3 सितम्बर 1857 : तेरह वर्षीय बालिका मैना देवी का बलिदान

पराधीनता काल के भीषण अत्याचारों से केवल सल्तनतकाल का इतिहास ही रक्तरंजित नहीं है, अंग्रेजी काल में भी दर्जनों ऐसी क्रूरतम घटनाएँ इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, जिन्हें पढ़कर आज भी प्रत्येक भारतीय आत्मा रो उठती है। अंग्रेजों ने भी क्रूरता और अत्याचार की सभी मर्यादाएँ तोड़ी हैं। ऐसी ही एक घटना कानपुर के पास बिठूर की है। अंग्रेजों ने पहले एक तेरह वर्षीय बालिका मैना देवी को कठोरतम यातनाएँ दीं और फिर जिंदा जला दिया। यह बालिका मैना देवी नाना साहब पेशवा की दत्तक पुत्री थी।

1857 के स्वाधीनता संग्राम में कानपुर एक प्रमुख केंद्र था। यहीं से क्रांति के संदेश देश भर में फैले थे। प्रत्येक स्थान के लिए क्रांति के कारण अपने अलग थे, पर सबको संयोजित करने की योजना कानपुर में ही बनी थी। इसकी कमान नाना साहब पेशवा के हाथ में थी। उनकी ओर से तात्या टोपे ने एक टोली बनाकर भारत भर में संदेशवाहक भेजे थे। संदेशों के आदान-प्रदान का काम भ्रमण करने वाले संन्यासी और ग्राम पुरोहित कर रहे थे। देश भर में वातावरण बनाकर कानपुर में क्रांति का शंखनाद किया गया और नाना साहब ने सत्ता भी संभाल ली।

नाना साहब पेशवा ने सभी अंग्रेज परिवारों को सुरक्षित आगरा भेजने का प्रबंध भी कर लिया था। इसके लिए दो सौ नावें एकत्र कर ली गई थीं, ताकि जल मार्ग से ये सभी यूरोपीय परिवार सुरक्षा के साथ जा सकें। कुछ नावें रवाना भी हुईं, किंतु सत्तीचौरा में कुछ सैनिकों की प्रतिक्रिया हुई और शेष बचे अंग्रेज परिवारों को मार डाला गया।

इस समाचार से लंदन तक बौखलाहट हुई। कानपुर में दमन के आदेश हुए। जनरल नील और जनरल हैवलॉक दो सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ लेकर कानपुर पहुँचे। अंग्रेजों का पारा सातवें आसमान पर था। उन्हें किसी भी प्रकार अपनी सत्ता तो वापस पाना ही थी, किंतु इससे अधिक वे अंग्रेज परिवारों के वध का बदला लेना चाहते थे। वह भी इस क्रूर योजना के साथ कि भविष्य में कोई भी अंग्रेज परिवारों पर आँख उठाकर देखने का दुस्साहस न कर सके।

जनरल नील और हैवलॉक अपनी क्रूरतम सैन्य कार्रवाई के लिए कुख्यात थे। इसीलिए इन दोनों जनरलों को उनकी सेना के साथ कानपुर भेजा गया। इन सेनाओं ने पूरे क्षेत्र पर घेरा डालकर कत्लेआम प्रारंभ कर दिया। इनका कत्लेआम पहले कानपुर नगर में नहीं, आसपास के गाँवों में हुआ। वे कानपुर के सभी संपर्क मार्गों पर एक दीवार बनकर खड़े हो गए, ताकि बाहर से खाद्यान्न या सैनिक आदि किसी भी प्रकार की सहायता नगर के भीतर न पहुँच सके। न कोई संदेश आ सके और न संदेश जा सके। इस रणनीति से उन्होंने संपर्क तो तोड़ा ही, साथ ही आतंक फैला कर क्रांतिकारियों को समर्पण के लिए विवश भी करना चाहते थे।

अंग्रेज नाना साहब को पकड़ना चाहते थे। इसका संकेत नाना साहब को लग गया था। वे किसी प्रकार सुरक्षित निकल गए और बिठूर पहुँच गए। अंग्रेजों को नाना साहब के बिठूर पहुँचने की सूचना मिल गई थी। अंग्रेजी सेना ने पहले कानपुर में विध्वंस और कत्लेआम किया, फिर बिठूर पहुँची। बिठूर का किला घेर लिया गया। नाना साहब किसी प्रकार वेश बदलकर निकल गए, पर उनके द्वारा गोद ली गई बालिका मैना रह गई।

