“नरेंद्र मोदी जी को समझना है तो प्रधानमंत्री मोदी से पहले स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी को समझना होगा, क्योंकि उनकी सार्वजनिक यात्रा के पीछे संघ के संस्कार, संगठन और राष्ट्रभाव की एक लंबी साधना दिखाई देती है।” आज 17 सितंबर है, देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन।ऐसे अवसर पर सामान्य तौर पर हम उन्हें देश के प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं—दुनिया के बड़े नेताओं के साथ भारत की बात रखते हुए, करोड़ों भारतीयों से संवाद करते हुए और विश्व मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए।लेकिन मेरे मन में आज उनका एक और चित्र आता है—एक स्वयंसेवक का चित्र।वडनगर की गलियों से निकला एक सामान्य परिवार का बालक, जिसने अपने जीवन की शुरुआत किसी बड़े पद से नहीं की। उन्होंने शुरुआत सेवा से की, संगठन से की और राष्ट्र को समझने की यात्रा से की।

मैं गुजरात में पिछले 6 वर्षों से संगठन के लिए कार्य कर रहा हूं। ऐसे में स्वयंसेवकों के द्वारा सुनाया गया एक वाकया मुझे याद आता है। जब कच्छ में लोगों को पानी की कमी थी और मोदी जी ने यह देखा तो अमित शाह जी के साथ मिलकर खुद गांव वालों के साथ नहर खोदना शुरू कर दिया और गांव तक पानी पहुंचा दिया।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक का समाज के प्रति और राष्ट्र के प्रति क्या दायित्व होता है, हम इस घटना से आसानी से समझ सकते हैं।मैं खुद एक स्वयंसेवक हूं और जब समाज पर कोई समस्या आती है तो उसे सरकार, किसी संगठन या संस्था के ऊपर छोड़ने की जगह हम सब मिलकर उसके समाधान की ओर आगे बढ़ते हैं। हम सभी ने संघ से यही सीखा है।आज मैं भी जो भी सेवा कार्य कर रहा हूं, देश के किसी कोने में या विदेश में, उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिए संस्कार हैं। बात हो रही है नरेंद्र मोदी जी की, तो आगे बढ़ते हैं।

यही बात नरेंद्र मोदी जी के जीवन को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ाव युवावस्था में हुआ। आगे चलकर उन्होंने प्रचारक के रूप में अपना जीवन संगठन के लिए समर्पित किया। प्रचारक होना कोई पद या सुविधा का रास्ता नहीं होता, यह अपने व्यक्तिगत जीवन से ऊपर उठकर संगठन और समाज के लिए अपना समय और जीवन देने का निर्णय होता है।यहीं से उनके जीवन की वह यात्रा शुरू होती है, जिसने आगे चलकर उन्हें देश के सर्वोच्च लोकतांत्रिक पद तक पहुंचाया।संघ की सबसे बड़ी विशेषता मुझे हमेशा व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण की लगती है।

शाखा में कोई स्वयंसेवक यह नहीं जानता कि आने वाले समय में वह क्या बनेगा। उसे केवल यह सिखाया जाता है कि जो जिम्मेदारी आज मिली है, उसे पूरी निष्ठा से निभाना है, अनुशासन रखना है, समाज के बीच काम करना है, लोगों को जोड़ना है, कठिन परिस्थितियों में भी खड़े रहना है और राष्ट्र को अपने जीवन का केंद्र मानना है।नरेंद्र मोदी जी के जीवन को देखें तो उनकी यात्रा में इन संस्कारों की छाप दिखाई देती है।वडनगर से निकलकर उन्होंने देश को समझने की कोशिश की, फिर अहमदाबाद आए, संघ के कार्य में लगे, संगठन के अलग-अलग दायित्व संभाले, लोगों के बीच काम किया और धीरे-धीरे उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती चली गईं।

यह यात्रा अचानक नहीं बनी थी।एक कार्यकर्ता के रूप में वर्षों तक काम करने के बाद उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं। संगठन मंत्री, राष्ट्रीय मंत्री और संगठन मंत्री के दायित्वों को संभालते हुए इसी क्रम में आगे चलकर वे गुजरात के मुख्यमंत्री बने और फिर 2014 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देश की जिम्मेदारी संभाली।आज दुनिया उन्हें नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नाम से जानती है।लेकिन उनके जीवन की शुरुआत को देखें तो वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि एक स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी दिखाई देते हैं।यही संघ की कार्यपद्धति को समझने का विषय भी है।

