बस्तर में भादो जातरा के दौरान दूर तक फैली पहाड़ियां, साल के पेड़ों से घिरा रास्ता और आबादी से अलग किसी देवस्थान की ओर बढ़ता लोगों का समूह दिखाई देता है। उनके हाथों में पूजा की सामग्री है, साथ में गांव के देवी-देवताओं के प्रतीक, सिरहा, गायता, मांझी और ग्रामीण हैं। यह सामान्य धार्मिक यात्रा नहीं है। यहां केवल पूजा नहीं होगी, बल्कि एक ऐसी परंपरा भी निभाई जाएगी जिसमें देवी-देवताओं से उनके दायित्वों का हिसाब लिया जाता है। यदि किसी देवता ने अपने क्षेत्र की रक्षा नहीं की, गांव को संकट से नहीं बचाया या अपने दायित्व का निर्वहन नहीं किया, तो लोकविश्वास के अनुसार उसे भी जवाब देना पड़ सकता है।

यही बस्तर की उस अनोखी लोक परंपरा का संसार है, जिसे आम बोलचाल में देवी-देवताओं की अदालत कहा जाता है। यह आधुनिक अर्थों में कोई न्यायालय नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक-सामुदायिक परंपरा है, जिसमें देवताओं को भी अपने कर्तव्य के प्रति उत्तरदायी माना जाता है। इस परंपरा का सबसे चर्चित केंद्र मां भंगाराम देवी का जातरा है, लेकिन इसके साथ मांझीनगढ़ की गढ़ मावली और कारीपानी-कुर्सी घाट की मां भंगाराम से जुड़े देव दरबार भी महत्वपूर्ण हैं।

इस वर्ष यह परंपरा 5 सितम्बर शनिवार को मांझीनगढ़ एवं कुर्सीघाट में होगी तथा 12 सितंबर 2026, शनिवार सुरडोंगर भंगाराम देवी के स्थल पर केशकाल में आयोजित होगी, तीनों स्थानों पर आसपास के विस्तृत क्षेत्र के देवी-देवताओं, उनके पुजारियों और ग्रामीण प्रतिनिधियों का जमावड़ा होगा। बस्तर की सांस्कृतिक संरचना को समझने वालों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकविश्वास, सामुदायिक उत्तरदायित्व और पारंपरिक सामाजिक अनुशासन को समझने का अवसर भी है।इस परंपरा की विशेषता यह है कि देवी-देवताओं का न्याय एक ही स्थान पर नहीं होता। लेखक ने स्वयं देखा है, इसके तीन प्रमुख केंद्र हैं।

पहला केंद्र केशकाल घाटी के ऊपर, केशकाल-सुरडोंगर क्षेत्र के निर्जन वन-पहाड़ी क्षेत्र में स्थित मां भंगाराम देवी का स्थल है। यहां भादों की जातरा विशेष महत्व रखती है। शनिवार को सेवा-पूजा के बाद देवी-देवताओं का आगमन होता है और अगले दिन सुबह मां भंगाराम की अदालत लगने की परंपरा बताई गई है।

दूसरा केंद्र बड़े राजपुर क्षेत्र के मांझीनगढ़ में स्थित गढ़ मावली देवी का दरबार है। यहां गढ़ मावली की उपस्थिति में देवी-देवताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई को स्थानीय भाषा में “जांच” कहा जाता है।

तीसरा केंद्र धमतरी जिले के नगरी क्षेत्र में कारीपानी-कुर्सी घाट के बीच स्थित मां भंगाराम देवी का स्थल है। यहां भी शनिवार को ही देवी-देवताओं की “जांच” की परंपरा बताई गई है।

इन तीनों स्थानों की भौगोलिक स्थिति अलग है, लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाली लोक अवधारणा समान है। देवी-देवता केवल पूजा के पात्र नहीं हैं, बल्कि अपने-अपने क्षेत्र और समुदाय के प्रति दायित्व निभाने वाली शक्तियां माने जाते हैं।इस परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका व्यापक क्षेत्रीय स्वरूप है। यह किसी एक गांव का आयोजन नहीं है।

