विशेषण) का अर्थ है– ‘विशेष ज्ञान युक्त’, विद्वान् अथवा मेधावी। ‘प्रज्ञ’ के गुण की संज्ञा ‘प्रज्ञा’ है। अतः, प्रज्ञा का शब्दिक अर्थ प्रकृष्ट अथवा विशिष्ट ज्ञान है। 

प्रतिभा– प्रतिभा ‘प्रज्ञा’ से भी उच्च लब्धि वाला गुण है। ऐसी प्रज्ञा, जिसमें विशद कल्पनाशीलता हो, नवाचार हो, समाधानविषयक सामर्थ्य हो, उसे ‘प्रतिभा’ कहते हैं। प्रतिभा में ‘भा’ है, जिसमें चमक, प्रकाश आदिक का भाव है। [प्रति+ भा + क + टाप् = प्रतिभा]

अध्यवसाय से ज्ञान और प्रज्ञा की प्राप्ति संभव है; परंतु प्रतिभा को ईश्वरप्रदत्त माना जाता है। प्रतिभा का विशेषण ‘प्रातिभ’ है। उदाहरण : प्रातिभ-ज्ञान का अर्थ है– ‘प्रतिभा से प्राप्त ज्ञान’।

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