दशहरा केवल त्योहार या मनोरंजन का उत्सव नहीं है। यह समाज जीवन में उच्चतम आदर्शों की स्थापना के संकल्प का पर्व है। दशहरे के माध्यम से कुशल नेतृत्व, सशक्त सामाजिक संगठन, सात्त्विक मूल्यों की स्थापना और सत्य के आधार पर राष्ट्र निर्माण का संदेश दिया गया है। यह त्योहार मनाने के तरीके और घोष वाक्य "असत्य पर सत्य की विजय" से बहुत स्पष्ट है।दशहरा महापर्व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी को आता है। इससे पहले नौ दिन नवरात्र में शक्ति की उपासना होती है और दसवें दिन अर्थात् दशहरे को शक्ति पूजा के साथ पर्व का समापन होता है।


दशहरा और विजय दशमी : विविधता में एक समान संदेश
इस पर्व के दो नाम हैं। एक दशहरा और दूसरा विजय दशमी। पूरे भारत में मनाए जाने वाले इस पर्व के विभिन्न प्रदेशों में अलग-अलग नाम हैं। कहीं-कहीं तो मनाने के तरीके भी भिन्न हैं, पर सबमें एक बात समान है। वह है शक्ति पूजा की प्रमुखता। दशहरा पर्व के धार्मिक और सांस्कृतिक, दोनों महत्व हैं। नवरात्रि आयोजन के तरीके भी अलग-अलग प्रांतों में अलग हैं। उत्तर और मध्य भारत में नौ दिन माँ दुर्गा की झाँकियाँ सजाई जाती हैं और रामलीला होती है। पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और असम में पूरे नौ दिन दुर्गा पूजा होती है। इन प्रांतों में रामलीला का चलन कम है। दक्षिण भारत में सबसे प्रसिद्ध दशहरा कर्नाटक में मनाया जाता है। 'मैसूर दशहरा' के रूप में यह भारत के बाहर भी प्रसिद्ध है। विदेशी पर्यटक भी इस दिन यह दशहरा देखने आते हैं। यहाँ रामजी की रथयात्रा और शोभायात्रा बहुत प्रसिद्ध है। नवरात्र में गुजरात का गरबा और डांडिया नृत्य भी दुनियाभर में प्रसिद्ध है। अब तो गुजरात की तर्ज पर गरबा और डांडिया देशभर में आयोजित होने लगे हैं। उत्सव मनाने में विविधता होने के बावजूद इस उत्सव का आदर्श वाक्य "असत्य पर सत्य की विजय" सभी प्रदेशों में समान रूप से बोला जाता है। इसे बोलने की भाषा स्थानीय होती है।


दो महायुद्धों की कथा : सत्य की विजय का आधार
इस महापर्व की महत्ता को हम दोनों प्रकार से समझ सकते हैं। पुराण कथाओं से भी और इसे मनाने के तरीके से भी। जिस प्रकार उत्सव के दो नाम दशहरा और विजय दशमी हैं, उसी प्रकार पुराणों में इससे संबंधित कथाएँ भी दो हैं। ये दोनों कथाएँ महासंग्राम की पृष्ठभूमि हैं। एक सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय कथा भगवान राम और रावण के बीच हुए महायुद्ध की है। यह युद्ध नौ दिन चला था और दसवें दिन रामजी को विजय मिली थी। दूसरी कथा माता शक्ति भवानी और महिषासुर के बीच हुए महासंग्राम की है। यह महासंग्राम भी नौ दिन चला और दसवें दिन महिषासुर का अंत हुआ। इन दोनों कथानकों का मूल एक ही है। रावण का राज्य पर आधारित था। रामजी ने संगठन क्षमता और कुशल नेतृत्व से विजय प्राप्त की। महिषासुर भी पूरी सृष्टि से सत्य और धर्म का विनाश करने पर आमादा था। शक्ति भवानी ने उसका अंत कर सृष्टि को सुरक्षित किया। दोनों कथाओं की पृष्ठभूमि नौ दिनों के युद्ध और सत्य की विजय की है। शक्ति भवानी ने सत्य की स्थापना के लिए स्वयं चंडी का रूप लिया और रामजी ने विराट शक्ति का आह्वान किया। नौ दिन के भीषण युद्ध के बाद दसवें दिन विजय मिली। इसलिए केवल एक दिन का विजय स्मृति दिवस के रूप में यह उत्सव आयोजित हो सकता था। किंतु भारतीय ऋषि-मनीषी भविष्य के लिए भी समाज को सचेत रखना चाहते थे। इसीलिए इसमें नवरात्रि जोड़कर पूरे दस दिनों का उत्सव विधान बनाया और नौ दिनों को नवदुर्गा उत्सव के रूप में शक्ति उपासना से जोड़ा।


