आलेगावकर विद्यालय में पढ़ाने वाले सुरेशराव केतकर विद्यार्थियों के बीच लोकप्रिय हो चुके थे। विद्यालय प्रबंधन भी उनके काम से संतुष्ट था। नौकरी छोड़ने का कोई तत्काल कारण भी नहीं था। फिर भी 1958 में उन्होंने शिक्षक की नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक प्रचारक बनने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय से विद्यालय से जुड़े लोगों को भी सहज ही खुशी नहीं हुई, उन्हें दुख था कि एक अच्छा शिक्षक उनके बीच से जा रहा है। लेकिन केतकर ने अपना रास्ता चुन लिया था।

यहीं से सुरेशराव केतकर के जीवन का वह अध्याय शुरू होता है, जिसने अगले कई दशकों तक उनके जीवन की दिशा तय की। 28 सितंबर 1934 को पुणे में जन्मे सुरेश रामचंद्र केतकर मूलतः पुणे के स्वयंसेवक थे। विद्यार्थी जीवन से ही उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संपर्क था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय अध्यापन किया। उनके शैक्षणिक विवरण को लेकर उपलब्ध स्रोतों में B.Ed. और B.P.Ed. दोनों तरह के उल्लेख मिलते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि उन्होंने विज्ञान की पढ़ाई के बाद शिक्षक के रूप में काम किया और लगभग एक वर्ष बाद पूर्णकालिक प्रचारक बनने का निर्णय लिया।

शिक्षक बनने से पहले ही उनके व्यक्तित्व में शारीरिक गतिविधियों के प्रति विशेष रुचि थी। डॉ. अशोक कुकड़े के संस्मरण के अनुसार वे बचपन से ही शारीरिक व्यायाम को लेकर सजग थे और घोष वादन में भी उनकी रुचि थी। 1956-57 में सूर्य नमस्कार पर एक चित्रात्मक पुस्तक तैयार करने की योजना बनी तो तत्कालीन सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने इस काम के लिए सुरेशराव केतकर सहित कुछ स्वयंसेवकों को चुना था।

एक शिक्षक की नौकरी छोड़कर प्रचारक बनना आज भी सामान्य निर्णय नहीं माना जाएगा। उस दौर में तो यह और भी बड़ा फैसला था। शिक्षक के रूप में नियमित आय थी, विद्यालय का अपना संसार था और विद्यार्थियों के बीच एक पहचान बन चुकी थी। इसके बावजूद उन्होंने अपना जीवन पूर्णकालिक संगठनात्मक कार्य के लिए समर्पित करने का रास्ता चुना।

1958 में प्रचारक बनने के बाद उनका शुरुआती कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में रहा। सांगली और सोलापुर के साथ उन्होंने धाराशिव और बीड जिलों में भी काम किया। बाद में लातूर विभाग उनके कार्यक्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।प्रचारक का जीवन किसी एक कार्यालय या शहर तक सीमित नहीं होता। लगातार प्रवास, अलग-अलग लोगों से मिलना, शाखाओं और कार्यकर्ताओं के साथ काम करना तथा नए कार्यकर्ताओं को तैयार करना उसके प्रमुख हिस्से होते हैं। केतकर के जीवन में भी यह प्रवास आगे चलकर बहुत व्यापक हुआ।

उनके बारे में प्रकाशित संस्मरणों में एक बात बार-बार सामने आती है कार्यकर्ताओं के साथ उनका व्यक्तिगत संबंध। देशभर में प्रवास के दौरान जिन लोगों से वे मिलते, उनके बारे में छोटी-छोटी बातें भी याद रखते और अगली मुलाकात में उसी आत्मीयता से उनकी पूछताछ करते। संगठनात्मक जिम्मेदारी के साथ व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध बनाए रखना उनके कार्य की एक विशेषता के रूप में सामने आता है। उनका दूसरा प्रमुख क्षेत्र था शारीरिक शिक्षण।

