पर्यावरण और सामाजिक स्वास्थ्य एक दूसरे के पूरक हैं। इनके संतुलन में ही संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व हैं। पर्यावरण के संरक्षण में ही सामाजिक स्वास्थ्य और प्रकृति का दीर्घजीवन निहित है। इसीलिए भारतीय वाड्मय में ऋग्वेद से लेकर रामचरित मानस तक प्रकृति की महत्ता और स्वस्थ्य सामाजिक वातावरण पर जोर दिया गया है।

पर्यावरण अर्थात प्रकृति का आवरण। यह ऐसा आवरण है जो धरती के प्राणियों और प्रकृति के जीवन को सुरक्षित रखता है और उनके स्वरूप को निखारने का कारक भी है। लेकिन "प्रकृति का यह आवरण" मैला होने लगा है। आवरण को गंदा करने वाला कोई और नहीं मनुष्य स्वयं है। विकास, प्रगति, दिखावा और उपभोक्तावाद की प्रवृत्ति से ही यह आवरण मैला हुआ है। मनुष्य द्वारा फैलाई जा रही गंदगी विषाक्त रसायन प्रतिदिन पर्यावरण का प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। इससे पूरे समाज और संसार का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। आकाश में विषाक्त रसायन जाने से हवा का प्रदूषण प्रतिदिन बढ़ रहा है। जिससे श्वाँस लेना कठिन हो रहा है। 

किसी को कल्पना तक नहीं कि श्वास के माध्यम से देह के भीतर जा रहे विषाक्त रसायन कितने रोगों का बीज बो रहे हैं। धरती पर जो गंदगी फैलाई जा रही है उससे फल फूल सब्जी और अन्न सब प्रभावित हो रहे हैं।  

विषाक्त फल सब्जी और अन्न से बना भोजन करने वाले और विषाक्त पुष्प की सुगन्ध लेने वाले कितने दिन स्वस्थ और सुरक्षित रह सकेगें यह किसी से छिपा नहीं है। पर्यावरण का असंतुलन से होने वाली क्षति सीधे दिखाई नहीं देती। उसके प्रभाव धीरे धीरे समझ आते हैं। आज पूरा विश्व इन दुप्रभावों को झेल रहा है। इससे उत्पन्न प्रकृति के अस्तित्व का संकट भी स्पष्ट दिखाई देने लगा और सामाजिक स्वास्थ्य का ह्रास भी सामने आ गया है। पर्यावरण संतुलन बिगड़ने से शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के रोग बढ़ रहे हैं।शारीरिक रोग तो दिखाई दे जाते हैं। उनके उपचार का प्रबंध भी हो जाता है लेकिन मानसिक रोग दिखाई भी नहीं देते।

 अस्सी प्रतिशत लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें मानसिक रोगों ने जकड़ लिया है। बढ़ते व्यसन, अपराध, नकारात्मक सोच, चिड़चिड़ापन और हिंसक स्वभाव मानसिक रोगों की निशानी है। शारीरिक रोग से तो व्यक्ति और परिवार ही पीड़ित होता है लेकिन मानसिक रोगी पूरे समाज को त्रस्त कर देता है। यह समस्या केवल भारत की नहीं, पूरा विश्व जूझ रहा है। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2024 तक के जारी किये गये ऑकड़ों से समझा जा सकता है। वर्ष 2024 में प्रदूषण कारी कार्बन उत्सर्जन की मात्रा 37.4 बिलियन मीट्रिक टन आँकीं गई। जबकि वर्ष 2015 में यह आँकड़ा 34.1 बिलियन मीट्रिक टन था। अर्थात इन दस वर्षों में लगभग दस प्रतिशत प्रदूषण बढ़ा। दस वर्षों की इस अवधि में भारत के आँकड़े भी इससे बहुत अलग नहीं हैं। भारत में वर्ष 2024 में यह प्रदूषणकारी कार्बन का उत्सर्जन 3.12 अरब मीट्रिक टन हुआ जबकि वर्ष 2015 में 2.33 अरब मीट्रिक टन था। वैश्विक और भारतीय स्तर पर प्रदूषण का यह बढ़ता दायरा गंभीर स्थिति में पहुँच गया है। पूरे संसार की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या इसके दायरे में आ गई है। चिकित्सालयों में बढ़ती भीड़ और मृत्यु के आँकड़े इसका प्रमाण हैं। 

