कभी-कभी इतिहास में कोई एक क्षण सदियों की मौन साधना को स्वर दे देता है। 11 सितंबर 1893 का दिन ऐसा ही एक क्षण था। अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का विशाल मंच सजा था और दुनिया के अनेक धर्मों एवं सभ्यताओं के प्रतिनिधि वहाँ उपस्थित थे। उसी मंच पर भारत का एक युवा संन्यासी खड़ा हुआ। उसके पास न कोई राजनीतिक सत्ता थी,न किसी साम्राज्य का समर्थन और न पश्चिमी दुनिया में कोई स्थापित पहचान। उसके पीछे था तो केवल भारत का हजारों वर्षों का चिंतन,उसकी तपस्या से अर्जित दार्शनिक दृष्टि और समूची मानवता को एक परिवार मानने वाली उसकी सांस्कृतिक चेतना। जब उस संन्यासी ने कहा “Sisters and Brothers of America”  तो यह केवल एक संबोधन नहीं था,यह भारत की आत्मा का विश्व से आत्मीय संवाद था।

उस दिन स्वामी विवेकानंद ने केवल हिंदू धर्म का परिचय नहीं दिया था। उन्होंने विश्व के सामने उस भारत का दर्शन रखा था,जिसने जीवन के सबसे गहरे प्रश्नों पर हजारों वर्षों तक विचार किया है। यह वह भारत था,जिसके लिए धर्म किसी संकीर्ण पहचान का नाम नहीं,बल्कि सत्य की खोज की यात्रा है,जिसके लिए विविधता विभाजन नहीं,अस्तित्व की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है और जिसके लिए मनुष्य केवल शरीर नहीं,बल्कि चेतना का एक विराट आयाम है।11 सितंबर 1893 भारतीय इतिहास में इसलिए स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है कि उस दिन भारत ने अपनी सांस्कृतिक और दार्शनिक पहचान को किसी संकोच के साथ नहीं,बल्कि आत्मविश्वास के साथ विश्व के सामने रखा। यह केवल एक भाषण की सफलता नहीं थी,यह उस सभ्यता की वैचारिक प्रतिष्ठा का क्षण था,जिसे औपनिवेशिक मानसिकता ने लंबे समय से पिछड़ेपन और अंधविश्वास के चश्मे से देखने का प्रयास किया था।

1893 का भारत राजनीतिक पराधीनता,सामाजिक चुनौतियों और आत्महीनता के दौर से गुजर रहा था। ऐसे समय में भारत के एक युवा संन्यासी का अमेरिका की धरती पर जाकर विश्व धर्म संसद के मंच से अपनी सभ्यता का परिचय कराना असाधारण घटना थी। स्वामी विवेकानंद के मन में यह भाव दृढ़ हो चुका था कि भारत की आध्यात्मिक और दार्शनिक विरासत को विश्व के सामने रखा जाना चाहिए। मार्ग में अनेक कठिनाइयाँ आईं,आर्थिक संकट सामने आए,परिचय और संसाधनों का अभाव रहा,किंतु वे अपने संकल्प से विचलित नही हुए। शिकागो(अमेरिका) में जब विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ,तब स्वामी विवेकानंद वहाँ किसी राजनीतिक शक्ति या बड़े संस्थान के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित नहीं थे। वे एक ऐसे देश के स्वर बनकर खड़े हुए थे,जिसके पास उस समय राजनीतिक सत्ता नहीं थी,लेकिन जिसके पास हजारों वर्षों की ज्ञान- संपदा थी। उनके पीछे उपनिषदों की विचार-परंपरा,वेदांत का दर्शन,करूणा,संतों की समन्वयकारी चेतना और भारतीय मनीषा की विराट परंपरा थी।

जब उन्होंने अपने संबोधन का आरंभ “Sisters and Brothers of America” . कहकर की,तो यह केवल श्रोताओं को संबोधित करने का तरीका नहीं था। यह भारतीय दर्शन की आत्मीय दृष्टि की उद्घोषणा थी। इसमें मनुष्य को उसकी जाति,पंथ,भाषा या भौगोलिक सीमा से पहले मनुष्य मानने का भाव था। कुछ शब्दों ने सभागार में बैठे लोगों को जिस तरह प्रभावित किया,वह इस बात का प्रमाण था कि सच्चा संवाद औपचारिक संबोधनों से नहीं, हृदय से निकलता है। स्वामी विवेकानंद ने विश्व के सामने हिंदू धर्म का जो स्वरूप रखा,वह संकीर्णता से मुक्त था। उन्होंने इसे किसी एक मत,एक पुस्तक तक सीमित परंपरा के रूप में प्रस्तुत नहीं किया। भारतीय दर्शन के मूल में निहित उस विचार को उन्होंने सामने रखा,जिसके अनुसार सत्य की खोज के अनेक मार्ग हो सकते हैं। विविधता को स्वीकार करना और विभिन्न आध्यात्मिक मार्गों का सम्मान करना भारतीय चिंतन की विशिष्ट पहचान रही है। भारतीय दर्शन की यही व्यापकता उसे विश्व की महान दार्शनिक परंपराओं में विशिष्ट स्थान देती है। उपनिषदों ने मनुष्य को अपने भीतर सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया। वेदांत ने आत्मा और परम सत्य के संबंध पर चिंतन किया। योग ने शरीर,मन और चेतना के अनुशासन का मार्ग दिखाया।भारतीय चिंतन ने प्रश्न पूछने,तर्क करने और सत्य की खोज को कभी बंद नहीं किया। यहाँ दर्शन केवल ग्रंथों में बंद बौद्धिक विमर्श नहीं था,वह जीवन को समझने और उसे बेहतर बनाने का प्रयास था। स्वामी विवेकानंद ने इसी विराट भारतीय दर्शन को पश्चिमी जगत की भाषा में समझाने का कार्य किया। उन्होंने भारत को अतीत की स्मृतियों में कैद सभ्यता के रूप में नहीं,बल्कि मानवता के लिए आज भी उपयोगी विचारों वाली जीवंत संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीय अध्यात्म पलायन का मार्ग नहीं,बल्कि आत्मबल और आत्मबोध का मार्ग है।