महाराष्ट्र प्रांत के शारीरिक शिक्षण प्रमुख से लेकर अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षण प्रमुख तक उन्होंने जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में वे क्षेत्र प्रचारक, अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख और सह सरकार्यवाह जैसे दायित्वों पर भी रहे। 2000 के आसपास उनके सह सरकार्यवाह के रूप में कार्य करने का उल्लेख उपलब्ध स्रोतों में मिलता है।शारीरिक शिक्षण का यह काम उनके लिए केवल व्यायाम तक सीमित नहीं था। शाखा में होने वाली शारीरिक गतिविधियों के प्रति उनकी अपनी रुचि पहले से थी। इसलिए संगठन में शारीरिक प्रशिक्षण का दायित्व मिलने पर यह उनके व्यक्तित्व और कार्यक्षेत्र का स्वाभाविक विस्तार भी दिखाई देता है। उनके कार्य से जुड़े स्रोतों में व्यायाम, सूर्य नमस्कार और अन्य शारीरिक गतिविधियों के प्रति उनकी विशेष रुचि का उल्लेख मिलता है।

1972-73 के बाद उनके कार्य का दायरा महाराष्ट्र से बाहर और फिर राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा। पहले वे महाराष्ट्र के शारीरिक प्रमुख बने, फिर राष्ट्रीय स्तर पर वही दायित्व संभाला और बाद में संघ के उच्च संगठनात्मक दायित्वों तक पहुंचे।लातूर उनके जीवन में केवल एक कार्यक्षेत्र के रूप में नहीं आया। यहां उनकी भूमिका कुछ सामाजिक और सेवा संस्थाओं से भी जुड़ी। लातूर जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र में चिकित्सा सेवा शुरू करने के उनके प्रयासों से विवेकानंद चिकित्सालय की स्थापना की दिशा में काम आगे बढ़ा।

उनकी कार्यशैली में सादगी और अनुशासन का उल्लेख भी अनेक श्रद्धांजलि लेखों में मिलता है। 2016 में उनके निधन के बाद पुणे में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में तत्कालीन संघ सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने उनके व्यक्तित्व की सादगी, सहज व्यवहार और आत्मीयता को विशेष रूप से रेखांकित किया था।16 जुलाई 2016 को लातूर में उनका निधन हुआ। उस समय उनकी आयु 82 वर्ष थी। वे कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे और लातूर के स्वामी विवेकानंद अस्पताल में उपचाररत थे। उनके जीवन को पीछे मुड़कर देखने पर सबसे दिलचस्प पड़ाव शायद वही दिखाई देता है जहां से यह यात्रा शुरू हुई थी, एक शिक्षक की नौकरी छोड़ने का फैसला।

उस समय यह निर्णय लेने वाले सुरेशराव के सामने शायद यह स्पष्ट नहीं रहा होगा कि आने वाले दशकों में उनका कार्यक्षेत्र कितना बड़ा हो जाएगा। सांगली और सोलापुर से लेकर लातूर, महाराष्ट्र और फिर अखिल भारतीय स्तर तक जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। लेकिन उनके जीवन की दिशा उस एक निर्णय के बाद बदल चुकी थी।

शिक्षक और प्रचारक की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन उनके बीच एक संबंध दिखाई देता है। शिक्षक, विद्यार्थियों के साथ काम करता है प्रचारक कार्यकर्ताओं के साथ। शिक्षक सीखने की प्रक्रिया में साथ देता है; प्रचारक संगठनात्मक और सामाजिक कार्य के लिए लोगों को तैयार करता है। यह समानता उनके जीवन को समझने का एक दृष्टिकोण है, हालांकि इसे स्वयं केतकर की घोषित अवधारणा के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।उनके जीवन पर बाद में ‘संघयोगी सुरेशराव केतकर’ नाम से पुस्तक भी प्रकाशित हुई, जिसमें उनके जीवन और कार्य से जुड़े लेख तथा संस्मरण संकलित किए गए। इससे भी पता चलता है कि उनके योगदान को केवल संगठनात्मक पदों के आधार पर नहीं, बल्कि उनसे जुड़े लोगों के अनुभवों के माध्यम से भी दर्ज किया गया।
 

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