महाराज जनक अयोध्या आए हैं। महाराज दशरथ का आग्रह उनके यहां भोजन करने का था, वह प्रेम में यह आग्रह टाल न सके लेकिन अन्न मसाले, समान जनकपुर का होगा। भोजन जनकनंदिनी के निर्देशन में बना। खाने का समय हो गया, सोने के पत्तल सजा दिए गए हैं, महाराजा दशरथ अपने हाथ से भोजन परोस रहे हैं। जनक जी ने देखा कि भांति भांति के स्वादिष्ट व्यंजन परसे गए हैं, भोजन से जानी पहचानी सुगंध आ रही थी, मन भर आया... सीता मेरी बिटिया तुम्हारी रसोई अक्षय रहे, उन्होंने भगवान को भोग लगाया और जीमना शुरू कर दिया। 

सारे जनकपुर वासी खाने लगे तभी अंदर से महिलाओं की हंसी के स्वर खनक उठे। महारानी कैकेई ने गारी देना शुरू किया, 

सुनु सखी एक अनुपम घटना

अजगुत लागत भारी हे

मिथिलापति हरवाहा हयेन

जेकर जनक दुलारी हे 

महाराजा जनक खाते जा रहे हैं, मुस्कुराते जा रहे हैं, इस बीच कुशध्वज बोल उठे, 

देवियों इसके आगे हम गाए दे रहे हैं,

अवध आए के देखा भाई

अचरज बड़का भारी हे

अवधपति गईया चरवैया

खीर के महिमा न्यारी हे

हो हो हो कर मिथिलावासी हंसने लगे, फिर तो महारानियां शुरू हो गई, मिथिला नगर के पुरखे स्वर्ग में बैठे थे, उनको हिचकी आने लगी। हास परिहास का यह दृश्य देखकर देवता भी सिहाने लगे, आहा कितना मनोरम आनंद लाभ महाराज जनक और अवधपति दशरथ को मिल रहा है।

लखनलाल टोकरे में से पूड़ी निकाल कर बांट रहे थे, यह देख सुनकर वह राम जी के पास गए और बोले, भईया देख रहे हैं ना कैसे हम लोगों को गाय चराने वाला बताया जा रहा है, और तो और माएं भाभी के मायके वालों को हलवाहा कह के हंसी कर रही हैं!

भगवान मुस्कुराए, यह गारी गीत ही नही है लक्ष्मण, यह आने वाले युग का संकेत है। 

अर्थात भईया?

अर्थात तुम हलधर होगे और मैं गईया चराऊंगा।

सच भईया, कितना आनंद आएगा ना!! लक्ष्मण यह सुनकर इतने खुश हुए कि चार चार पूड़ी ज्यादा सबके पत्तल पर रखने लगे। 

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