सेवा संस्कृत की 'सेव्' धातु से बनी संज्ञा है, जिसमें सम्मान, देखभाल, टहल आदि का भाव निहित है। जो सेवा करे, वह 'सेवक' है, जो सेवा के योग्य हो, वह 'सेव्य' है और जिसकी सेवा की जाए अथवा की गई, वह 'सेवित' है। सेवक का स्त्रीलिंग रूप 'सेविका' है, जिसके लिए परिचारिका, दासी, भृत्या, नौकरानी आदि शब्दों का प्रयोग होता है। यहाँ ध्यान दें कि विमान में सेवा प्रदान करनेवाली युवती अथवा महिला को परिचारिका कहते हैं, जिसे दासी अथवा नौकरानी कहना शिष्ट प्रयोग नहीं माना जाएगा। दासी कहते हैं– दास[दास् +अच्] या गुलाम की पत्नी को, इसलिए इस शब्द का प्रयोग सोच-समझ कर करना चाहिए। नौकरानी शब्द लोकप्रयोग में फ़ारसी के 'नौकर' में 'आनी' प्रत्यय जोड़कर बना शब्द है, जो घर में काम करनेवाली भृत्या, बाई, नौकर की पत्नी आदि के लिए प्रयुक्त होता है।

जो मन से सेवा करे, उसे कहेंगे– सेवानिष्ठ अथवा सेवा-परायण। स्पष्ट है कि 'सेवानिष्ठ' और 'सेवा-परायण' सेवा के प्रति समर्पित व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होनेवाले विशेषण शब्द हैं। सेवा के लिए 'सेवा-सुश्रूषा' का प्रयोग ख़ूब प्रचलित है। स्मरण रहे कि सुश्रूषा संस्कृत में 'शुश्रूषा' है, जिसका मूल अर्थ है– 'सुनने की इच्छा'। इसमें कर्तव्यपरायणता, आज्ञाकारिता, सेवा और टहल का भी भाव है क्योंकि किसीके लिए कुछ करने के लिए उसकी बातों को सुनना सबसे आवश्यक है। 

परिचर्या और चर्या में ‘चर्’ धातु है। चर् का अर्थ चलना, किसी के लिए भटकना आदि है। ध्यान दें कि चरण कहते हैं– जो चरने अथवा चलने का माध्यम बने। आगे जैसा आप चरेंगे या चलेंगे; वैसा आपका आचरण होगा या वैसी आपकी 'चर्या' होगी। प्रतिदिन एक ही आचरण या चर्या रखने से 'दिनचर्या' बनती है। व्रत का आचरण 'व्रतचर्या' है। ‘परि’ उपसर्ग का अर्थ है– ‘चारों ओर’। इसप्रकार, 'परिचर' का अर्थ है– जो किसी के चारों ओर अथवा आसपास घूमे, उसके लिए छोटा-मोटा काम करे, सेवक, अनुचर, टहलुआ, रक्षक, परिचारक आदि। 

परिचर का कार्य है– परिचर्या। परिचर्या [परि+ चर् + क्यप् + टाप्] का शाब्दिक अर्थ है : किसी के लिए या उसके कहे अनुसार उसके इर्द-गिर्द रहना, टहल करना, ख़िदमत करना आदि। परिचर्याविहीन-रोगी का अर्थ है– जिस रोगी की 'परिचर्या' के लिए कोई न हो। वैदिक शब्द 'वरिवस्या' और संस्कृत की एक और संज्ञा 'सपर्या' भी इसी नक्षत्र के भ्रमणशील शब्द हैं। सपर्या में सेवा के साथ-साथ पूजा, श्रद्धा और सम्मान का भाव है। कोई शिष्य अपने आध्यात्मिक गुरु की सेवा नहीं करता, सपर्या करता है। वरिवस्या शब्द में सम्मान और भक्ति का भाव मूल है, सेवा का भाव द्वितीयक। यह बना है 'वरिवस्' से, जिससे बने एक और शब्द 'वरिवसि' का अर्थ ही है– पूजा गया, सम्मानित अथवा सत्कृत।

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