समुद्र को सुखा देने की कल्पना भारतीय मानस में दो विराट प्रसंगों को सामने लाती है। एक ओर महर्षि अगस्त्य हैं, जिन्होंने अपने तपोबल से समुद्र को अपनी अंजलि में समेट लिया और दूसरी ओर प्रभु श्रीराम हैं, जिन्होंने समुद्र के सामने धनुष पर अग्निबाण चढ़ाकर अपने संकल्प की शक्ति का परिचय दिया। 

वस्‍तुत: वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस दोनों में ही समुद्र को चेतावनी देने के सामने आए ये प्रसंग मानवीय स्वाभिमान, नीति और शक्ति के महत्व को दर्शाते हैं। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार, अत्यधिक सज्जनता को दुर्जनों द्वारा कमजोरी मान लिया जाता है, इसलिए न्याय और शांति की स्थापना के लिए दण्ड-नीति और शक्ति का प्रदर्शन आवश्यक है। वहीं, संत तुलसीदास जी ने लोक-व्यवहार को समझाते हुए 'भय बिनु होइ न प्रीति' का प्रसिद्ध सूत्र दिया है, जिसके अनुसार अहंकारी या दुर्जन प्रकृति के सामने विनय व्यर्थ होती है और सामर्थ्य दिखाना ही एकमात्र उपाय बचता है।

विनय के बाद दण्ड की नीति का संदेश

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के सर्ग 21 में समुद्र से मार्ग प्राप्त करने के प्रसंग में भगवान श्रीराम के व्यक्तित्व का यह अत्यंत प्रभावशाली पक्ष है। तीन दिनों तक समुद्र से विनयपूर्वक प्रार्थना करने के बाद भी जब समुद्र प्रकट नहीं हुआ, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा- 

“साम्ना दानेन च क्षाम्या ब्रुवाणोऽपि गुणान्वितः। 

असामर्थ्यकृतं मन्ये लोकः संमन्यते नरम्॥” 

यानी गुणवान व्यक्ति जब शांति, क्षमा और मधुर व्यवहार का मार्ग अपनाता है, तब संसार कई बार उसकी इस नीति को सामर्थ्य के अभाव के रूप में देखने लगता है। श्रीराम आगे लक्ष्मण से कहते हैं कि अत्यधिक अहंकारी और दुर्जन लोगों के सामने विनय की नीति हमेशा प्रभावी नहीं होती। ऐसे लोगों को सीधेपन से सीधा करना कठिन होता है। कार्य की सिद्धि के लिए दण्ड को भी नीति का महत्वपूर्ण साधन माना गया है।

“न साम प्रेष्यते लोके दुर्जनेष्वतिमानिषु। 

कार्याणां दण्डमेवाहुरयं च परमं मतम्॥” 

यहां श्रीराम की दृष्टि व्यवस्था और मर्यादा की रक्षा का साधन है। अत: जब समझाने, विनय करने और शांतिपूर्ण प्रयासों से कोई मार्ग नहीं निकलता, तब शक्ति का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। इसी क्रम में श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं कि अहंकारी लोग शांति की भाषा से सहजता से वश में नहीं आते। संसार उस शक्ति का सम्मान करता है, जो व्यवस्था और मर्यादा की रक्षा करने में समर्थ हो।

“अकीर्तिं चावहन्त्येते न साम्यं गच्छन्ति मानिनः। 

लोको दण्डजितो बन्द्यः सुविधेयो हि लक्ष्मण॥” 

जब श्रीराम ने समुद्र सुखाने का संकल्प लिया

जब समुद्र ने बार-बार की विनय नहीं मानी, तब श्रीराम ने अपने धनुष पर बाण चढ़ाया और समुद्र को सुखा देने का महासंकल्प व्यक्त किया। वाल्मीकि रामायण में उनका संकल्प अत्यंत प्रखर शब्दों में आता है- 

“अद्य मद्धनुरुन्मुक्तैः शरैस्तोयाशयं महाम्। 

मर्यादां शोषयिष्यामि पातालतलवर्तिनीम्॥” 

अर्थात आज मेरे धनुष से छोड़े गए बाण इस विशाल जलराशि को सुखा देंगे और पाताल तक विस्तृत इसकी मर्यादा को नष्ट कर देंगे।

यह प्रसंग श्रीराम के क्रोध को महज आवेश के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। इसके पीछे तीन दिनों की धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा, विनय और संवाद का पूरा क्रम है। जब सभी शांतिपूर्ण उपाय निष्फल हो गए, तब श्रीराम ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। यही क्रम उनके चरित्र में धैर्य और पराक्रम के संतुलन को सामने लाता है।तुलसीदास ने इसी भाव को दिया ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का स्वरूप

वाल्मीकि रामायण के इसी प्रसंग का अत्यंत प्रभावशाली काव्यात्मक रूप गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में प्रस्तुत किया है। समुद्र के तीन दिनों तक विनय नहीं मानने पर श्रीराम लक्ष्मण से धनुष-बाण लाने को कहते हैं। सुंदरकांड में चौपाई आती है- 

