व्रत शब्द का अर्थ है– प्रण अथवा प्रतिज्ञा। ‘वृ’ धातु से बने इस शब्द में मानसिक रूप से कुछ वरण करने या चुनने का भाव है। किसी धार्मिक अनुष्ठान को पूर्ण शुचिता से निभाने के लिए, उपवास आदि को चुनने एवं साधना के लिए जाने वाले प्रण के लिए ‘व्रत’ शब्द का प्रयोग होता है। देखा जा सकता है कि लोकजीवन में जिन-जिन धार्मिक आयोजन अथवा पर्व में ‘व्रत’ लगा है, उनमें शुचिता और नियम-धर्म अधिक रहता है। यही कारण है कि कृष्णाष्टमी, नवरात्र आदि का ‘व्रत’ होता है। 

स्मरण रहे कि व्याकरणिक दृष्टि से शुद्ध शब्द ‘नवरात्र’ है, नवरात्रि नहीं। सामासिक पद ‘नवरात्र’ का अर्थ है– ‘नौ रात्रियों का समाहार’। ‘नवरात्र’ में कलश स्थापना के साथ नौ दिन उपवास (उपवस् से व्युत्पन्न; अर्थ समीप रहना); अर्थात् माँ के साथ रहने का व्रत निष्ठापूर्वक निभाया जाता है। ध्यातव्य है कि होली का व्रत या पर्व नहीं होता, ‘त्योहार’ होता है; क्योंकि इसमें साधना नहीं, खाना-पीना और उत्सव का भाव प्रमुख होता है। 

त्योहार : नौ दिनों तक नवरात्र का व्रत रखने के पश्चात् विजयादशमी का ‘त्योहार’ मनाया जाता है, जो हमारी उत्सवधर्मिता का सूचक है। नूतन वस्त्र, मिठाइयाँ आदि के व्यवहार के साथ यह त्योहार मनाया जाता है। त्योहार के अवसर पर मिलने वाले शगुन को ‘त्योहारी’ कहा जाता है। कुल मिलाकर त्योहार मुख्यतः खुशी और धूमधाम का ‘उत्सव’ होता है। 

उत्सव : उत्सव में हर्ष अथवा आनंद का भाव प्रमुख होता है। स्मरण रहे कि उत्सव(उद् + सू +अप्) में सीधे-सीधे धार्मिकता का समावेश नहीं होता। हाँ कोई उत्सव धार्मिक भी हो सकता है, पर यह जन्मदिन आदि किसी अन्य अवसर पर भी मनाया जा सकता है। 

पर्व : व्रत में जहाँ धार्मिक साधना और सादगी का भाव है; वहीं पर्व इससे कुछ व्यापक होता है और इसमें धार्मिक आयोजन आदि भी संयुत(जुड़ा) होता है। भाषिक दृष्टि से ‘पर्व’ का अर्थ है– गाँठ, जोड़ या संधि। जानना चाहिए कि पर्व से ही ‘पर्वत’ शब्द बना है, जो बहुत सारी चट्टानों का जोड़ होता है। आपके हाथों की उंगलियों पर भी इसलिए ‘पर्वत’ बनते हैं। प्राचीन ग्रंथों में अध्याय को ‘पर्व’ लिखा गया है। वस्तुतः, ये विशिष्ट ‘घटनाओं के जोड़’ या ‘संधिस्थल’ हैं। ‘नवरात्र’ पर्व भी है, क्योंकि दो ऋतुओं के जोड़ अथवा संधि पर इसका आयोजन होता है।
 

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