जौहर को समझने से पहले उस काल के युद्ध, स्त्री की स्थिति, शत्रु की बंदी-नीति और उस समाज के सम्मान-बोध को समझिए। इतिहास को आज के राजनीतिक चश्मे से नहीं, उसके अपने संदर्भ में पढ़िए। 

जौहर को समझते समय न तो उसका उपहास उचित है, न उसका रोमानीकरण। आधुनिक दृष्टि से सामूहिक आत्मदाह अत्यंत त्रासद घटना है; साथ ही मध्यकालीन युद्धों में स्त्रियों की असुरक्षा, बंदी बनाए जाने और दासता के वास्तविक भय को भी ऐतिहासिक संदर्भ से हटाया नहीं जा सकता। इतिहासकारों में इस बात पर भी विमर्श है कि अलग-अलग घटनाओं में स्वेच्छा, सामाजिक दबाव और सामुदायिक मान-सम्मान की भूमिका कितनी थी।

जौहर के साथ ‘साका’ जुड़ा था—जब किले की अंतिम लड़ाई में पुरुष योद्धा मृत्यु को निश्चित जानते हुए केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध के लिए निकलते थे। इसलिए इसे केवल “महिलाओं की आत्महत्या” कह देना उस पूरे युद्ध-सांस्कृतिक संदर्भ को काट देना है।

जौहर युद्ध में निश्चित पराजय और शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने की स्थिति में स्त्रियों द्वारा सामूहिक आत्मदाह की ऐतिहासिक युद्धकालीन परंपरा थी। राजस्थान सरकार भी चित्तौड़ के जौहर को पराजय के बाद बंदीकरण, दासता और यौन हिंसा से बचने के संदर्भ में वर्णित करती है। 

जौहर भारतीय इतिहास में प्रचलित एक राजपूत युद्धकालीन परंपरा थी, जिसमें युद्ध में पराजय निश्चित होने और शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने, दासता तथा स्त्रियों के साथ अत्याचार की आशंका के समय महिलाएँ सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश करती थीं। इसका उद्देश्य शत्रु के हाथों अपमान और बंदी बनाए जाने से बचना माना जाता था। पुरुष योद्धा उसी समय अंतिम युद्ध के लिए निकलते थे, जिसे ‘साका’ कहा जाता था।

चित्तौड़ का 1303 का युद्ध अलाउद्दीन खिलजी और रावल रतन सिंह के बीच हुआ। परंपरागत राजपूत इतिहास के अनुसार, पराजय के बाद रानी पद्मिनी के नेतृत्व में चित्तौड़ की महिलाओं ने पहला जौहर किया। हालांकि, रानी पद्मिनी के 1303 के ऐतिहासिक अस्तित्व और उनसे जुड़े विवरण का सबसे प्रसिद्ध लिखित स्रोत मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत (1540) है, जो घटना के लगभग दो शताब्दी बाद लिखा गया था। भारतीय इतिहास में 7 बड़े जौहरों का विस्तृत वर्णन जनश्रुति में उपलब्ध है।

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