मनुष्य केवल तथ्यों में नहीं, अपितु कथाओं में भी जीता है। स्मृतियों, अनुभवों, मान्यताओं और आशंकाओं को जोड़कर वह अपने लिए एक प्रति-संसार रचता है। घटनाएँ अपने-आप में बिखरी हुई हो सकती हैं, किंतु मनुष्य उन्हें एक क्रम, कारण और अर्थ देता है। यह उसका वास्तविकता को समझने का अपना ढाँचा होता है। संकट तब उत्पन्न होता है, जब यह ढाँचा सत्य को समझने के बजाय किसी पूर्व निर्धारित निष्कर्ष को स्थापित करने के लिए बनाया जाए। कुछ तथ्य चुने जाएँ, असुविधाजनक तथ्य छोड़ दिए जाएँ, संदर्भ काट दिया जाए, अपवाद को नियम बना दिया जाए और फिर इन सबके सहारे ऐसी कथा रची जाए जो देखने में तथ्यपूर्ण हो, किंतु समग्रता में असत्य हो। यही नैरेटिव का मायाजाल है। 
 


 
विचारणीय है कि नैरेटिव अपने-आप में न तो झूठ होता है, न षड्यंत्र। इसी तरह, ‘फेक न्यूज’ और ‘झूठे नैरेटिव’ में अंतर होता है। फेक न्यूज में एक तथ्य गलत हो सकता है; झूठे नैरेटिव में तथ्य सही होते हुए भी उनके बीच स्थापित-संबंध गलत हो सकता है। उदाहरण के लिए, किसी नगर में तीन अपराध होना तथ्य है; उन्हीं तीन घटनाओं को लगातार दिखाकर यह निष्कर्ष स्थापित करना कि पूरा नगर अपराधियों के नियंत्रण में है—एक नैरेटिव है। यहाँ झूठ घटना में नहीं, बल्कि अनुपात और अर्थ में है।

 
नैरेटिव की निर्मिति को मोटे तौर पर तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—संस्कृति, संचार और संज्ञान।
हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ और सामाजिक संस्कार यह निर्धारित करते हैं कि कौन-सी कथा हमें सहज विश्वसनीय लगेगी; संचार-माध्यम यह तय करते हैं कि कौन-सी सूचना हमारे सामने कितनी बार आएगी और हमारा विवेक यह चुनता है कि उस सूचना में से हम क्या ग्रहण करेंगे और क्या छोड़ देंगे। यहीं, मनुष्य की मानसिक सहजताएँ उसकी कमजोरियाँ भी बन जाती हैं। तथ्य है कि हमारा मस्तिष्क जटिलता की अपेक्षा पैटर्न पसंद करता है। वह अपूर्ण सूचनाओं को जोड़कर कहानी बना लेता है। जो बात हमारी पहले से बनी मान्यता से मेल खाती है, उसे हम अपेक्षाकृत सहजता से स्वीकार करते हैं; जो उसे चुनौती देती है, उससे प्रमाण की अधिक माँग करते हैं। यही पुष्‍टीकरण पूर्वाग्रह (Confirmation Bias) है। इसके साथ भावात्मक पूर्वाग्रह (Affective Bias) भी काम करता है— अर्थात् भय, क्रोध, अपमान, असुरक्षा, घृणा अथवा अत्यधिक गर्व जैसी भावनाएँ विवेक को पीछे धकेल सकती हैं।

