सबसे पहले एक प्रश्न : धूमपान शुद्ध है अथवा धूम्रपान? इस पर विचार करने से पूर्व आइए धूम और धूम्र को समझते हैं– ‘धूम’ का संबंध संस्कृत की ‘धू’ धातु से है। ‘धू’ में हिलने, हिलाने, कंपाने अथवा क्षुब्ध करने का भाव मिलता है। ‘धू’ से बने अनेक शब्दों में गति, हलचल और विक्षोभ का यह मूल भाव सहज ही देखा जा सकता है, जैसे– धू-धू करके जलना, धूम (तद्भव धुआँ) उठना आदि। ‘धूम मचाने’ से अनायास एक खूब हलचल का एक दृश्य-बिंब निर्मित होता है। इतना ही नहीं, हम रूई धुनते हैं, चोर-उचक्के की धुनाई करते हैं और दुःख या पछतावे में अपना सिर भी धुनते हैं। ‘धू’ से ही व्युत्पन्न एक अन्य शब्द ‘धूत’ में भी हिलाए, हटाए अथवा त्यक्त किए जाने का भाव मिलता है।
 
धूम और धूम्र : हम जानते हैं कि किसी जलती हुई वस्तु से ऊपर उठने वाला पदार्थ ‘धूम’ अथवा ‘धुआँ’ है। स्मरण रहे कि मानक वर्तनी ‘धुआँ’ है; ‘धुँआ’, ‘धुंआ’ अथवा ‘धूँआ’ लिखना उचित नहीं। अब धूम और धूम्र का अंतर समझते हैं:–  ‘धूम’ मुख्यतः संज्ञा है, जबकि ‘धूम्र’ विशेषण के रूप में ‘धुएँ से युक्त’, ‘धुएँ के रंग का’ अथवा ‘धूमिल वर्ण वाला’ अर्थ देता है। ‘धूम्रलोचन’ का शाब्दिक अर्थ है– धुएँ जैसे अर्थात् धूसर नेत्रों वाला। चूँकि कबूतर की आँखें ऐसी होती हैं, इसलिए उसे धूम्रलोचन भी कहा जाता है।

विचारणीय है कि आकाश में दिखाई देने वाला पुच्छल तारा ‘धूमकेतु’ है, ‘धूम्रकेतु’ नहीं। ‘केतु’ का एक अर्थ चिह्न अथवा पताका भी है; इसलिए धूमकेतु सुनते ही आकाश में धुएँ की पताका लिए कोई पिंड चलने का बिंब बनता है।

धूम से निर्मित शब्दों में ‘धूम’ का मतलब धुआँ ही जानना चाहिए, जैसे– ‘धूमित’ का अर्थ है— धुएँ से आच्छादित या धूमयुक्त। ‘धूमल’ में मटमैले या धूमिल होने का भाव है, जबकि ‘धूमावली’ धुएँ की पंक्ति, बादल या धूममाला के लिए प्रयुक्त होनेवाला शब्द है।
 
अब ‘धुंध’ पर आइए! धुंध केवल धुआँ नहीं है। यह वायु में व्याप्त सूक्ष्म कणों के कारण उत्पन्न अस्पष्टता अथवा ऐसी अवस्था है, जिसमें दृश्यता घट जाए। इसी से बना विशेषण है—‘धुँधला’।
 
निष्कर्षत: धूम अथवा धुआँ संज्ञा है, ‘धूम्र’ उसका गुण (विशेषण)।धूम्र मतलब ‘धुआँ’ नहीं होता। धूमपान (धूम + पान) में धूम अथवा धुआँ का पान किया जाता है, खींचा जाता है। अतः धूम को भीतर खींचने की क्रिया के लिए ‘धूमपान’ ही शुद्ध शब्द है; धूम्रपान नहीं।
 

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