मुख्य कारण तकनीक विकास और आधुनिकीकरण की एक तरफा दौड़ से समाज की बदलती जीवन शैली है। विकास केलिये खुली भूमि का निरन्तर कम हो रही है, आसमान छूती सीमेन्ट की अट्टालिकाएँ धूप को रोशनी को रोक रहीं हैं, सड़कों का चौड़ीकरण धरती को ढंक रहा है। दौड़ती कारों और आधुनिक फैक्ट्रियों से निकलता विषाक्त धुँआ, उड़ती हुई धूल, कचरा जलाना, फसलों में उपयोग किया जाने वाला रासायनिक खाद और घरों से निकलने वाला कचरा सब पर्यावरण संतुलन को आघात कर रहे हैं। श्वाँस, भोजन और जल जैसी जीवन की आधरभूत आवश्यकताएँ अब प्रदूषण युक्त हो गई हैं। इसी कारण रक्तचाप, डायबिटीज, टाइफाइड, हैजा, पीलिया आदि ही नहीं अब तो फेफड़े, लीवर और हृदयरोग जैसी बीमारियाँ भी बढ़ने लगीं हैं। इन सबका कारण धरती, जल एवं वायु का प्रदूषण है। चिकित्सा विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत में केवल जल प्रदूषण से सालभर में लगभग चार करोड़ लोग बीमार होते हैं जिनमें चार लाख लोग मौत के मुँह में समा जाते हैं। जबकि सभी प्रकार के प्रदूषण से भारत में होने वाली मौतों का आँकड़ा प्रतिवर्ष लगभग सत्रह लाख है। अस्सी प्रतिशत बीमारियों का कारण यह पर्यावरण का असंतुलन ही है।

सामाजिक स्वास्थ्य पर पर्यावरण का प्रभाव

सबसे पहले हमें सामाजिक स्वास्थ्य को समझना। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य शारीरिक और मानसिक दो प्रकार से प्रभावात होता है। उसी प्रकार सामाजिक स्वास्थ्य भी दो प्रकार बिगड़ता है। सड़क पर चलते हुये व्यक्ति द्वारा अपने भीतर पनपते किसी रोग के वायरस छोड़ने से शारिरिक बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं वहीं उसके सोच और जीवन शैली से सामाजिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता। परिवार और कुटुम्ब के समन्वय से संपूर्ण समाज में एक समरस और समन्वित शैली विकसित होती है। इसे तोड़ने का काम व्यक्ति ही करता है। 

किसी व्यक्ति का एकाकी रहना, चिड़चिड़ा स्वभाव समाज की सामूहिक शैली को प्रभावित करता है। एकाकी, चिड़चिड़ा और आत्मकेंद्रित स्वभाव का व्यक्ति दूसरे का सम्मान कम करता है। उसके दृष्टिकोण को आदर नहीं देता इससे समाज का सामूहिक स्वरूप प्रभावित होता है। मनुष्य यदि सामाजिक प्राणी है तो उसे समाज के बीच ही रहना होगा। यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह सामाजिक स्वास्थ्य को आघात करता है। मान लीजिए कोई विवाह समारोह चल रहा है। विवाह समारोह में सब हँसते खिलखिलाते हैं। सब लोग सकारात्मक आनंद ले रहे हैं। लेकिन इसी बीच कुछ लोग अपना मोबाइल निकालकर कुछ खेलने लगे तो इसका दो प्रकार का प्रभाव पड़ता है। एक तो ऐसा व्यक्ति समाज के सामूहिक स्वरूप और उत्सव को प्रभावित कर रहा होता है और दूसरे इसकी अन्य लोगों की विचारशैली पर भी नकारात्मक प्रतिक्रिया होती है। ये दोनों लक्षण सामाजिक स्वास्थ्य के विपरीत माने जाते हैं। व्यक्ति के स्वभाव, कार्यशैली, पसंद और प्राथमिकता में पर्यावरण की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसे हम बदलते मौसम में बदलती इच्छाओं से ही समझ सकते हैं। बादल घिरने पर कुछ और खाने का मन होता है और ग्रीष्म के मौसम में शीतल पेय पर ध्यान जाता है। कयी बार अचानक कुछ खाने की, कुछ न खाने की इच्छा भी वातावरण पर निर्भर करती है। यदि पर्यावरण से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है तो इससे विचार भी प्रभावित होते हैं। सामाजिक स्वास्थ्य की नींव में व्यक्ति के विचार और मानसिकता होती है। इसलिए पर्यावरण को प्राणी के शारीरिक और मानसिक रोगों के साथ सामाजिक स्वास्थ्य का आधार भी माना गया है।