नाना साहब ने मैना को तब गोद लिया था, जब वह बहुत छोटी थी। मैना देवी उसी किला-महल में खेल-कूदकर बड़ी हुई थी।

यहाँ इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ का मानना है कि नाना साहब अपनी पुत्री को भी साथ ले जाना चाहते थे, पर वह स्वयं जिद करके रुक गई थी। जबकि कुछ का मानना है कि मैना देवी बिठूर में पहले से थी। नाना साहब जब वेश बदलकर कानपुर से निकले, तब वे बिठूर आए ही नहीं। वे कानपुर से अज्ञातवास के लिए चले गए थे। और जब उन्होंने अपने विश्वासपात्र सैनिकों को बालिका को लेने के लिए बिठूर भेजा, तब तक देर हो चुकी थी।

बिठूर का किला घिर चुका था। कुछ सैनिक बालिका को निकालने के लिए किले में प्रविष्ट तो हो गए, पर बाहर न निकल सके। सत्तीचौरा कांड के बाद बौखलाए अंग्रेजों ने यहाँ भी वही रणनीति अपनाई। न कोई बाहर आ सके और न कोई भीतर जा सके। उन्होंने पानी की आपूर्ति भी काट दी थी।

अंग्रेज सत्तीचौरा कांड के लिए नाना साहब को ही जिम्मेदार मान रहे थे। इसलिए नाना साहब को बहुत जल्द जिंदा या मुर्दा पकड़ना चाहते थे। घेरा डालकर अंग्रेजी सेना की तोपें गरज उठीं। महल लगभग ध्वस्त हो गया। सेना अंदर घुसी। सैनिकों को जो सामने दिखा, उसे मौत के घाट उतार दिया। सारा सामान लूट लिया और बालिका मैना बाई को पकड़कर ले आए। उसे सैन्य अधिकारी आउटरम के सामने पेश किया गया और फिर हैवलॉक के सामने लाया गया।

अंग्रेज बालिका से नाना साहब का पता जानना चाहते थे। हैवलॉक के आदेश पर बालिका को कठोर यातनाएँ दी गईं। खंभे से बाँधकर गर्म सलाखों से दागा गया। जली हुई त्वचा पर नमक-मिर्च डालकर नाना साहब का पता पूछा गया।

एक तो बालिका को पता ही नहीं था कि नाना साहब कहाँ हैं और फिर वह नाना साहब की दत्तक पुत्री थी। उसका पालन-पोषण स्वाभिमान और जागरण के साथ हुआ था। यातनाओं के बीच भी बालिका ने स्पष्ट और बेझिझक उत्तर दिए। वह अचेत हो गई। अंग-अंग से घायल वह चौदह वर्षीय बालिका दो दिन तक पेड़ से बंधी रही। उसे खाना तो दूर, पानी तक नहीं दिया गया।

अंततः दो दिन बाद उस पर घासलेट डालकर आग लगा दी गई। वह 3 सितम्बर 1857 का दिन था, जब अंग्रेजों की क्रूरता से इस बालिका का बलिदान हुआ। इसके बाद पूरे महल को तोप से ध्वस्त कर दिया गया। जितने लोग जिंदा मिले, सभी मार डाले गए और नाना साहब का पता बताने वाले को एक लाख रुपये का पुरस्कार देने की घोषणा हुई। पर नाना साहब का पता कभी किसी को न लगा।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि नाना साहब नेपाल चले गए थे और वहीं उन्होंने देह त्यागी, जबकि कुछ इतिहासकारों का मानना था कि वे मध्य प्रदेश में पार्वती नदी के किनारे बसे गाँव पीलूखेड़ी में साधु-वेश में रहे और वहीं उन्होंने देह त्यागी।

सत्य जो भी हो, किंतु जिस प्रकार बालिका मैना देवी का बलिदान हुआ, उस वृत्तांत को पढ़कर आज भी भारतीयों की आँखें नम हो जाती हैं।

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