आइए जानें कृति, कृती और कृत्ति  में अंतर 

सबसे पहले एक वाक्य देखें :– प्रेमचंद एक ‘कृती’ रचनाकार थे, जिनकी बहुचर्चित ‘कृति’ ‘गोदान’ है। 

‘कृति’(कृ+क्तिन्) शब्द का अर्थ है– जो कृत है, रचा, गढ़ा अथवा प्रणीत (प्र+ नीत) है। स्पष्ट है कि यह किसी रचना, किए हुए कार्य, उत्पादन, निर्माण इत्यादि के लिए प्रयुक्त होता है। काव्य-कृति, कृतिकार, कृतित्व आदि शब्दों में यही कृति है। कोई कृति मौलिक हो सकती है या अनुकृति, प्रतिकृति(नक़्ल या नकल), रूपांतरित-कृति(बदली हुई या संपादित) अथवा चौर्य-कृति (चुराई हुई कृति) हो सकती है।

जानना चाहिए कि यही ‘कृ’ प्रकृति, आकृति, विकृति, संस्कृति, कृत्य(जो किया जाना चाहिए; अर्थात युक्तियुक्त) इत्यादि में है। प्रकृति ‘प्र-कृति’ या ‘विशेष कृति’(ईश्वर की) है, विकृति बिगड़ी हुई कृति है, संस्कृति सुधरी हुई कृति है, जबकि ‘अंतः-प्रकृति’ अंदर का(आंतरिक या मूल) स्वभाव है।

यहाँ यह जानना रोचक है कि जादू या टोना-टोटका के प्रभाव को भी ‘कृति’ कहते हैं। इसका कारण यह है कि लोक में यह मान्यता होती है कि किसी ने कुछ कर दिया (टोटका आदि)। किसी का किया हुआ है, तो यह भी ‘कृति’ कहलाया।

‘कृती’ का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति जिसने स्तुत्य कर्म किया है, जो निष्णात(नि+स्नात) कुशल या दक्ष हो। पुण्यात्मा, दक्ष रचनाकार आदि को भी ‘कृती’ कहते हैं। प्रेमचंद एक कृती रचनाकार थे; अर्थात् यशस्वी रचनाकार थे। 

कृत्ति इन दोनों से सर्वथा भिन्न शब्द है। यह संस्कृत की स्त्रीलिंग संज्ञा(कृत् +क्तिन्= कृत्ति) है; जिसका अर्थ है– मृगचर्म, भोजपत्र, चर्म या चमड़ा इत्यादि। साधु कृत्ति(मृग-छाला अथवा मृगचर्म) पर बैठकर तप करते थे।