सनातन धर्म में भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलदाऊजी के प्रगटोत्सव दिवस को हल षष्ठी (हरछठ, ललही छठ) व्रत के रूप में मनाया जाता है। महिलाएँ संतान की प्राप्ति तथा माताएँ उनकी दीर्घायु एवं कल्याण के लिए ‘मनसा, वाचा, कर्मणा’ हल षष्ठी का व्रत अनादि काल से रखती आ रही हैं। यह व्रत हल और कृषि के सम्मान से भी जुड़ा है। इस दिन हल, बैल और खेती में काम आने वाले उपकरणों की पूजा की जाती है तथा हल से जुते हुए खेत का अन्न एवं फल खाना वर्जित होता है। व्रत के पारण में उपयोग की जाने वाली खाद्य सामग्री, जल एवं प्रकृति संरक्षण का संदेश देती है। यह व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। तदनुसार वर्ष 2026 में यह व्रत 2 सितंबर, बुधवार को है।

पंचांग गणना के अनुसार षष्ठी तिथि 2 सितंबर 2026 को प्रातः 06:12 बजे से प्रारंभ होगी और 3 सितंबर 2026 को प्रातः 04:25 बजे समाप्त होगी। पूजा का मुख्य मुहूर्त प्रातः 05:39 बजे से 08:10 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:14 बजे से 01:05 बजे तक है। उदयातिथि और दिन भर षष्ठी तिथि की विद्यमानता के कारण 2 सितंबर को ही व्रत रखना और पूजा करना शास्त्रसम्मत माना गया है।

हल षष्ठी की व्रत-कथा के पूर्व जबलपुर में स्थित बलदाऊजी के अद्भुत और अद्वितीय मंदिर पर प्रकाश डालना समीचीन जान पड़ता है। जबलपुर के मिलौनीगंज क्षेत्र में बलदाऊजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता श्री बलदाऊजी को समर्पित है।

वैशाख संवत 1879 में राय बहादुर बंसीलाल अमीरचंद के भूतपूर्व मुनीम राय साहब पंडित गोविंद लाल पुरोहित द्वारा इसकी नींव रखी गई। बाद में मुनीम वल्लभ दास कोठारी द्वारा इस मंदिर को मूर्त रूप दिया गया। इस मंदिर का वास्तु किले जैसा है, जो मराठा शैली के अनुकरण पर निर्मित है। ऊपरी मंजिल में परकोटा तथा गवाक्ष अत्यंत आकर्षक एवं लुभावने हैं।

बुर्जों में कक्ष बने हैं तथा उनकी छत पर गोलाकार स्तंभों पर आधारित छतरियाँ बनी हुई हैं। दरवाजों और खिड़कियों को चंद्रवल्लरी मेहराबों से सजाया गया है। ऊपरी मंजिल में छतरीनुमा बालकनी है, जो इस मंदिर की भव्यता को बढ़ाती है। निकले हुए छज्जों को अलंकृत ब्रैकेटों से सजाया गया है, जो इस मंदिर के वास्तु-सौंदर्य को अद्भुत एवं अद्वितीय बनाता है।

हल षष्ठी का व्रत भगवान श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलरामजी को समर्पित है और यह भाद्रमास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को रखा जाता है। इस व्रत को करने से संतान दीर्घायु और सुखी-संपन्न होती है तथा उनके जीवन में प्रसन्नता बढ़ती है। आइए जानते हैं इस व्रत की तिथि। भारत में इस व्रत को ‘ललही छठ’ या ‘हर छठ’ के नाम से भी कहा जाता है।

भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलरामजी को यह व्रत समर्पित होता है। इस वर्ष हल षष्ठी का व्रत 2 सितंबर को रखा जाएगा। जिन दंपतियों को संतान-सुख की प्राप्ति नहीं हुई है, वे भी इस व्रत को कर सकते हैं। भगवान बलदाऊ के आशीर्वाद से उन्हें भी संतानोत्पत्ति होगी।भादों मास की कृष्ण षष्ठी को ही बलरामजी का अवतरण हुआ था और इनके अवतरण की खुशी में माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत को रखने से बलरामजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएँ हल से जोती गई फसल से उत्पन्न हुई कोई भी वस्तु ग्रहण नहीं करती हैं।

वस्तुतः हल को बलरामजी का शस्त्र माना गया है। इसलिए हल से जोतने के उपरांत उत्पादित वस्तुओं का प्रयोग वर्जित माना जाता है। महिलाएँ इस दिन मूलतः जलाशयों में उगाई गई वस्तुएँ खाकर व्रत रखती हैं।हल षष्ठी का व्रत महिलाएँ संतान-सुख की कामना के लिए करती हैं। इस व्रत को करने से संतान की आयु लंबी होती है। यह व्रत संतान की आयु बढ़ाने वाला माना जाता है। इस व्रत को करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार माने जाने वाले बलराम का अवतरण हुआ था। हल षष्ठी के दिन महिलाओं को महुआ की दातून करनी होती है और साथ ही महुआ खाना भी आवश्यक होता है।

हरछठ व्रत की पूजा दोपहर में करने का विधान है। व्रतधारी महिलाएँ न तो हल चलाकर उगाई जाने वाली वस्तुओं को ग्रहण करती हैं और न ही नमक का सेवन करती हैं। इसके लिए पसई के चावल तथा भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग किया जाता है। साथ ही बाँस की डलिया इस पूजन में प्रयोग की जाती हैं, जिन्हें चुनका भी कहा जाता है। वहीं मिट्टी के बने कुल्हड़ और दीपकों का भी उपयोग होता है।