नवदुर्गा उपासना : शक्ति के नौ आयाम
शक्ति के नौ रूप होते हैं। जैसे शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति, बौद्धिक शक्ति, पारिवारिक शक्ति, आर्थिक शक्ति, सामाजिक शक्ति, संगठनात्मक शक्ति, सामरिक शक्ति और राष्ट्रशक्ति। इनमें कुछ का संबंध स्वास्थ्य से, कुछ का परिवार और समाज से और कुछ का राष्ट्र से होता है। इन नौ दिनों की उपासना में शक्ति के इन सभी आयामों को छुआ गया है।

एकांत पूजन-उपासना, व्रत, साधना और खाद्य पदार्थों के सेवन में शारीरिक शुद्धि, मन की एकाग्रता और बौद्धिक विकास की प्रक्रिया निहित है। नौ दिन की साधना को यदि आयुर्वेद और योग की भाषा में समझें, तो यह कायाकल्प की प्रक्रिया है, जो आरोग्य-वृद्धि और आलौकिक शक्तियों से साक्षात्कार का माध्यम है। आरंभिक साधना एकांत की है, तो प्रतिदिन शाम को भजन-कीर्तन के माध्यम से समाज का एकत्रीकरण होता है, जिसमें सभी समाजजनों की परिवार सहित उपस्थिति होती है। इसमें न तो कोई वर्ग का भेद होता है, न जाति का और न ऊँच-नीच का। यह समाज सशक्तीकरण का संदेश है और दसवें दिन शक्ति और शस्त्र पूजन में सामरिक शक्ति-साधना का संदेश है। इस उत्सव का यह संदेश महिषासुर वध की कथा का है। रामजी की रावण पर विजय का उत्सव मनाने में भी नौ दिन रामलीला होती है और दसवें दिन विजय के प्रतीक के रूप में रावण का पुतला जलाया जाता है। दशहरे के दिन शस्त्र और अश्व पूजन होता है। इन नौ दिनों की दिनचर्या का निर्धारण कुछ ऐसा है, जिससे हम आरोग्य, मानसिक एवं बौद्धिक सामर्थ्य की वृद्धि तथा शारीरिक, संगठनात्मक एवं सामरिक सशक्तीकरण की ओर अग्रसर होते हैं।


महिषासुर और रावण वध का कथासार
महिषासुर का जन्म सृष्टि के आरंभ में हुआ। उसने ब्रह्माजी की भक्ति से असीम शक्ति प्राप्त कर ली और धरती पर अत्याचार करने लगा। उसने देवलोक पर भी अधिकार कर लिया और अत्याचार करने लगा। अंत में देवताओं ने माता शक्ति की प्रार्थना की। माता शक्ति ने नौ दिन युद्ध करके उसका अंत किया।
रामजी का अवतार त्रेता युग में हुआ। वे पिता के वचन का पालन करने के लिए चौदह वर्ष के लिए वनयात्रा पर गए। उनके साथ सीताजी और भ्राता लक्ष्मण भी थे। वहाँ छलपूर्वक रावण ने सीताजी का अपहरण कर लिया। वन में सीताजी की खोज करते हुए रामजी की भेंट हनुमानजी से हुई। हनुमानजी के माध्यम से सुग्रीव से संधि हुई। सेना तैयार हुई। हनुमानजी ने सीताजी का पता लगाया और रावण के भाई विभीषण को रामजी से मित्रता के लिए प्रेरित किया। अंत में नौ दिन युद्ध हुआ और दशमी के दिन रावण का वध हुआ। दोनों युद्ध अलग-अलग कालखंडों में हुए, पर नौ दिन युद्ध चलने और विजय की तिथि एक ही है—अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी। इसीलिए इस दिन दशहरे का आयोजन होता है।