“लछिमन बान सरासन आनू। 

सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥ 

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। 

सहज कृपन सन सुंदर नीति॥”

इसका भाव है कि मूर्ख के सामने विनय, कुटिल व्यक्ति के सामने प्रेम और जन्मजात कंजूस के सामने उदार नीति की बात करना निष्फल है। श्रीराम यहां यह समझाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक परिस्थिति के साथ एक जैसी नीति नहीं अपनाई जा सकती। जहां विनय का सम्मान हो, वहां विनय श्रेष्ठ है, जहां प्रेम का प्रत्युत्तर प्रेम से मिले, वहां प्रेम श्रेष्ठ है और जहां संवाद का मार्ग बंद हो जाए, वहां दण्ड की आवश्यकता उत्पन्न होती है। तुलसीदास आगे विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से इसी बात को और स्पष्ट करते हैं- 

“ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ 

क्रोधहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बए फल जथा॥” 

अर्थात मोह-ममता में डूबे व्यक्ति को ज्ञान का उपदेश देना, अत्यधिक लोभी व्यक्ति के सामने वैराग्य की चर्चा करना, क्रोधी व्यक्ति को शांति का उपदेश देना और कामना में डूबे व्यक्ति के सामने भगवान की कथा कहना उसी प्रकार निष्फल है, जैसे बंजर भूमि में बीज बोना। समुद्र से संवाद के इस पूरे प्रसंग का सार तुलसीदास भी एक अत्यंत प्रसिद्ध पंक्ति में प्रस्तुत करते हैं- 

“बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। 

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥” 

तीन दिन तक विनय करने के बाद भी जब जड़ समुद्र ने श्रीराम की प्रार्थना स्वीकार नहीं की, तब श्रीराम क्रोधित हुए और उन्होंने स्पष्ट किया कि कुछ परिस्थितियों में भय या दण्ड की चेतना के बिना अनुशासन और सम्मान की स्थापना कठिन हो जाती है। श्रीराम पहले विनय करते हैं, धैर्य रखते हैं और संवाद का मार्ग अपनाते हैं। जब वह मार्ग निष्फल हो जाता है, तब वे अपने पराक्रम का परिचय देते हैं। 

कहना होगा कि भारतीय वांग्मय में ये प्रसंग असंभव को संभव करने वाले संकल्प, पुरुषार्थ और सामूहिक शक्ति के प्रतीक हैं। आज जब संयुक्त राष्ट्र समुद्र के बढ़ते जलस्तर को मानव सभ्यता के सामने उभरते गंभीर संकटों में रख रहा है, तब इन प्रसंगों को एक नए संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। आज चुनौती समुद्र को सचमुच सुखाने की नहीं, उस संकट को नियंत्रित करने की है, जिसे मानव गतिविधियों ने जन्म दिया है।

संयुक्त की नई रिपोर्ट ने दुनिया को समुद्र के बढ़ते जलस्तर के गंभीर परिणामों के प्रति आगाह किया है। यह संकट तटीय बस्तियों, महानगरों, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों, आधारभूत ढांचे, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और मानव विस्थापन को प्रभावित कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 2024 में वैश्विक समुद्र स्तर में वार्षिक वृद्धि लगभग 5.9 मिलीमीटर तक पहुंच गई, जो अब तक दर्ज सबसे ऊंचे स्तरों में है।

भारतीय उपमहाद्वीप (दक्षिण एशिया) के लिए खतरे की गंभीरता और अधिक है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भारत के मुंबई और कोलकाता तथा बांग्लादेश के ढाका जैसे निचले डेल्टा क्षेत्रों को विशेष रूप से संवेदनशील बताया गया है। इन क्षेत्रों में 1.4 करोड़ से अधिक लोगों के स्थायी विस्थापन का खतरा है। 

समुद्र का बढ़ता जलस्तर मानव जीवन के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार समुद्र स्तर से जुड़े खतरों के कारण कम से कम 1.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का आधारभूत ढांचा जोखिम में है। शहरी आधारभूत ढांचे, जल प्रणालियों, परिवहन, ऊर्जा ग्रिड, इमारतों और भूजल संसाधनों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। अमेरिका के मियामी और न्यूयॉर्क तथा चीन के ग्वांगझू जैसे शहर भी बड़े आर्थिक जोखिम का सामना कर रहे हैं। इन शहरों में खतरे में आने वाली तटीय संपत्तियों का अनुमानित मूल्य 2 से 3.5 ट्रिलियन डॉलर के बीच है। इससे स्पष्ट होता है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के सामने भी इसका व्यापक वित्तीय खतरा मौजूद है।

