समकालीन हिंदी साहित्य में कुछ रचनाकार ऐसे हैं जिन्होंने भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न मानकर उसके संस्कार और संवर्धन को अपनी साधना का विषय बनाया है। कमलेश कमल ऐसे ही शब्द-साधकों में अग्रगण्य हैं, जिनकी लेखनी भाषा की शुद्धता, विचार की स्पष्टता और संस्कृति की निरंतरता के प्रति समर्पित रही है।

प्रशासनिक दायित्वों की अत्यंत व्यस्त दिनचर्या के बीच भी उनकी साहित्य-साधना निरंतर चलती रही है। अपनी उल्लेखनीय उपलब्धियों के साथ उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को जो समर्पित योगदान दिया है, वह उन्हें समकालीन रचनाकारों की विशिष्ट पंक्ति में स्थापित करता है। उनकी प्रत्येक कृति गंभीर अध्ययन, सतत शोध और भाषिक अनुशासन का प्रमाण है।

इनकी उल्लेखनीय कृतियों में भाषा के परिनिष्ठित प्रयोग पर आधारित 'भाषा संशय शोधन', 'शब्द-संधान' तथा 'शब्दार्थ' विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये तीनों पुस्तकें अमेज़न पर बेस्टसेलर रही हैं। 'शब्दार्थ' दैनिक जागरण के सौजन्य से प्रकाशित वह महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसका आधार लेखक का अत्यंत लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ रहा है।

इन पुस्तकों में कमलेश कमल ने शब्दों की व्युत्पत्ति, शुद्ध प्रयोग और अर्थ-वैभव का अत्यंत सहज, सरल एवं संप्रेषणीय शैली में विवेचन किया है। उन्होंने उन असंख्य शब्दों का भाषिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिनके प्रयोग को लेकर विद्वान से विद्वान व्यक्ति भी संशयग्रस्त हो जाता है और अनजाने में असाधु प्रयोग कर बैठता है। यही उनकी पुस्तकों की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे केवल शब्दों का अर्थ नहीं बतातीं, बल्कि भाषा के प्रति सजगता और संवेदनशीलता भी विकसित करती हैं। ऐसे अनेक शब्दों के उदाहरण इस पुस्तक में द्रष्टव्य हैं।

निस्संदेह, ये पुस्तकें उन सभी हिंदी-प्रेमियों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं, जो अपने दैनंदिन जीवन में शुद्ध, प्रभावी और गरिमापूर्ण हिंदी लिखना-पढ़ना चाहते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों, अध्यापकों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों, पत्रकारों, समाचार वाचकों, लेखकों, जनप्रतिनिधियों तथा हिंदी के गंभीर अध्येताओं—सभी के लिए ये पुस्तकें समान रूप से पठनीय, संग्रहणीय और मार्गदर्शक हैं।

इन पुस्तकों के अतिरिक्त लेखक की श्रम-साधना से नि:सृत ललित निबंध-संग्रह 'दुःख : उद्भव, कारण और निदान' हिंदी साहित्य की उच्चकोटि की कृतियों में स्थान पाने की पूर्ण क्षमता रखता है। इस मनोवैज्ञानिक एवं वैचारिक निबंध-संग्रह में लेखक ने मनुष्य के जीवन में व्याप्त विविध प्रकार के दुःखों, मानसिक द्वंद्वों और अस्तित्वगत प्रश्नों का वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं मानवीय दृष्टि से गंभीर विश्लेषण किया है। सार्थक उदाहरणों और व्यावहारिक दृष्टांतों के माध्यम से उन्होंने दुःख को समझने तथा उसके शमन के ऐसे उपाय प्रस्तुत किए हैं, जो इस कृति को मात्र साहित्यिक निबंध-संग्रह न बनाकर जीवन-दर्शन का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बना देते हैं। अनेक पाठकों का अनुभव है कि विषम परिस्थितियों में यह पुस्तक एक आत्मीय मित्र की भाँति मार्गदर्शन और मानसिक संबल प्रदान करती है।

जहाँ तक लेखक की भाषा का प्रश्न है, वह सहज, संप्रेषणीय और बोधगम्य होते हुए भी वैचारिक गरिमा से संपन्न है। कहीं-कहीं भाषावैज्ञानिक गंभीरता के कारण क्लिष्टता का आभास अवश्य होता है, किंतु वह विषयानुकूल और स्वाभाविक है। भावानुरूप शब्द-चयन के कारण अनेक नायाब शब्द पाठक के भाषिक संसार को समृद्ध करते हैं। भाषा की यह विशिष्टता न केवल लेखक की भाषिक साधना का परिचायक है, बल्कि हिंदी के प्रति उनकी गहन निष्ठा का भी प्रमाण है।

आज जब भाषा की शुद्धता और अभिव्यक्ति की गरिमा निरंतर चुनौती के दौर से गुजर रही है, ऐसे समय में कमलेश कमल का साहित्य हिंदी के लिए एक विश्वसनीय आलोक-स्तंभ की तरह उपस्थित है। उनकी कृतियाँ केवल पढ़े जाने के लिए नहीं, बल्कि भाषा-संस्कार, चिंतन-परिष्कार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए भी आवश्यक हैं। विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि उनका साहित्य समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होगा तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, पथदर्शन और भाषिक अनुकरण का आधार बनेगा।

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