"फ्रांसीसी साहित्यकार रोमा रोलां" ने स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व और शिकागो में उनके प्रभाव का वर्णन करते हुए उनकीतेजस्विता,प्रभावशाली व्यक्तित्व,गंभीर वाणी और ओजपूर्ण अभिव्यक्ति का उल्लेख किया है। उनके अनुसार,यह युवा भारतीय संन्यासी जब विश्व धर्म संसद में सामने आया तो उसके व्यक्तित्व और वाणी के प्रभाव से अनेक अन्य प्रतिनिधियों का आकर्षण फीका पड़ गया। भारत का यह संदेशवाहक अमेरिका पर गहरी छाप छोड़ने में सफल रहा। "राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने" भी स्वामी विवेकानंदजी के शिकागो भाषण के प्रभाव का उल्लेख किया है। प्रारंभ में उन्हें सबसे अंत में बोलने का अवसर दिया जाता था,क्योंकि वहाँ उन्हें बहुत कम लोग जानते थे। लेकिन उनके विचारों और वक्तृत्व ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि लोग उनके भाषण सुनने के लिए सभा के अंत तक प्रतीक्षा करने लगे।यह किसी राजनीतिक शक्ति का परिणाम नहीं था। यह ज्ञान,व्यक्तित्व और विचार की शक्ति थी।

शिकागो में स्वामी विवेकानंदजी की सफलता को भारतीय दिग्विजय कहा गया है।लेकिन यह दिग्विजय किसी भूभाग पर अधिकार की नहीं,बल्कि विचार और संस्कृति की दिग्विजय थी। भारत ने उस दिन किसी दूसरे धर्म या सभ्यता को पराजित करने का दावा नहीं किया था। उसने अपनी उस परंपरा का परिचय दिया था,जो विविधता में एकता देखती है और मानवता को संघर्ष से ऊपर उठकर सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाती है।यही कारण है कि स्वामी विवेकानंद का शिकागो संदेश आज भी प्रासंगिक है। दुनिया आज विज्ञान और तकनीक के स्तर पर अभूतपूर्व रूप से आगे बढ़ चुकी है,लेकिन धार्मिक संघर्ष,असहिष्णुता,हिंसा,मानसिक तनाव और सामाजिक विभाजन जैसी समस्याएँ अभी भी हमारे सामने हैं। मनुष्य ने प्रकृति पर नियंत्रण बढ़ाया है,लेकिन अपने भीतर की अशांति पर विजय अभी भी अधूरी है। ऐसे समय में भारतीय दर्शन काआत्मसयंम,करुणा,एकत्व और सह-अस्तित्व का संदेश नई प्रासंगिकता प्राप्त करता है।

 11 सितंबर को स्मरण करते समय प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि विवेकानंद ने शिकागो में क्या कहा था। प्रश्न यह भी होना चाहिए कि क्या हम उस दर्शन को समझ पाए हैं,जिसे उन्होंने विश्व के सामने रखा था? क्या हमारी संस्कृति केवल उत्सव और गौरव के नारों तक सीमित है या उसका प्रभाव हमारे व्यवहार में भी दिखाई देता है? क्या हम विविधता का सम्मान करते हैं? क्या हम असहमति के लिए स्थान रखते हैं? क्या हमारी शिक्षा हमें केवल रोजगार देती है या जीवन को समझने की दृष्टि भी देती है? शिकागो में स्वामी विवेकानंद ने भारत को दुनिया के सामने झुकाकर नहीं,बल्कि आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत किया था। उन्होंने यह संदेश दिया कि भारत की शक्ति उसकी प्राचीनता भर में नहीं,बल्कि उस विचार में है जो समय के साथ भी प्रासंगिक बना रह सकता है। भारतीय दर्शन मनुष्य को बाहरी विजय से पहले अपने भीतर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। इसलिए 11 सितंबर 1893 केवल स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की स्मृति नहीं है। यह भारत की उस दार्शनिक चेतना के विश्वव्यापी परिचय का दिवस है, जिसने मनुष्य को विभाजन से ऊपर उठकर एकत्व देखने की दृष्टि दी। उस दिन एक युवा संन्यासी के माध्यम से भारत ने विश्व से संवाद किया था,लेकिन बोल रही थी भारत की हजारों वर्षों की मनीषा।शिकागो में भारत ने दुनिया को जीतने का दावा नहीं किया था,उसने दुनिया को जोड़ने वाला अपना दर्शन उसके सामने रख दिया था। यही उस दिन की वास्तविक दिग्विजय थी और यही आज भी भारत की सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति हो सकती है।

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