सामूहिक संकल्प ही सबसे बड़ा उत्तर

संयुक्त राष्ट्र का आकलन बताता है कि समुद्र स्तर में कुछ वृद्धि इस सदी में बनी रहेगी, क्योंकि अतीत में पैदा हुई गर्मी का प्रभाव लंबे समय तक कायम रहेगा। आगे समुद्र कितना बढ़ेगा और उसका प्रभाव कितना व्यापक होगा, यह आज लिए जाने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगा, इसलिए समाधान भी सामूहिक होना चाहिए। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से कमी, तटीय शहरों की बेहतर योजना, मैंग्रोव और प्राकृतिक तटीय सुरक्षा का संरक्षण, मजबूत जल निकासी व्यवस्था, समुद्र स्तर की निरंतर निगरानी, पूर्व चेतावनी प्रणाली, जलवायु अनुकूल आधारभूत ढांचा और संकटग्रस्त समुदायों के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता समय की आवश्यकता है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार विकासशील देशों को जलवायु अनुकूलन के लिए हर वर्ष 310 से 365 अरब डॉलर की आवश्यकता है, जबकि 2023 में उन्हें लगभग 26 अरब डॉलर उपलब्ध हुए। यह अंतर वैश्विक स्तर पर जलवायु वित्त की बड़ी चुनौती को सामने रखता है।

अगस्त्य का चुल्लू और पुरुषार्थ का संदेश

ऐसे समय में भारतीय परंपरा का समुद्र संबंधी प्रतीक नए अर्थ ग्रहण करता है। महर्षि अगस्त्य की कथा में समुद्र को अपनी अंजलि में समेट लेना उस संकल्प का प्रतीक है, जिसमें असंभव दिखाई देने वाली बाधा को व्यापक हित के लिए चुनौती दी जाती है। इसी तरह से रामकथा में समुद्र के सामने श्रीराम का धनुष उठाना भी इसी पुरुषार्थ की अभिव्यक्ति है। तीन दिन की प्रार्थना के बाद श्रीराम ने शौर्य का संकल्प लिया। इसके बाद समुद्र पर सेतु निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। वानर सेना ने सामूहिक प्रयास से वह कार्य पूरा किया, जिसे अकेले किसी एक व्यक्ति के लिए कर पाना संभव नहीं था।

आज इन प्रसंगों की आधुनिक व्याख्या प्रकृति पर विजय प्राप्त करने के संदर्भ में है, जोकि प्रकृति के संतुलन की रक्षा के संकल्प में ही दिखाई देती है। आज 'समुद्र सुखाने' का अर्थ समुद्र को नष्ट करना नहीं, उस ताप और प्रदूषण को रोकना है, जो समुद्री पारिस्थितिकी और जलवायु संतुलन को प्रभावित कर रहा है। साथ ही संपूर्ण विश्‍व में हर जगह जहां भी संभव है समुद्र के जल का उपयोग अधिक से अधिक करना है। 

भारत के लिए इस संकट की तैयारी बहुआयामी होनी चाहिए। मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों की सुरक्षा, सुंदरबन जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों का संरक्षण, हिमालयी ग्लेशियरों की निगरानी तथा कृषि और जल सुरक्षा को एक समग्र राष्ट्रीय रणनीति से जोड़ना होगा। समुद्र के साथ संघर्ष की भाषा से आगे बढ़कर संतुलित सह-अस्तित्व की राह तलाशनी होगी। विज्ञान, तकनीक, नीति और सामाजिक भागीदारी को एक साथ लाकर भारत अपने तटीय क्षेत्रों को अधिक सुरक्षित बना सकता है।

वस्‍तुत: भारतीय परंपरा में सामूहिक पुरुषार्थ की भावना सदियों पुरानी है। अगस्त्य का तपोबल और श्रीराम का संकल्प इसी चेतना के प्रतीक हैं। आज मानवता के सामने विज्ञान और नीति के माध्यम से उस चेतना को व्यवहार में उतारने का अवसर है। 'चलो मिलकर समुद्र सुखा दें' आज एक शाब्दिक आह्वान के स्थान पर सभ्यतागत रूपक बन सकता है। चलो मिलकर उस संकट को कम करें, जो समुद्र के असामान्य विस्तार का कारण बन रहा है। चलो कार्बन उत्सर्जन घटाएं, हिमालय को सुरक्षित रखें, तटीय क्षेत्रों की रक्षा करें, शहरों को भविष्य के संकटों के लिए तैयार करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए धरती को सुरक्षित बनाएं।

अब अंतिम बात- समुद्र से युद्ध करना मानवता का लक्ष्य नहीं हो सकता। लक्ष्य समुद्र और मनुष्य के बीच संतुलन कायम रखना है। प्रकृति को झुकाने का सबसे बड़ा पुरुषार्थ यही होगा कि मनुष्य अपने लालच, लापरवाही और असंतुलित विकास पर नियंत्रण स्थापित करे। सामूहिक संकल्प जब विज्ञान और नीति की शक्ति से जुड़ता है, तब असंभव दिखाई देने वाली चुनौतियों के सामने भी समाधान का रास्ता खुलता है। हम उम्‍मीद करें, भारतीय वांग्‍मय के इन दो प्रसंगों से विश्‍व कुछ सीख लेगा!

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