हल षष्ठी व्रत का सिंहावलोकन यह है कि मान्यताओं के अनुसार बलराम का प्रमुख शस्त्र हल है। इसे धारण करने के कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उन्हीं के नाम पर इस व्रत को हल षष्ठी के नाम से जाना जाता है। इस व्रत में खेती में उपयोग होने वाले सामान की पूजा होती है।

हलछठ की पूजा में महुआ, पसई के चावल, चना, मक्का, ज्वार, सोयाबीन व धान की लाई तथा भैंस के दूध एवं गोबर का विशेष महत्व रहता है। हलछठ के दिन दोपहर में घर-आँगन में महुआ, बेर की डाल और कांस के फूल से हलछठ स्थापित कर श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना की जाती है। सतगजरा, तेल, चूड़ी, काजल, लकड़ी की ककई, बाँस की टोकनी, नारियल, केला और ककड़ी का प्रसाद चढ़ाया जाता है।भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसे हरछठ, ललही छठ, हलछठ, कमरछठ या तिन्नी छठ के नामों से भी पुकारा जाता है।

छत्तीसगढ़ में ‘कमरछठ’ या ‘खमर छठ’ के नाम से यह पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। माताएँ आँगन में मिट्टी की सगरी (छोटा तालाब) बनाती हैं, जिसमें बेर, पलाश और गूलर की टहनियाँ गाड़कर पूजा करती हैं। इस दिन बिना हल चले उगने वाले पसहर चावल (तिन्नी का चावल) और छह प्रकार की भाजी (साग) का प्रसाद बनाया जाता है। पूजा के बाद माताएँ बच्चों की पीठ पर छुही मिट्टी के रंगीन छापे मारकर और कमर पर कपड़े के पोते से छह बार थपथपाकर आशीर्वाद देती हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार में ‘ललही छठ’ या ‘हरछठ’ के नाम से यह पर्व प्रसिद्ध है। इस दिन महुआ की दातून करने की परंपरा है। महिलाएँ महुआ के पत्तों, चने और तिन्नी के चावल से महुआ की कढ़ाही (लाटा) बनाकर मटकी में भरकर पूजा करती हैं। पूजा स्थल पर मिट्टी के बर्तनों (कुल्हड़) में सतनजा (सात प्रकार के भुने हुए अनाज) भरकर रखे जाते हैं और संतान की संख्या के अनुसार मिट्टी के खिलौने चढ़ाए जाते हैं।

मध्य प्रदेश में यह ‘हरछठ’ या ‘बलराम जयंती’ के नाम से प्रसिद्ध है, वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड और बघेलखंड क्षेत्रों में इसे ‘बलदेव छठ’ के नाम से जाना जाता है। विशेष परंपरा के रूप में, चूँकि बलरामजी का मुख्य शस्त्र ‘हल’ है, इसलिए इस दिन खेती में उपयोग होने वाले हल और बैलों की पूजा की जाती है। महिलाएँ दिन भर निर्जला उपवास रखकर शाम को एकत्र होकर हरछठ माता और श्रीकृष्ण-उत्तरा की पौराणिक कथाएँ सुनती हैं।

राजस्थान और गुजरात में यह ‘चंदना छठ’ या ‘रांधन छठ’ नाम से प्रसिद्ध है। पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में इसे चंदना छठ के रूप में जाना जाता है, जो शीतला सप्तमी से एक दिन पहले आता है।

गुजरात में इसे रांधन छठ के तौर पर भी देखा जाता है, जहाँ अगले दिन (शीतला सप्तमी) के लिए ठंडा भोजन तैयार किया जाता है। यहाँ भी संतान की रक्षा के लिए भगवान बलराम और माता षष्ठी की पूजा का विधान है।

हल षष्ठी व्रत केवल एक धार्मिक उपवास नहीं है, वरन् यह भारतीय कृषि संस्कृति, पर्यावरण के प्रति सम्मान और ग्रामीण जीवनशैली को सहेजने वाला एक अनूठा पर्व है। किसान समुदाय में हल षष्ठी व्रत (हरछठ या ललही छठ) का विशेष महत्व है, क्योंकि यह पर्व सीधे तौर पर कृषि, भूमि और पशुधन से जुड़ा हुआ है। बलरामजी को ‘हलधर’ कहा जाता है, इसलिए किसान समुदाय इस दिन खेती के सबसे महत्वपूर्ण उपकरण ‘हल’ की पूजा करके कृषि कार्य के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है और भूमि को आराम देता है। अर्थात् इस दिन प्रतिज्ञा के तौर पर खेतों में हल नहीं चलाया जाता है।

इस व्रत में गाय के दूध, दही या घी का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है, जिसका उद्देश्य भैंस के दूध की महत्ता दर्शाना है। पूजा में महुआ और पलाश के पत्तों का विशेष रूप से उपयोग किया जाता है, जो वनों और पर्यावरण से जुड़ाव को दिखाता है। सप्तधान्य के रूप में चना, जौ, गेहूँ, धान, अरहर, मक्का और मूँग का पूजन अच्छी फसल की कामना और कृषि-समृद्धि से जुड़ा अनुष्ठान है।

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