संघ किसी व्यक्ति को केवल पद प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं करता, उसका मूल काम व्यक्ति निर्माण है। ऐसा व्यक्ति, जो समाज के लिए काम कर सके, जिम्मेदारी उठा सके और अपने व्यक्तिगत हित से ऊपर राष्ट्रहित को रख सके।एक स्वयंसेवक को छोटी जिम्मेदारी से शुरुआत करनी होती है। फिर जिम्मेदारी बढ़ती जाती है और उसके साथ व्यक्ति का अनुभव भी बढ़ता जाता है।शायद यही कारण है कि संघ से जुड़े अनेक स्वयंसेवक जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर अपनी भूमिका निभाते हैं। कोई सामाजिक कार्य में जाता है, कोई शिक्षा के क्षेत्र में काम करता है, कोई संगठन का दायित्व संभालता है और कोई सार्वजनिक जीवन में आगे आता है।नरेंद्र मोदी जी की यात्रा इसी लंबे संगठनात्मक अनुभव की एक बड़ी मिसाल है।

आज भारतीय जनता पार्टी देश ही नहीं, बल्कि विश्व की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभर में एक विशाल स्वयंसेवी संगठन के रूप में कार्य करता है। लेकिन संघ की पूरी यात्रा को केवल राजनीति के माध्यम से देखना उसके मूल विचार को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।संघ की शाखा में खड़ा एक सामान्य स्वयंसेवक यह नहीं जानता कि भविष्य में उसे कौन-सा दायित्व मिलेगा। वह केवल इतना जानता है कि उसे अपना काम ईमानदारी से करना है।यही भावना धीरे-धीरे व्यक्ति को जिम्मेदारी उठाना सिखाती है। जब वही व्यक्ति बड़े दायित्व पर पहुंचता है तो उसके सामने केवल उसका अपना जीवन नहीं होता, उसके सामने समाज होता है, देश होता है और करोड़ों लोगों की उम्मीदें होती हैं।नरेंद्र मोदी जी के जीवन में भी एक स्वयंसेवक से लेकर प्रचारक, संगठन के कार्यकर्ता, मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री तक की यात्रा को इसी क्रम में देखा जा सकता है।

उनका राष्ट्र निर्माण का विजन हो, भारत की वैश्विक भूमिका को लेकर उनका दृष्टिकोण हो या देश को आगे ले जाने की उनकी सोच—इन सबको उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और संगठनात्मक अनुभव से अलग करके देखना कठिन है।मेरे लिए आज उनके जन्मदिन पर सबसे महत्वपूर्ण बात उनका प्रधानमंत्री होना नहीं है।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सामान्य परिवार से निकला व्यक्ति स्वयंसेवक के रूप में अपना जीवन शुरू करता है और अपनी मेहनत, संगठनात्मक अनुभव और सार्वजनिक जीवन की लंबी यात्रा के बाद देश की जिम्मेदारी तक पहुंचता है।यह केवल नरेंद्र मोदी जी की व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, यह उस विचार को भी सामने रखती है कि यदि व्यक्ति के भीतर राष्ट्र के लिए काम करने का भाव पैदा किया जाए, उसे अनुशासन दिया जाए, समाज से जोड़ा जाए और जिम्मेदारी निभाने की आदत डाली जाए तो उसके सामने संभावनाओं की कोई सीमा नहीं रहती।

आज उनके जन्मदिन पर मेरी यही शुभकामना है कि भारत राष्ट्र को लेकर उनका विजन निरंतर मजबूत हो और भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति, सामर्थ्य और मानवीय मूल्यों के साथ विश्व में आगे बढ़ता रहे।एक स्वयंसेवक से भारत के प्रधानमंत्री तक की यह यात्रा हमें एक बात जरूर याद दिलाती है—पद किसी व्यक्ति को बड़ा नहीं बनाता। व्यक्ति का निर्माण उस समय शुरू होता है, जब वह बिना किसी पद के भी अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से निभाना सीखता है।

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