भ्रामक नैरेटिव अक्सर तर्क से पहले भावना पर प्रहार करते हैं

 
देखा जाता है‍ कि भ्रामक नैरेटिव अक्सर तर्क से पहले भावना पर प्रहार करते हैं—“आपसे यह सच छिपाया जा रहा है”, “अब भी नहीं जागे तो देर हो जाएगी”, “इसे देखकर आपका खून खौल उठेगा।” इन उदाहरणों में भाषा सूचना का माध्यम भर नहीं रहती; वह एक नैरेटिव के रूप में मनोवैज्ञानिक उपकरण बन जाती है। नैरेटिव पर विचार करने के संदर्भ में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वास्तविकता जटिल होती है और उसके बहुत से कारण होते हैं, पर मन सरल उत्तर चाहता है। मनुष्य की एक गहरी आकांक्षा है—निश्चितता। आर्थिक संकट का एक दोषी, सामाजिक समस्या के पीछे एक समुदाय, हर असफलता के पीछे एक गुप्त शक्ति—ऐसी व्याख्याएँ मानसिक रूप से सुविधाजनक होती हैं। ऐसे में, कोई भी नैरेटिव आसानी से चल जाता है।

 
इसी प्रकार, समाज भी व्यक्ति की तरह अपने बारे में कथाएँ बनाता है। यदि किसी राष्ट्र को लगातार बताया जाए कि उसका इतिहास केवल पराजय है, उसकी संस्कृति केवल रूढ़ि है, उसकी भाषाएँ ज्ञान की वाहक नहीं हैं और उसकी उपलब्धियाँ संयोग हैं, तो धीरे-धीरे राष्ट्रीय आत्महीनता का नैरेटिव निर्मित हो सकता है। ऐसे में, राष्‍ट्रीय अस्मिताबोध से युक्‍त व्‍यक्ति प्रश्‍न करता है कि मुझे तथ्य दिए जा रहे हैं  या तथ्यों के सहारे मेरे भीतर कोई पूर्वनिर्धारित कथा स्थापित की जा रही है? झूठे नैरेटिव को पहचानने की शुरुआत विचारधारा से नहीं, पद्धति से होनी चाहिए। सूचना हमारे पक्ष में हो या विरोध में; परंतु जाँच की कसौटी समान हो। यदि हम अपने अनुकूल सूचना को बिना प्रमाण स्वीकार करें और प्रतिकूल सूचना से प्रमाण माँगें, तो हम सत्य के नहीं, बल्कि अपने पक्ष के प्रति निष्ठावान हैं।

 
पहला प्रश्न होना चाहिए—मूल स्रोत कौन है? उदाहरण के लिए, “विशेषज्ञों का कहना है”, “वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया”, “एक प्रतिष्ठित रिपोर्ट में खुलासा हुआ”—ये वाक्य तब तक प्रमाण नहीं हैं, जब तक विशेषज्ञ, अध्ययन अथवा दस्तावेज की पहचान न हो। लेखक कौन है? संस्था की विश्वसनीयता क्या है? उसका मूल दस्तावेज उपलब्ध है या नहीं?

 
दूसरा प्रश्न—क्या प्रमाण वास्तव में दावे का समर्थन करता है? उदाहरण के लिए- किसी पोस्ट के साथ लिंक लगा होना प्रमाण नहीं। लिंक खोल कर जॉंचना चाहिए। रिपोर्ट वास्तव में वही कहती है या शीर्षक ने उसका अर्थ बदल दिया? कहीं ‘संभावना’ को ‘निश्चित सत्य’ तो नहीं बना दिया गया? इसी प्रकार, आँकड़ों में प्रतिशत के साथ वास्तविक संख्या, सर्वेक्षण में सैंपल साइज, स्‍केल आदि अन्‍य तुलनात्‍मक आधार को देखना चाहिए; क्‍योंकि आँकड़ा सही होते हुए भी उसका प्रस्तुतीकरण भ्रामक हो सकता है।

 
तीसरा प्रश्न होना चाहिए—
संदर्भ क्या है? आज डिजिटल दुनिया में असत्य का सबसे प्रभावी रूप निर्माण नहीं, संपादन है। बीस मिनट के वक्तव्य से बीस सेकंड निकालिए, पाँच वर्ष पुरानी तस्वीर को आज से जोड़ दीजिए, वीडियो के पहले और बाद के दृश्य हटा दीजिए—अर्थ बिलकुल बदल सकता है। इसलिए किसी दृश्य सामग्री के सामने चार छोटे प्रश्न उपयोगी हैं—कब का? कहाँ का? किसने बनाया? पूरा संदर्भ क्या है?