रामजी की लंका पर विजय का संदेश : संगठन और कुशल नेतृत्व
विजय दशमी के लिए सर्वाधिक लोकप्रिय कथा श्रीरामजी की लंका विजय की है। इस कथा का संदेश समझने के लिए हमें उस महायुद्ध के घटनाक्रम को समझना होगा, जिसकी पृष्ठभूमि रामजी और रावण के बीच युद्ध की तैयारी से बनी। न तो रामजी साधारण थे और न रावण। मान्यता है कि रामजी स्वयं भगवान नारायण के अवतार थे और रावण-कुंभकर्ण उनके पार्षद जय और विजय थे, जो ऋषि के श्राप के कारण धरती पर आए। भगवान नारायण के रामजी के रूप में अवतार लेने का एक कारण अपने पार्षद जय और विजय का उद्धार करना भी था। तब क्या जय ने अपने स्वामी को नहीं पहचाना होगा? और क्या रामजी के रूप में भगवान नारायण ने भी अपने पार्षद को नहीं पहचाना? फिर भी युद्ध हुआ। इसीलिए इसे लीला कहा गया—"रामलीला"। लीला अर्थात् अभिनय। यह अभिनय या लीला समाज को शिक्षित करने के लिए थी। इसका संदेश रामजी की युक्ति और पूरी योजना में है।


रावण परम शक्तिशाली था। उस पर शिवजी की कृपा थी, जबकि रामजी के साथ अनुज लक्ष्मण के अतिरिक्त कोई नहीं था। उन्होंने हनुमानजी को जोड़ा। हनुमानजी के माध्यम से सुग्रीव और विभीषण को जोड़कर सेना तैयार की। जब युद्ध आरंभ हुआ, तब यह रणनीति बनी कि कब कौन किससे युद्ध करेगा। कल्पना कीजिए, यदि तंत्र-साधना करते समय मेघनाद पर हमला न किया जाता, तो सफलता मिलती? यदि विभीषण रावण वध का सूत्र न बताता, तो क्या रावण का अंत हो सकता था? रामजी को इस युद्ध अभियान में सफलता उनकी संगठन क्षमता, आंतरिक अनुशासन, सबकी एक राय होने और उचित व्यक्ति को उचित काम देने से मिली। जबकि रावण की असफलता का कारण उसके अपने घर में असहयोग और असंगठन था। ऐन वक्त पर भाई विरुद्ध हो गया। पत्नी भी सहमत नहीं थी। कितने सभासद और अन्य संबंधी अंत तक रावण को युद्ध न करने की सलाह देते रहे।


यह ठीक है कि रावण अनीति पर था। उसने एक ओर माता सीता का अपहरण किया और दूसरी ओर अपनी जिद के लिए सभी बंधु-बांधवों को युद्ध में झोंक दिया। यहाँ प्रश्न उचित और अनुचित पर विचार करने का तो है ही, पर इसके साथ सबको एकता के सूत्र में बाँधकर अभियान में सहभागी बनाने का भी है। सफलता के लिए एकता आवश्यक है। यदि कोई संकट आया है अथवा कोई बड़ा अभियान आरंभ हुआ है, तो सभी स्वजनों का एक स्वर होना चाहिए। सबको सहभागी होना चाहिए। यह संदेश प्रत्येक परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए भी है। जिन परिवारों में मतभेद होते हैं, वे परिवार बहुत ऊँचाई पर नहीं पहुँचते। जिन देशों में समाज शासक के निर्णय का समर्थन नहीं करता, वहाँ सदैव समस्या बनी रहती है। सामान्य स्थिति में मतभेद हों, तो चलता है, लेकिन युद्ध जैसी आपात स्थिति में भी लोग सहयोग न करें, तो राष्ट्र पर संकट घिर आना स्वाभाविक है, जैसा श्रीलंका पर घिर गया था। इसीलिए दशहरे पर केवल रामजी का अथवा शस्त्र पूजन भर नहीं होता, बल्कि पूरे नौ दिन की रामलीला द्वारा प्रत्येक घटनाक्रम के अभिनय के माध्यम से समाज को सिखाने-समझाने का प्रयास किया जाता है।


