हे स्वामी, हे सखा, हे बंधु!

हे नील माधव ! हे विश्व के आदि , जगत के कार्य , कर्म और कर्ता! आपको बारम्बार प्रणाम है।  समस्त भूतों में के उत्पन्न होने के एकमात्र कारक हो प्रभु आप सभी आपसे अस्तित्व में आते और आप में ही लीन हो जाते हैं ।  सारे प्राणी शरीर में रहने वाले क्षेत्रज्ञ आत्मा आप ही हो।  उनके आदि अंत आप ही हो वासुदेव ।  तपों के कोष हो सारी तपस्याएँ आप से ही निकली हैं आप ही सनातन यज्ञ हो।  हे समस्त पाप शाप ताप को हरने वाले नारायण मैं अपने अंतिम समय में आपको ही अपने सामने देखना चाहता हूँ ।  

हे जगत सृष्टा! ब्रह्मा, सूर्य, चंद्रमा, धर्म, धाता, यमराज, अग्नि, वायु, कुबेर, रूद्र, काल, पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ  ये सभी आपके ही रूप हैं हे पुरुषोत्तम आप अजन्मा हो चराचर के गुरु और सिरजन हार हो हे।   केशव  आप ही आदित्य हो, आप ही उपेन्द्र हो।   हे परंतप आपने ही बालक के रूप में तीन पगों से पृथ्वी आकाश और पाताल  तीनों लोकों को नापकर उन्हें अपने तेज से आक्रांत कर दिया था।   

हे मधुसूदन प्रलय के समय आपने स्वयं ही सारे भूतों का संहार कर विश्व ब्रम्हांड को अपने में समाहित कर लिया था।  हे कमल नयन हे आनंद के स्रोत मैं आपका आह्वाहन करता हूँ।  हे नारायण, हे नीलांचलपति! आपके स्मरण मात्र से हृदय अनिर्वचनीय आनंद से भर जाता है तो आपके दर्शनोपरांत मिलने वाले आनंद की महिमा कितनी आह्लादकारी होगी !! 

सभी पापों का शमन कर अपनी शरण में लेकर निष्पाप करने वाले त्रिलोकनाथ जिनके होते कोई अनाथ नही हो सकता ऐसे प्रभु को  बारम्बार प्रणाम!! 

हे हृषिकेश आप मुझ समेत सभी प्राणियों को  चंदन सी शीतलता प्रदान करें। 

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