 
वर्तमान समय में, AI ने इस चुनौती को और जटिल कर दिया है। तस्वीर, आवाज और वीडियो अब केवल इसलिए अंतिम प्रमाण नहीं कि वे ‘देखने में असली’ हैं। पुराने चित्र, क्रॉप्‍ड इमेजेज, एडिटेड ऑडियो, गलत कैप्‍शनस्, डीप फेक और AI- से निर्मित सामग्री सब नैरेटिव का हिस्सा बन सकते हैं। अफवाह और दुष्प्रचार का भी अपना पारिस्थितिकी-तंत्र होता है। इसके साथ ही, सोशल मीडिया का संरचनात्मक प्रभाव जुड़ जाता है। आज तकनीक का मायाजाल ऐसा है कि हमें बार-बार वही सामग्री दिखाई जाती है, जो हमारी मान्यताओं की पुष्टि करे। अल्‍गोरिदम ऐसा कि सनसनी, भय और आक्रोश को अधिक दिखाए। ऐसे में वायरल को विश्‍वसनीय समझने की भूल होती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हजारों शेयर और सौ अकाउंट किसी दावे को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं करते, यदि वे सभी एक ही मूल स्रोत की प्रतिध्वनि हों, क्‍योंकि पुनरावृत्ति प्रमाण नहीं है।

 
इस संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि संगठित नैरेटिव प्रोपेगैंडा इससे आगे बढ़कर कृत्रिम सामाजिक सहमति निर्मित कर सकते हैं—समन्वित अकाउंट, एक जैसी भाषा, भ्रामक शीर्षक, काटे गए वीडियो और चुनिंदा आँकड़े किसी कथा को ‘सर्वमान्य’ दिखा सकते हैं। ऐसे में, सबसे कठिन जाँच स्वयं की है। यदि वही सूचना हमारे प्रिय नेता, समूह या विचार के विरुद्ध होती, तो क्या हम उसे इतने ही सहज ढंग से स्वीकार करते? यदि नहीं, तो समस्या सूचना में ही नहीं, हमारे पूर्वाग्रह में भी है। झूठे नैरेटिव को पहचानने के लिए पाँच प्रश्न को आधार बनाया जाना चाहिए—स्रोत क्‍या है? प्रमाण क्या है? संदर्भ क्या है? स्वतंत्र पुष्टि कहाँ है? और मैं इसे सच या झूठ क्यों मानना चाहता हूँ? ऐसे, झूठे नैरेटिव का सबसे दूरगामी प्रभाव तब होता है जब वह किसी घटना के बारे में हमारी राय बदलने से आगे बढ़कर हमारे सामूहिक स्व-बोध को बदलने लगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय चेतना को प्रभावित करने वाला नैरेटिव केवल सूचना का प्रश्न नहीं, सांस्कृतिक सुरक्षा का प्रश्न भी है।

 
यहां इसकी चर्चा भी समीचीन होगी कि 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सली  हिंसा की चर्चा करते हुए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग किया। इस अभिव्यक्ति का आशय केवल बंदूक उठाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह वैचारिक वातावरण भी है, जो हिंसा, अराजकता या सामाजिक विघटन को बौद्धिक औचित्य प्रदान कर सकता है। हाँ, यहाँ यह ध्‍यान रखना आवश्यक है—सरकार की आलोचना, इतिहास की वैकल्पिक व्याख्या, नीतियों पर असहमति अथवा सत्ता से प्रश्न लोकतंत्र के स्वाभाविक अंग हैं। चुनौती वहाँ है, जहाँ विचार तथ्यहीन घृणा, हिंसात्मक औचित्य, संस्थागत विघटन या समाज को स्थायी संघर्ष में धकेलने वाली मानसिकता में बदल जाए। कदाचित् यही राष्ट्रबोध और पक्षबोध का अंतर है। राष्ट्रबोध किसी सरकार का स्थायी समर्थन नहीं; वह राष्ट्र के दीर्घकालिक हित, सामाजिक एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और संवैधानिक जीवन के प्रति प्रतिबद्धता है। राष्ट्रीय चेतना वाला नागरिक सरकार से प्रश्न भी कर सकता है और राष्ट्रहित के लिए दृढ़ भी रह सकता है।

