ऊख के ऊपर खूब हरे पत्ते सजा दो, उसे रंग कर एस्थेटिक बना दो, उसके आस पास फूल माला जल रख कर आकर्षक बना दो, बढ़िया संगीत चला दो लेकिन ऊख का आनंद उसके रस में है। ऊख के रस का आनंद लेने के लिए पत्ते रंग फूल संगीत सब हटाने होंगे। ऊख के रस के स्वाद की तृप्ति उसके मीठेपन में है और यह मिठास किसी विकल्प से नहीं है। यह मिठास मौलिक है। 

ए आई के दौर में जब बिना कलाकार के, बिना यंत्रों के संगीत बजाया जा रहा था तो एक बार मुझे लगा कि अब सब कुछ ए आई ही करेगा लेकिन मात्र एक इकतारे से एक ऐसा युवक जो देख नहीं सकता, उसने ऐसा राग गाया कि चारों तरफ निर्मल अनुराग का विस्तार होता गया।

सुनील लोधी ने बिना अंग्रेजी, बिना सरकारी हिंदी या किसी औपचारिक प्रशिक्षण के मात्र अपनी लोक शक्ति के आधार पर जब हनुमान जी को टेरा तो विश्वास प्रबल हो उठा कि लोक की शक्ति के आगे ए आई, बनावटी संगीत तृण मात्र है।

दुनिया कितनी भी आगे चली जाए पर उसका कोई महत्व नहीं है, महत्व इस बात का है कि हमने अपनी संवेदनाओं को कितना ऊर्ध्व किया। संवेदना ही प्राणी को मनुष्य बनाती है, साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान यह सब उसी संवेदना को जगाने का माध्यम हैं, मनुष्य की आदिम प्यास चाहे वह एक अदद साथी की हो, ज्ञान की हो, मुक्ति की हो, उस प्यास को तृप्त करने के साधन हैं। इन साधनों को नियंत्रण का साधन बना देना मानवता का पतन है।

हनुमान अंश अब मात्र कोई फिल्म न होकर उसके बहुत आगे का विषय हो गई है। जो इस घटना के माध्यम से संकेत समझ सके वही बाबा नीम करौली के संदेश को समझ सकता है। हिंदू सभ्यता मंगता सभ्यता होने से बचे, जो है उसे स्वीकार करते हुए अपना कर्म करे, अपने पूर्वजों का सम्मान इस रूप में न करे कि उनसे उसे कुछ मिल जाने का लालच है बल्कि उनके गुणों को आत्मसात करे तभी सामर्थ्य और पुरुषार्थ बढ़ेगा, तभी आप सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

विशुद्ध लोक से ही लौकिक और लौकिक से पारलौकिक की यात्रा हनुमान अंश की यात्रा है।

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