कोई जैसा कर रहा है, उसे देखकर वैसा करने की कोशिश अनुकरण है। यह शब्द 'अनु' और 'करण' से बना है। करण कार्य के लिए आया है और अनु का अर्थ है– पीछे या बाद। इस तरह, अनुकरण शब्द का अर्थ हुआ– कार्य के पीछे-पीछे वही कार्य करना। अतः, किसी के दिखाए मार्ग पर चलना और जो वह करे, वह करना 'अनुकरण' है। जो अनुकरण करता है, उसे 'अनुकारी' कहा जाता है। 

‘अनुसरण’ शब्द 'अनु' और 'सरण' से बना है। अनुकरण की तुलना में देखें तो 'करण' की जगह 'सरण' है। 'सरण' शब्द का अर्थ है– सरकना, मंथर गति से चलना, गमन करना या जाना। सरण से ही सरणि बना है; जिसका अर्थ है– मार्ग। 'अनु' का अर्थ है– पीछे, बाद, पीछे लेकिन नज़दीक आदि। इस तरह अनुसरण का अर्थ हुआ– किसी के पीछे चलना, उसको मानना। उसकी तरह करना नहीं, उसके पीछे चलना। अर्थात् अगर कोई हमसे बहुत आगे है तो उसे देखकर हम भी उसी मार्ग पर धीरे-धीरे आगे बढ़ें, तो यह 'अनुसरण'(अनु+सृ+ल्युट्) है।

वस्तुतः, हम जिसका 'अनुसरण' करते हैं, उसके पीछे चलते हैं अथवा कहें कि उसके 'अनुसार' चलते हैं। ध्यान दें कि 'अनुसार' भी 'सृ' मूल से ही बना है– 'अनु+ सृ + घञ् = अनुसार'। पीछे अथवा किसी के अनुसार चलने वाले को 'अनुसारक' कहा जाता है। पीछा करना अथवा पीछे-पीछे जाना के लिए 'सृ' मूल का ही एक अन्य शब्द है– 'अनुसारण'।

'अनुसरण' की तरह ही एक शब्द है– 'अनुगमन'। गमन जाने अथवा चलने को कहते हैं। 'सरण' में गति मंथर थी, यहाँ 'गमन' में गति के साथ कोई बाध्यता नहीं है– यह तीव्र भी हो सकती है, सामान्य भी और मंथर भी। अस्तु, किसी के पीछे-पीछे चलना, 'अनुगमन' है। पीछे चलने की क्रिया 'अनुगमन' है। पीछे चलने वाले को 'अनुगामी' कहते हैं। 'अनुगामी' का स्त्रीलिंग रूप है– 'अनुगामिनी'। वनगमन में माँ सीता, प्रभु श्रीराम की 'अनुगामिनी' बनी थीं।

इसी से मिलता-जुलता एक शब्द है– 'अनुवर्तन'। वर्तन का अर्थ है– बर्ताव, व्यवहार, उपयोग में लाना आदि। अनुवर्तन शब्द का अर्थ हुआ– किसी के बर्ताव अथवा व्यवहार से प्रभावित होकर वैसा ही बर्ताव अथवा व्यवहार करना। महापुरुषों के व्यवहार का अनुवर्तन करना चाहिए।
 

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