 समाज को स्वस्थ और प्रगतिशील होने केलिये व्यक्तियों का प्रसन्नचित्त और सकारात्मक होना आवश्यक है। एक प्रसन्नचित्त व्यक्ति सदैव सक्रिय रहता है। व्यक्ति की सकारात्मक गतिशीलता और सक्रियता से उत्पादकता बढ़ती है, सभी संबंध और मधुर रहते हैं। यह बाते समाज की प्रगति, प्रसन्नता और स्वास्थ्य का आधार होती हैं। सामाजिक स्वास्थ्य के लिये समाज के स्वरूप में समानता, दूसरे के दृष्टिकोण को समझना, बंधुत्व भाव, नैतिकता, प्रगतिशीलता, सह-अस्तित्व का वातावरण, सहयोग और सामूहिकता तथा प्राकृतिक आयामों के संरक्षण का भाव होना आवश्यक है जो भारतीय वाड्मय में सनातन काल से रहा है।

 यहाँ एक प्रश्न उठता है कि यदि व्यक्ति गतिशील होगा, सक्रिय होगा तो वह प्रगति करेगा तब आधुनिक प्रगति को पर्यावरण और सामाजिक स्वास्थ्य के लिये विपरीत कैसे माना जा सकता। यह सही है कि आधुनिक तकनीक के अविष्कार की स्पर्धा से अलग नहीं रहा जा सकता। वह समाज और व्यक्ति सदैव पिछड़ जाते हैं जो आधुनिक तकनीकि को नहीं अपनाते। लेकिन इसमें संतुलन और यथार्थता आवश्यक होती है। जिस प्रकार अंधकार और प्रकाश साथ साथ चलते हैं। हम अंधकार का उपयोग निद्रा केलिये करते हैं और प्रकाश का उपयोग पुरुषार्थ और पराक्रम केलिये। यदि हम निद्रा न ले तो पुरुषार्थ कैसे कर पायेंगे। यनि हमने अंधकार के समय का भी सकारात्मक उपयोग सीखा। ऊर्जा अर्जित करने का माध्यम बनाया। हम अंधकार को रोक नहीं सकते लेकिन उसका उपयोग करना सीखे। ठीक इसी प्रकार आधुनिक प्रगति में उपलब्धि के साथ उतने ही नकारात्मक अवयव भी दिखाई देगे हमें उनका उपयोग कैसे करना। यदि घर से कचरा निकलता है। यदि हमने उसे बाहर फेक दिया तो प्राणी, पर्यावरण और समाज तीनों का स्वास्थ्य बिगड़ेगा। इसीलिए कचरे का सकारात्मक और सृजनात्मक उपयोग पर विचार करके कदम बढ़ाना होगा।

भारतीय वाङ्गय में पर्यावरण संरक्षण 

यह संपूर्ण सृष्टि और प्रकृति अग्नि, जल, वायु, धरती और आकाश इन पांच तत्वों से संचालित होती है। दीर्घजीवन और स्वास्थ्य इन पांचों तत्वों की शुद्धता पर निर्भर है। पेड़, पर्वत, पौधे, नदियाँ सहित समस्त प्राणियों का शरीर और जीवन का आधार यही पाँच तत्व हैं। इन पांच तत्वों की शुद्धता और संतुलन में ही सृष्टि का अस्तित्व है। कल्पना कीजिये कि यदि धरती का तापमान बढ़ जाय या बहुत नीचे गिर जाय तो क्या जीवन सुरक्षित रह सकेगा? इसी प्रकार वायु में गंदगी और विषैले तत्व घुल जाने वायु भी विषाक्त हो जाती है। विषाक्त वायु में श्वाँस लेने से भी जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा। यदि जीवन बच भी गया तो वह बीमारियों से भर जायेगा। यही स्थिति विषाक्त धरती,अग्नि, और आकाश की है। रोग ग्रस्त प्राणी संपूर्ण समाज को भी रोगग्रस्त बनाते हैं। इसीलिए भारतीय वाड्मय में प्रगति के साथ जीवन के संतुलन और पर्यावरण की शुद्धता पर बहुत जोर दिया गया है। वेदों से लेकर रामचरित मानस तक ऐसा कोई ग्रंथ नहीं जिसमें पर्यावरण के संरक्षण की बात न हो। यदि भारतीय तीज त्यौहारों का स्वरूप, पूजन विधान देखें तो इसके केन्द्र में भी पर्यावरण संरक्षण ही है। वेदों में अग्नि, वरुण(जल), पवन(वायु) की आराधना में सैकड़ों ऋचायें हैं। ऋग्वेद की तो पहली ऋचा पाँच तत्वों के समन्वय की है। चारों वेदों में शायद ही ऐसा कोई मंडल हो जिसमें इनमें से किसी को देव मानकर यज्ञाराधना न हो। इनके पीछे इनके संरक्षित करने का ही संदेश है। स्वस्थ समाज पर भी अनेक वेदों में अनेक ऋचाएं हैं।

