सनातन धर्म में हरतालिका महाव्रत प्रेम, समर्पण, पवित्रता, पति की प्राप्ति और दीर्घायु, पारिवारिक समरसता तथा शक्ति के अपूर्व सामर्थ्य का महापर्व है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कुटुंब प्रबोधन और सामाजिक समरसता की दृष्टि से इस व्रत की प्रासंगिकता और बढ़ गई है। हरतालिका व्रत हिंदुओं के महान व्रतों में से एक है, जो सर्वाधिक कठिन लक्ष्य प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। फलस्वरूप अंततः सौभाग्यशाली गौरी जी महादेव को प्राप्त कर ही लेती हैं। यह व्रत कुंवारी, विवाहित और एक अन्य दृष्टि से विधवाएं भी रख सकती हैं। वस्तुतः व्रत की पात्र कुमारी कन्याएं और सुहागिन महिलाएं दोनों ही हैं, परंतु एक बार व्रत रखने के उपरांत जीवनपर्यंत इस व्रत को रखने का विधान है। यदि व्रती महिला गंभीर रोग की स्थिति में हो तो उसके स्थान पर दूसरी महिला और उसका पति भी इस व्रत को रख सकते हैं।प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है। इस दिन महिलाएं पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए हरतालिका तीज का निर्जला व्रत रखती हैं। हरतालिका तीज का व्रत सुहागिनें और कुंवारी कन्याएं भी रखती हैं। हिंदू धर्म में हरतालिका तीज का बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरतालिका तीज व्रत रखने से ही मां पार्वती को भगवान शिव पति के रूप में मिले थे। हरतालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने से सुहागिनों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है और कन्याओं के विवाह में आ रही समस्याएं दूर होती हैं। इसके साथ ही इस व्रत के प्रभाव से अच्छा वर भी मिलता है।

हरतालिका तीज व्रत की शुरुआत करने के बाद जीवनभर इस व्रत को रखा जाने का विधान है। परंतु, अगर व्रत रख पाना संभव न हो तो हरतालिका तीज व्रत का उद्यापन जरूर करना चाहिए।हरतालिका तीज एक पावन और भावनात्मक पर्व है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। यह व्रत इस बार 14 सितंबर को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ शिरोधार्य होगा। आज के समय में अनेक पुरुष भी अपनी पत्नियों के साथ यह व्रत रखकर इस पर्व की भावना को और सशक्त बना रहे हैं। यही कारण है कि यह व्रत स्त्री-शक्ति, श्रद्धा और अटूट प्रेम का प्रतीक बन गया है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, विक्रम संवत् 2083, तदनुसार वर्ष 2026 में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की हरतालिका तीज का व्रत 14 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा। उदया तिथि की मान्यता के कारण इस दिन व्रत रखना सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यद्यपि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड के कुछ भागों में परंपरा के अनुसार 13 सितंबर को भी तीज मनाई जाएगी, लेकिन पंचांग के अनुसार उदया तिथि और गणेश चतुर्थी के विशेष संयोग के कारण व्रत के लिए 14 सितंबर का दिन ही सर्वोत्तम है। प्रातःकाल पूजा मुहूर्त सुबह 06:05 बजे से 07:06 बजे तक है। यह सुबह की पूजा के लिए सबसे उत्तम समय है। प्रदोष काल पूजा मुहूर्त सायं 06:28 बजे से रात्रि 08:47 बजे तक है। हरतालिका तीज में प्रदोष काल अर्थात सूर्यास्त के बाद की पूजा का विशेष महत्व होता है। अन्य शुभ मुहूर्तों में ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 04:32 बजे से 05:19 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11:52 बजे से दोपहर 12:41 बजे तक हैं।

हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी का महासंयोग इस वर्ष का सबसे बड़ा और दुर्लभ मणि-कांचन योग है। 12 वर्ष बाद ऐसा महासंयोग बना है, जहां एक ओर सुहागिन महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए निर्जला व्रत रखेंगी, वहीं दूसरी ओर उसी दिन घर-घर में गणपति विराजित होंगे।वर्ष 2026 में हरतालिका तीज (तीजा) के दिन सोमवार का वार होने के साथ-साथ रवि योग, शुक्ल योग, ब्रह्म योग और इंद्र योग का दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग बन रहा है।तीजा में ग्रहों की बेहद मजबूत और दुर्लभ स्थिति भी बन रही है, जो एक अत्यंत दुर्लभ ज्योतिषीय घटना है। गुरु अपनी उच्च राशि कर्क में मौजूद रहेंगे। बुध अपनी स्वराशि कन्या में स्थित होंगे। सूर्य अपनी स्वराशि सिंह में विराजमान रहेंगे। शुक्र अपनी स्वराशि तुला में रहेंगे। चार बड़े ग्रहों का इस तरह अपनी उच्च या स्वराशि में होना जातकों के व्यवसाय, आर्थिक स्थिति और दाम्पत्य जीवन में सुख-समृद्धि लेकर आता है।

हरतालिका व्रत पूजन कथा के पूर्व इसकी पूर्वपीठिका अवश्य जान लेनी चाहिए, ताकि इस व्रत के प्रयोजन का स्पष्टीकरण हो सके। शिव-शक्ति ही अखिल ब्रह्मांड में प्रेम की शाश्वतता के प्रतीक हैं। सती और शिव का अमर प्रेम अर्धनारीश्वर के रूप में प्रेम की पराकाष्ठा का द्योतक है। भावी पीढ़ी के लिए शिव-शक्ति का आदर्श प्रेम मार्गदर्शी है।कृष्ण चतुर्दशी की शिवरात्रि का यह वृत्तांत है, जब भगवान श्रीकृष्ण से राधा जी ने प्रेम के वशीभूत होकर कहा कि विश्व में आपसे बड़ा प्रेमी कोई नहीं हो सकता! तब श्रीकृष्ण ने कहा, "नहीं राधा! इस अखिल ब्रह्मांड में महादेव से बड़ा कोई प्रेमी नहीं हो सकता।" ऐसा कहते हुए श्रीकृष्ण के आंसू निकलने लगे और उन्होंने राधा को बताना प्रारंभ किया।

श्रीकृष्ण ने कहा कि राधा, सब रूप बदल-बदलकर नए रूप लेते रहे, अलग-अलग रूप लेकर रासलीला करते रहे, परंतु महादेव ने कभी अपनी सती (उमा) को नहीं छोड़ा। प्रिय राधा, दक्ष के यहां सती जब अग्नि में प्रविष्ट हुईं, तब महादेव ने उनके उसी शरीर को लिपटाए सदियों विचरण किया और प्रथम एक वर्ष लगातार विलाप किया। वही आंसू रुद्राक्ष बन गए। तब महादेव ने वह रुद्राक्ष की माला पहनी और पूरे शरीर में भी रुद्राक्ष धारण कर लिए।महादेव ने "राख" तक नहीं छोड़ी। पूरे शरीर में राख लपेट ली। वहीं सती के वाहन बाघ (सिंह) ने भी अपने प्राण त्याग दिए थे। तब महादेव ने सती के वाहन का चर्म पहन लिया, जिसे हम बाघाम्बर के नाम से जानते हैं। आज भी महाकाल ने सती की राख को अपने शरीर में लपेट कर रखा है।

महादेव प्रेम की अतल गहराइयों में थे। तब सभी देवताओं ने चिंतित होकर मुझसे प्रार्थना की। तब मैंने (भगवान विष्णु) सुदर्शन चक्र से सती के 52 टुकड़े कर दिए, जो महान शक्तिपीठ बने।महादेव ने उन टुकड़ों से भी सती की हड्डियां निकाल लीं और उनको गले में धारण कर लिया तथा आज भी धारण किए हुए हैं। उसके उपरांत शिव योगी हो गए। प्रयोजन हेतु पार्वती के रूप में सती ने महादेव को पाने के लिए पुनः अवतार लिया। महादेव ने उन्हें तभी स्वीकार किया, जब मैंने विश्वास दिलाया।

उक्त उपाख्यान के तारतम्य में हरतालिका तीज व्रत कथा इस प्रकार है कि एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि उन्हें ऐसा कौन-सा पुण्य मिला, जिससे वे शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकीं। इस पर भगवान शिव ने उन्हें उनकी ही तपस्या की स्मृति दिलाई।माता पार्वती बाल्यकाल से ही शिव जी को अपने मन में पति के रूप में शिरोधार्य कर चुकी थीं और इसी संकल्प के साथ उन्होंने 12 वर्षों तक कठोर तप किया। उन्होंने जंगल में रहकर पेड़ों के पत्ते खाए, अन्न का त्याग किया और हर मौसम की कठिनाइयों को सहा। उनके इस तप को देखकर उनके पिता हिमालय राज चिंतित हो उठे।

