क्षेप शब्द बना है, 'क्षिप्' धातु से [क्षिप् + घञ् = क्षेप]। क्षेप का अर्थ है– फेंकना, उछालना, डालना इत्यादि। क्षिप्त का अर्थ है– फेंका हुआ अथवा मिलाया हुआ। प्रक्षिप्त का अर्थ है– विशेष रूप से फेंका अथवा मिलाया हुआ। किसी प्राचीन ग्रंथ में कुछ ‘प्रक्षिप्त’ है तो इसका आशय है कि यह मूल कृति में नहीं था; बाद में कभी जोड़ दिया गया अथवा मिला दिया गया। किसी ग्रंथ का वह अंश जो बाद में मिलाया गया हो, ‘प्रक्षिप्तांश’ कहलाता है। ज्ञातव्य है कि क्षेपण [क्षिप् + ल्युट् = क्षेपण] का अर्थ है– फेंकना, भेजना, गाली देना इत्यादि। 'क्षिप्' धातु से ही बने क्षेपक[क्षिप् + ण्वुल् = क्षेपक] का अर्थ है– फेंकने वाला, बीच में मिलाने वाला, भेजने वाला इत्यादि।

आक्षेप : आक्षेप– यह बना है, 'आ+क्षेप' से। इसका शाब्दिक अर्थ है,  कुछ फेंकना, गिराना आदि; परंतु प्रयोग में इसका अभिप्राय किसी को निंदनीय अथवा दोषी सिद्ध करने के लिए प्रयुक्त शब्दों से होता है। दूसरे शब्दों में, किसी को ग़लत अथवा बुरा सिद्ध करने के लिए फेंके गए(प्रयुक्त) शब्दों को आक्षेप कहते हैं। आक्षेप लगने से प्रतिष्ठा धूमिल होती है।

अभिक्षेप : यह ‘आक्षेप’ से प्रभाव में कम अथवा हलका होता है। अभि उपसर्ग का अर्थ–  'की ओर', 'की दिशा में', सामने आदिक है। जैसे ‘अभिगम’ का अर्थ ‘की ओर गमन करना या जाना’ है; वैसे, ‘अभिक्षेप’ का मूलार्थ है– किसी की ओर या किसी के प्रति कुछ फेंकना(शब्द)। यह साधारण दोषारोपण के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द है। अभिक्षेप लगने से भी किसी की प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है। 

भर्त्सना– संस्कृत के 'भर्त्स्' से बने इस शब्द में धमकाने, झिड़कने और कड़ी निंदा करने का भाव है। ‘भर्त्स्’ का अर्थ है– धमकाना अथवा अपशब्द कहना। भर्त्सना शब्द का प्रयोग खूब(ख़ूब अशुद्ध है।) बुरा-भला कहने, शाप देने आदि के लिए होता है। इसमें कटुता का भाव भी उपस्थित रहता है।

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