प्रचलित अर्थ में, सभ्यता शब्द का तात्पर्य समाज के व्यापक भौतिक पर्यावरण और इसकी उपलब्धियों से है, जैसे – कृषि, सड़कें, यातायात के साधन, नगरीकरण, स्‍वास्‍थ्‍य  सुविधाएँ, धातु कर्म, व्यावसायिक विशेषता, स्थापत्य इत्यादि। सभ्यता का पर्यायवाची शब्द है– ‘सभ्यत्व’।

ऐसा कहा जाता है कि सभ्यता अगर भौतिक-पर्यावरण है, तो संस्कृति मानसिक-पर्यावरण है या सभ्यता अगर शरीर है, तो संस्कृति उसकी आत्मा है या सभ्यता फूल है, तो संस्कृति सुगंध। पाश्चात्य विद्वान् जिसबर्ट ने कहा था– "सभ्यता बताती है कि हमारे पास क्या है, जबकि संस्कृति बताती है कि हम क्या हैं?" आइए, अब इन सभी शब्दों के मूल अर्थ को समझते हैं–

व्याकरणिक दृष्टि से सभ्यता ‘सभ्य होने का भाव’ है; शिष्ट और 'नम्र-आचरण' का द्योतक है। यह शब्द ‘भा’ धातु से बने ‘सभ्य’ से व्युत्पन्न है। सभ्य का अर्थ है– जो सभा में बैठने के योग्य है : 'सभायाम् अर्हति इति।" अब सभा में निहित 'भा' पर ध्यान दें! 

विदित है कि 'भा' धातु प्रकाश, चमक, कांति आदि का द्योतक है। इसी 'भा' से 'भास्' है, जो प्रकाश का पर्याय है। 'भास्' अथवा प्रकाश करनेवाले को 'भास्कर' कहते हैं, जो सूर्य का नाम है। बहरहाल, 'प्रभात' में भी यही 'भा' अथवा प्रकाश होता है, जहाँ 'प्र' उपसर्ग है। ध्यान दें कि 'प्रभात' बेला में विशेष प्रकाश अथवा चमक होती है। सभा में भी चमक-दमक है और सभा में बैठने वालों अथवा सभ्यजनों के पास ज्ञान का प्रकाश है; कांति है। जब ये शब्द अस्तित्व में आए, तब सभा में योग्य और कुलीन व्यक्ति (वि+अक्ति) ही बैठते थे। 'सभासद्' सभा के सदस्य होते थे, जो सभ्य होते थे।

विचारणीय है कि सभ्यता स्पष्टत: परिलक्षित होती है।  इसे मापा जा सकता है या सुधारा-बिगाड़ा जा सकता है; क्योंकि इसे हम देख सकते हैं। उन्नत-सभ्यता का अर्थ उन्नत सड़कें, बड़े मकान, अच्छी सफाई सुविधा और स्वास्थ्य सेवाएँ, यातायात के उन्नत साधन आदि हैं; लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि ये सब समवेत रूप में उन्नत-संस्कृति भी सुनिश्चित कर सकती हैं । 

'संस्कृति'– व्याकरणिक दृष्टि से 'संस्कृति' शब्द ‘कृ’ धातु से व्युत्पन्न ‘कृति’ में ‘सम्’ उपसर्ग जुड़ने ('सागम' व्यंजन संधि) से बना है। 'सम्' का अर्थ है– उत्तम अथवा श्रेष्ठ और कृति का अर्थ है– चेष्टाएँ, उपलब्धियाँ। इस तरह 'संस्कृति' का अर्थ हुआ– उत्तम चेष्टाएँ अथवा श्रेष्ठ उपलब्धियाँ।

जानना चाहिए कि ‘कृ’ धातु का अर्थ करना, बनाना, रचना करना है या मूल स्थिति(प्रकृति) है। इसी आधार पर संस्कृति ‘परिष्कृत स्थिति’ अथवा ‘सुधरी हुई स्थिति’ है और ‘विकृति’ ‘अवनति की स्थिति’ है। इसी प्रकार, 'अपसंस्कृति' का अर्थ– बुरी अथवा ख़राब संस्कृति है।