उसी समय नारद ऋषि भगवान विष्णु का रिश्ता लेकर आए, जिसे हिमवान (हिमालय राज) ने स्वीकार कर लिया। जब पार्वती जी को यह बताया गया, तो वे अत्यंत दुखी हुईं और अपने मन की बात सखियों से साझा की। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही भगवान शिव को पति के रूप में स्वीकार कर चुकी हैं, इसलिए किसी और से विवाह नहीं करेंगी।यह सुनकर सखियों ने उन्हें चुपचाप ले जाकर एक गुफा में छिपा दिया। वहीं पार्वती जी ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में मिट्टी से शिवलिंग बनाकर शिव जी की आराधना की और रात भर जागरण किया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए और उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। तब से यह व्रत सनातन में प्रचलित हुआ और महिलाओं का कंठहार बना।

पूजा सामग्री के रूप में फल, फूल, कपूर, घी, दीपक, मिठाई, सुपारी, पान, बताशा, कुमकुम, पूजा-कलश, सूखा नारियल, शमी का पत्ता, धतूरा, शहद, गुलाल, पंचामृत, कलावा, इत्र, चंदन, मंजरी, अक्षत, गंगाजल, दूर्वा, जनेऊ, बेलपत्र, वस्त्र और केले के पत्ते का प्रावधान है।हरतालिका तीज में रंगों का भी विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक श्रृंगार करती हैं और शुभ रंगों के वस्त्र धारण करती हैं। लाल रंग देवी पार्वती का प्रिय है, जो प्रेम और शक्ति का प्रतीक है। हरा रंग हरियाली और समृद्धि का संकेत देता है, जबकि गुलाबी रंग सौम्यता और आपसी समझ का प्रतीक माना जाता है। इसके विपरीत, काला, नीला, सफेद और क्रीम रंग वर्जित माने जाते हैं।

ज्योतिषियों के अनुसार, हरतालिका तीज में पूजा करते समय फुलेरा का बड़ा महत्व है। पूजा के दौरान भगवान शिव के ऊपर जलधारा की जगह फुलेरा बांधा जाता है। फुलेरा को पांच तरह के फूलों से बनाया जाता है। फुलेरा में बांधी जाने वाली पांच फूलों की मालाएं भगवान शंकर की पांच पुत्रियों—जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली—का प्रतीक हैं।

हरतालिका तीज की पूजन विधि के अंतर्गत सुहागिन महिलाएं प्रातः शीघ्र उठकर स्नान करें और नए वस्त्र पहनें। तदुपरांत घर के मंदिर या पूजन स्थल में दीप प्रज्वलित करें। सभी देवी-देवताओं को धूप-दीप दिखाएं और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद मां पार्वती, भगवान शिव और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। हरतालिका तीज व्रत कथा का पाठ करें और सभी देवी-देवताओं की आरती उतारें। मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें और अखंड सौभाग्य की कामना करें।

कल्चरल मार्क्सिज्म के शिकार, लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद और रोमियो-जूलियट की असफल प्रेम कहानियों में भटकते हुए न केवल भारत, बल्कि विश्व के स्त्री-पुरुषों को सनातन दृष्टि से प्रेम और विवाह को समझना होगा। तभी प्रेम सफलीभूत होगा। प्रेम यदि दैहिक है तो निश्चित ही असफल होगा, परंतु यदि आध्यात्मिक भी है तो अमर रहेगा। सती और शिव का प्रेम इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।शिव-शक्ति ही अखिल ब्रह्मांड में प्रेम की शाश्वतता के प्रतीक हैं। सती और शिव का अमर प्रेम अर्धनारीश्वर के रूप में विवाह संस्कार में सफलीभूत होता है। भावी पीढ़ी के लिए शिव-शक्ति का आदर्श प्रेम और विवाह मार्गदर्शी है और हरतालिका व्रत उसका साक्षी है।

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