"वनस्पति वन आस्थापयध्यम्” अतः वृक्षों को नष्ट करना ही पृथ्वी माता की हिंसा करना है। उसके हृदय पर प्रहार करने जैसा है। वेदों में स्वस्थ्य समाज उसे माना गया जो समस्त जैविक एवं अजैविक परिस्थितियों के बीच पूर्ण सामंजस्य बनाकर चलता है। इसे हम विश्वशाँति मंत्र से ही समझ सकते हैं -

ॐ द्यौ: शांतिरंतरिक्षं शांति:, पृथ्वी शांतिराप: शांतिरोषधय: शांति:। वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा: शांतिर्ब्रह्म शांति:, सर्व शांति:, शांतिरेव शांति:, सा मां शांतिरेधि ।।

अर्थात- आकाश में शांति है; वातावरण में शांति है; पृथ्वी पर शांति; जल शांत है; जड़ी-बूटियाँ शांतिदायक हैं; पौधे शांतिदायक हैं; आकाशीय पिंडों में सामंजस्य है और ज्ञान में पूर्णता है; ब्रह्मांड में सब कुछ शांत है; शांति हर जगह व्याप्त है। वह शांति मुझे भी प्राप्त हो"

इस शाँतिपाठ में पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक स्वास्थ्य सबको बीच संतुलन का स्पष्ट संदेश है। संपूर्ण पृथ्वी और अंतरिक्ष से समन्वय बनाकर चलने का स्थान स्थान पर संदेश है। अथर्ववेद के पृथ्वीसूक्त में जलतत्त्व पर विचार करते हुए उसकी शुद्धता को स्वस्थ जीवन के लिए अनिवार्य माना और कहा है कि जल-सन्तुलन से ही भूमि में अपेक्षित सरसता रहती है, पृथ्वी पर हरीतिमा छायी रहती है, वातावरण में स्वाभाविक उत्साह उत्पन्न होता है जिससे समस्त प्राणियों का जीवन सुखमय तथा आनन्दमय बनता है। शुक्ल यजुर्वेद में प्रार्थना की गई है कि "पवन मधुर, सरस व शुद्ध तथा गतिशील रहे, सागर मधुर वर्षण करे, ओज प्रदान करने वाली अन्नादि वस्तुएँ भोजन के बाद मधु के समान सुकोमल बन जाएँ, रात के साथ-साथ दिन भी मधुर रहे, पृथ्वी की धूल से लेकर अन्तरिक्ष तक मधुर हों। न केवल जीवित मनुष्यों का, अपितु पितरों का जीवन भी मधुमय रहे। सूर्य मधुमय रहें, गायें मधुर दूध देने वाली हों। निखिल ब्रह्माण्ड मधुमय रहे। इन ऋचाओं में संपूर्ण सृष्टि, प्रकृति और समाज के सुखी, संपन्न और शांतिमय जीवन का स्पष्ट संदेश है। सामाजिक स्वास्थ्य का एक सुन्दर संदेश यजुर्वेद के छत्तीसवें अध्याय के अट्ठारहवें मंत्र में आया है कि "प्राणियों के प्रति सहृदयता का परिचय देना ही जीवन का सही लक्षण है"

रामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगों सौ से अधिक चौपाइयां ऐसी हैं जिनमें प्रकृति के सौन्दर्य का चित्रण है। एक चौपाई में कहा गया है-

सुन्दर वन कुसमित अति सोभा,

 गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।

कंद मूल फल पत्र सुहाए,

 ते भए बहुत तग ते प्रभु आए॥

अर्थात वन सुन्दर हैं, फूलों से शोभायमान हैं, कंद मूल फल सब लगे हैं और भ्रमर गुंजायमान कर रहे हैं। यह तभी संभव होगा जब वन संरक्षित होंगे। वहीं महर्षि वाल्मीकि ने भी सावधान किया है कि ‘‘बिना प्रकृति संतुलन के कुछ भी संरक्षित नहीं रह सकता क्योंकि इस सम्पूर्ण जगत के अस्तित्व का आधार प्रकृति है। पर्यावरण संरक्षण के अभाव में जीवन शून्य है"।

आज यदि संसार में समस्या आ रही है। समाज और सृष्टि का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है तो इसका एक ही कारण है कि भारतीय समाज अपने मूल चिंतन से दूर हो गया है। प्रगति आवश्यक है, तकनीक विकास भी आवश्यक है। संसार से स्पर्धा भी आवश्यक है लेकिन अपने मूल से समन्वय बनाकर की जाने वाली यात्रा ही सार्थक होगी।

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