 
विदित है कि परिपक्व राष्ट्रीय अस्मिता न आत्महीन होती है, न आत्ममुग्ध। उदाहरण के लिए-भारतीय समाज के बारे में यह कहना कि उसका अतीत केवल अंधकार था, उसकी भाषाएँ आधुनिक ज्ञान के योग्य नहीं और उसकी संस्कृति प्रगति की बाधा है—एक विकृत नैरेटिव हो सकता है।भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति शायद इसी में है कि यहाँ प्रश्न का स्‍वागत होता है। उपनिषदों का संवाद, बौद्ध-जैन विमर्श, शास्त्रार्थ की परंपरा, भक्ति की सामाजिक आलोचना और आधुनिक सुधार आंदोलन—ये सभी दिखाते हैं कि भारतीयता जड़ता का नहीं, संवाद, पुनर्विचार और संश्लेषण का नाम है।

 झूठे नैरेटिव से संघर्ष इसलिए किसी प्रतिनैरेटिव को थोपने का अभियान नहीं होना चाहिए।झूठे नैरेटिव से संघर्ष इसलिए किसी प्रतिनैरेटिव को थोपने का अभियान नहीं होना चाहिए। उसका उत्तर सत्य, नागरिक शिक्षा, मीडिया साक्षरता और समयबद्ध संवाद है। तथ्य-जाँच  आवश्यक है, पर उससे भी पहले आवश्‍यक है नागरिक को यह बताना कि उसकी भावनाओं, पूर्वाग्रहों और डिजिटल आदतों को किस प्रकार प्रभावित किया जा सकता है। 

राष्ट्रीय सूचना-सुरक्षा का प्रश्न नागरिक-चरित्र का प्रश्न है

अंततः, राष्ट्रीय सूचना-सुरक्षा का प्रश्न नागरिक-चरित्र का प्रश्न है। ऐसा नागरिक-वर्ग चाहिए जो अपनी संस्कृति से जुड़ा हो, जो विश्व से संवाद करे पर आत्महीन न हो; विशेषज्ञ का सम्मान करे पर प्रमाण भी माँगे; सत्ता से प्रश्न करे पर अराजकता का रोमानीकरण न करे; स्वदेशी पर विश्वास करे पर गुणवत्ताहीनता को राष्ट्रवाद के नाम पर स्वीकार न करे। आज सीमा की रक्षा जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है- चेतना की रक्षा। उसका शस्त्र सेंसरशिप नहीं, विवेक है; उसका कवच भय नहीं, आत्मविश्वास है और उसका आधार कोई तैयार विचारधारात्मक कथा नहीं, वरन्  सत्य के प्रति निर्भीक निष्ठा है।इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि जिस समाज को अपने इतिहास का बोध, अपनी संस्कृति का ज्ञान, अपने वर्तमान को देखने की आलोचनात्मक दृष्टि और अपने भविष्य पर विश्वास हो, उसे झूठे नैरेटिव से विचलित करना कठिन होता है। झूठे नैरेटिव से बचने के लिए स्‍वर्णिम सूत्र होना चाहिए—अपनी पहचान को इतनी गहराई से जानना कि कोई झूठ उसे हमारे लिए परिभाषित न कर सके तथा सत्य के प्रति इतना सजग रहना कि हमारी सबसे प्रिय मान्यता भी प्रमाण से ऊपर न हो।

 
 

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