स्थानीय पुजारियों के अनुसार, केशकाल की मां भंगाराम देवी की जातरा में 11 परगना के अंतर्गत आने वाले गांवों के देवी-देवताओं का आगमन होता है। यही कारण है कि जातरा के दौरान एक बड़े भूभाग की लोक आस्था एक स्थान पर दिखाई देती है। 

मांझीनगढ़ में गढ़ मावली देवी के दरबार में 72 गांवों के गढ़ क्षेत्र के देवी-देवता पहुंचते हैं। यह संख्या इस बात का संकेत है कि इस परंपरा का संबंध केवल धार्मिक आस्था से नहीं, बल्कि पारंपरिक क्षेत्रीय और ग्राम व्यवस्था से भी रहा है।वहीं कारीपानी-कुर्सी घाट की मां भंगाराम देवी के दरबार में नगरी क्षेत्र के 16 परगना, ओडिशा राज्य की 7 पाली और बस्तर के 20 कोस क्षेत्र से जुड़े देवी-देवताओं के शामिल होने का उल्लेख मिलता है।

 

यहां “परगना”, “पाली” और “कोस” जैसे शब्द केवल भौगोलिक दूरी बताने वाले शब्द नहीं हैं। इनके भीतर पुराने ग्रामीण-सामुदायिक संगठन की स्मृति भी दिखाई देती है। आधुनिक प्रशासनिक सीमाओं से अलग, लोक समाज ने अपने देवी-देवताओं, ग्रामों और पारंपरिक नेतृत्व के माध्यम से जिन क्षेत्रों को जोड़ा था, उनकी छाप आज भी इन आयोजनों में दिखाई देती है।बस्तर की सांस्कृतिक संरचना में देवी-देवताओं की भूमिका को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां लोक आस्था ग्रामीण और जनजातीय जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। बस्तर जिला प्रशासन भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जनजातीय समुदायों, प्राकृतिक परिवेश और परंपराओं से जुड़ा हुआ बताता है।

आम न्यायालय में आरोपी मनुष्य होता है। उसके खिलाफ आरोप लगाए जाते हैं, साक्ष्य रखे जाते हैं, दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है और कानून के अनुसार फैसला होता है। बस्तर की देव अदालत इससे बिल्कुल अलग सांस्कृतिक व्यवस्था है, लेकिन लोकविश्वास के स्तर पर इसमें जवाबदेही का विचार बेहद महत्वपूर्ण है।यहां मान्यता है कि किसी क्षेत्र का देवी-देवता केवल पूजित शक्ति नहीं है। उसके ऊपर अपने क्षेत्र और उससे जुड़े लोगों की रक्षा का दायित्व भी है। यदि किसी गांव में बार-बार अनिष्ट हो रहा है, बीमारी फैल रही है, प्राकृतिक या सामाजिक संकट आ रहा है या देवी-देवता से जुड़े किसी दायित्व के निर्वहन में कमी मानी जाती है, तो संबंधित देवता की “जांच” की जा सकती है।

इसीलिए इस परंपरा को केवल अंधविश्वास कहकर समाप्त कर देना भी उचित नहीं होगा। इसके भीतर उस समाज की अपनी नैतिक व्यवस्था दिखाई देती है, जिसमें शक्ति के साथ जिम्मेदारी को जोड़ा गया है। जिस देवी या देवता से समुदाय सुरक्षा और कल्याण की अपेक्षा करता है, उसी से उसके कर्तव्य का हिसाब भी मांगता है।लोकवर्णनों के अनुसार, यदि किसी देवी-देवता को दोषी माना जाता है तो दंड के भी अलग-अलग रूप बताए गए हैं। किसी देवता को कुछ समय के लिए पूजा से दूर रखने से लेकर निर्धारित अवधि तक “बंदी” रखने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। कुछ स्थानीय मान्यताओं में अत्यंत कठोर दंड की अवधारणा भी बताई जाती है।

यहां “कारागार” की अवधारणा को आधुनिक जेल के अर्थ में नहीं समझना चाहिए। यह लोकविश्वास की अपनी सांस्कृतिक भाषा है। वर्षभर में किसी गांव या क्षेत्र से संबंधित “रवाना” को निर्धारित स्थान पर रखना और फिर जातरा के दौरान उसकी समीक्षा करना इसी लोकव्यवस्था का हिस्सा बताया जाता है।

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