बुंदेलखंड की धरती भारत वह क्षेत्र है, जिस क्षेत्र ने वर्षों तक सूखे, अनियमित वर्षा, सीमित सिंचाई और भूजल संकट की मार झेली है, वहां केन-बेतवा लिंक परियोजना एक बड़े परिवर्तन की उम्मीद लेकर आगे बढ़ रही है। लगभग ₹44,605 करोड़ की यह परियोजना 10.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, करीब 62 लाख लोगों को पेयजल तथा 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने के लक्ष्य के साथ बुंदेलखंड के सामाजिक-आर्थिक जीवन को बदलने की क्षमता रखती है। 

हालांकि इस वक्‍त इस परियोजना को लेकर एक नया ही दृष्‍य देखने को मिल रहा है। लग रहा है जैसे, राजनीति की भेंट इसे चढ़ाने के लिए समुचा विपक्ष एकजुट हो गया है। बिना अध्‍ययन के अनेक वामपंथी संगठन भी सक्रिय हो उठे हैं। इन परिस्‍थ‍ितियों में “केन-बेतवा लिंक परियोजना” को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के चश्मे से देखना उसके व्यापक जनहित को सीमित कर देना होगा। हां, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों से जुड़े हर सवाल का जवाब पारदर्शिता और संवेदनशीलता से दिया जाना चाहिए। शासन के स्‍तर पर वह किया ही जा रहा है। 

यहां ध्‍यान रहे कि केन-बेतवा लिंक परियोजना की जरूरत को समझने के लिए सबसे पहले बुंदेलखंड की भौगोलिक और सामाजिक वास्तविकता को समझना होगा। लंबे समय से यह क्षेत्र कम और अनियमित वर्षा, सिंचाई की सीमित सुविधा तथा कई क्षेत्रों में भूजल की कमी से जूझता रहा है। खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा पर निर्भर रहने के कारण किसान मौसम की अनिश्चितता के सामने असहाय हो जाते हैं। ऐसे में पानी की स्थायी और अपेक्षाकृत भरोसेमंद उपलब्धता ही वह व्‍यवस्‍था है जोकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना को बदल सकती है, इसीलिए ही केन-बेतवा परियोजना बनी है। 

इसका मूल उद्देश्य है, केन नदी के पानी को बेतवा नदी के क्षेत्र तक पहुंचाना। इसके अंतर्गत पन्ना और छतरपुर में 96.7 मीटर ऊंचा दौधन बांध, 216.465 किलोमीटर लंबी लिंक नहर सहित लोअर ऑर्र परियोजना, कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना जैसे कार्य शामिल हैं। परियोजना का शिलान्यास 25 दिसंबर 2024 को हुआ और इसे वर्ष 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

राजनीति के शोर में तथ्य पीछे न छूटें

परियोजना को लेकर हाल में विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे पर राजनीतिक विवाद सामने आया है। उपलब्ध प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार चार संबंधित परियोजनाओं से प्रभावित आबादी करीब 23 हजार है, जबकि राजनीतिक दावों में यह संख्या लगभग 50 हजार तक बताई गई। केन-बेतवा परियोजना से पन्ना और छतरपुर के 22 गांव प्रभावित हैं। परियोजना से जुड़े 5,039 प्रभावित परिवारों के लिए लगभग ₹629.87 करोड़ के पुरस्कार पारित किए गए हैं और इनमें से लगभग ₹604.745 करोड़, यानी करीब 96 प्रतिशत राशि का भुगतान किया जा चुका है।इसका अर्थ यह है कि शासन लगातार पुनर्वास के लिए कार्य कर रहा है।

परियोजना के विशेष पुनर्वास पैकेज में ₹12.50 लाख प्रति परिवार की व्यवस्था की गई है। प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास कॉलोनियों में भूखंड तथा बिजली-पानी जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जा रही है। ग्रामीण क्षेत्र में भूखंड के लिए ₹7 लाख और शहरी क्षेत्र में ₹6.50 लाख की सहायता का प्रावधान है, जबकि पात्र परिवारों को भूखंड के स्थान पर ₹12.50 लाख की एकमुश्त राशि लेने का विकल्प भी दिया गया है। 

इस संदर्भ में प्रभावित गांवों का दोबारा सर्वे कराने का निर्णय महत्वपूर्ण है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार छतरपुर के प्रभावित 14 गांवों में पुनः सर्वे के निर्देश दिए गए हैं और पांच गांवों के 59 लोगों के लिए ₹7.37 करोड़ की अतिरिक्त राशि स्वीकृत की गई है। 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके पात्र वयस्कों को लाभ देने के लिए भी 313 हितग्राहियों की भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। ऐसे कदम यह संदेश देते हैं कि विकास परियोजना को प्रभावित लोगों के अधिकारों की निरंतर समीक्षा के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। यदि किसी परिवार को लगता है कि उसका नाम छूट गया है या उसे पर्याप्त मुआवजा नहीं मिला, तो उसके लिए शिकायत और पुनः जांच की प्रक्रिया खुली हुई है।

पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण

केन-बेतवा परियोजना का एक बड़ा प्रश्न पन्ना टाइगर रिजर्व और वन क्षेत्र से जुड़ा है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन आसान नहीं है। बड़ी परियोजनाओं का पर्यावरणीय प्रभाव हो सकता है, पर सच यही है कि मानवीय आवश्‍यकताओं को भी पूरा करना जरूरी है। सरकार की ओर से परियोजना को पर्यावरणीय, वन्यजीव, जनजातीय कार्य और वन संबंधी आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त होने की जानकारी दी गई है। 

पर्यावरण प्रबंधन योजना, प्रतिपूरक वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण, आवास विकास, कैचमेंट क्षेत्र सुधार और Greater Panna Landscape के लिए Integrated Landscape Management Plan जैसे उपायों का प्रावधान है। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के क्षेत्र के लिए व्यापक योजना तैयार की है, इसलिए पर्यावरणीय प्रश्नों को विरोध या समर्थन की राजनीति से ऊपर उठाकर वैज्ञानिक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के आधार पर देखना चाहिए।

किसान की जिंदगी बदलने की संभावना

परियोजना का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव खेतों में दिखाई देना तय है। सिंचाई की बेहतर उपलब्धता से वर्षा पर निर्भरता कम होगी। किसान समय पर बुवाई कर सकेंगे और एक से अधिक फसल लेने की संभावना बढ़ेगी। उत्पादकता बढ़ने के साथ अधिक लाभ देने वाली फसलों की ओर जाने के अवसर भी बन सकते हैं। इसका सीधा असर ग्रामीण आय और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इसके साथ पेयजल का लाभ भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। करीब 62 लाख लोगों तक पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य ग्रामीण और शहरी जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। पानी की उपलब्धता का अर्थ स्वास्थ्य, स्वच्छता और महिलाओं तथा बच्चों के समय की बचत से भी जुड़ा है।

रोजगार और पलायन पर असर

आज अनेक उदाहरण इतिहास के साथ वर्तमान के हमारे सामने मौजूद हैं, किसी क्षेत्र में पानी आता है तो उसके साथ आर्थिक गतिविधियां भी आती हैं। निर्माण चरण में इंजीनियरिंग, परिवहन, सामग्री आपूर्ति, मशीन संचालन और विभिन्न सेवाओं में रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। आगे सिंचाई की सुविधा बढ़ने पर खेती, कृषि प्रसंस्करण, परिवहन, व्यापार और ग्रामीण सेवाओं के नए अवसर विकसित हो सकते हैं। बुंदेलखंड में मजबूरी का पलायन लंबे समय से सामाजिक चिंता का विषय रहा है। यदि सिंचाई, पेयजल और स्थानीय रोजगार का स्थायी आधार बनता है तो भविष्य में पलायन के दबाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।

केन-बेतवा परियोजना पर बहस को 'विकास बनाम पर्यावरण' अथवा 'सरकार बनाम प्रभावित लोग' जैसे सरल खांचों में बांटना उचित नहीं होगा। वास्तविक चुनौती इससे कहीं अधिक जटिल है। एक ओर बुंदेलखंड के करोड़ों लोगों की जल जरूरतें और किसानों का भविष्य है, दूसरी ओर वन, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के अधिकार हैं।

सही रास्ता वह होगा जिसमें परियोजना आगे बढ़े, किंतु हर चरण पर पर्यावरणीय शर्तों का पालन हो। पानी मिले, मगर डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए निर्धारित न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बना रहे।  निर्माण हो, लेकिन प्रभावित परिवारों को समय पर और न्यायसंगत मुआवजा मिले।  पुनर्वास हो, लेकिन लोगों की आजीविका और सामाजिक गरिमा भी सुरक्षित रहे। परियोजना में डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों के लिए पूरे वर्ष न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखने का प्रावधान बताया गया है।

यहां यह सभी को समझना होगा कि बुंदेलखंड को राजनीतिक नारों से अधिक पानी की जरूरत है। किसानों को भाषणों से अधिक सिंचाई चाहिए। गांवों को विवाद से अधिक पेयजल चाहिए और प्रभावित परिवारों को आश्वासन से अधिक न्याय चाहिए। “केन-बेतवा लिंक परियोजना” की वास्तविक सफलता तभी होगी जब इसके जलाशय और नहरों के साथ-साथ विश्वास का भी निर्माण हो] इसलिए आज जरूरत इस बात की है कि केन-बेतवा परियोजना को राजनीति की प्रयोगशाला से निकालकर जनहित की कसौटी पर रखा जाए। 

आज जो किसी अन्‍य के बहकावे में आकर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं, वे भी समझें कि इसके लाभ व्यापक हैं, पर उन लाभों की सार्थकता तभी होगी जब विकास के रास्ते में आने वाले हर प्रभावित परिवार को न्याय, सम्मान और सुरक्षित भविष्य मिले। बुंदेलखंड के लिए यह परियोजना निश्‍चित तौर पर बुंदेलखण्‍ड के सूखे से जूझते समाज को स्थायी जल-सुरक्षा, कृषि और आर्थिक आत्मविश्वास की ओर ले जाने की एक बड़ी संभावना है। इस संभावना को राजनीतिक संघर्ष का विषय बनाने के बजाय पारदर्शिता, जवाबदेही और आमजन के हित का विषय बनाए रखना ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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