सफलता के बाद भी सावधानी आवश्यक
महासंग्राम के विवरण से यह तो स्पष्ट है ही कि सफलता के सूत्र क्या हैं। पर इस उत्सव में यह संदेश भी है कि सफलता के बाद सदैव सावधान रहना आवश्यक है। सावधानी हटी कि दुष्टों की सक्रियता बढ़ी। युद्ध चाहे महिषासुर के विरुद्ध हुआ हो अथवा रावण के विरुद्ध, इन महायुद्धों का उद्देश्य सत्ता का विस्तार अथवा संपत्ति का हरण नहीं था। न तो देवी ने महिषासुर का वध करके अपनी सत्ता स्थापित की और न रामजी ने लंका विजय के बाद स्वयं सिंहासन संभाला। युद्ध में विजय के बाद भी रामजी ने लंका में प्रवेश तक नहीं किया था। उन्होंने रावण के भाई विभीषण को ही सिंहासन सौंपा। विभीषण का राजतिलक तो रामजी ने युद्ध आरंभ होने से पहले ही कर दिया था। ये दोनों महासंग्राम सत्य की स्थापना के लिए हुए। दोनों युद्ध मर्यादा का हरण और मानवीय आदर्शों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने के लिए हुए। महिषासुर ने दूसरों के राज्य का हरण किया था और रावण ने भी पहले कुबेर से लंका का राज्य छीना, फिर माता सीता के रूप में सती नारी का अपहरण किया। इसलिए महिषासुर और रावण, दोनों दंड के अधिकारी बने और उन्हें दंडित किया गया।

इन दोनों लीलाओं में एक और बहुत स्पष्ट संदेश है कि सत्य की स्थापना और सफलता के शीर्ष पर पहुँचने के बाद सावधानी आवश्यक है। सत्य की स्थापना के लिए जितनी शक्ति और समझ की आवश्यकता होती है, उतनी ही सत्य की सुरक्षा के लिए भी होती है। देवताओं के असावधान होने के कारण ही महिषासुर प्रबल हुआ और वनक्षेत्र के संकट का आकलन न करने के कारण ही सीताजी का हरण हुआ। समृद्धि जहाँ ठग-लुटेरों को आकर्षित करती है, वहीं व्यक्ति की बढ़ती प्रतिष्ठा ईर्ष्यालुओं को एकत्र कर देती है। इसीलिए सफलता की सुरक्षा के लिए भी प्रतिक्षण सतर्कता की आवश्यकता है।


दशहरा उत्सव का नामकरण : चैतन्य और सक्रिय रहने का संदेश
शक्ति भवानी की जीत स्वयं के भीतर की अलौकिक शक्ति से हुई और रामजी की जीत स्वयं की शक्ति तथा संगठन क्षमता से हुई। ये दोनों विशेषताएँ इस उत्सव के नाम में निहित हैं। सामान्यतः दशहरे नाम को तिथि के दसवें अंक से माना जाता है। यह सही है, पर दशहरे का एक और अर्थ है। "दश" का अर्थ गतिमान रहना, चैतन्य रहना और सक्रिय रहना भी होता है, जबकि "हरे" का आशय नारायण एवं शिव, दोनों से है। "हर" शिवजी को और "हरि" नारायण को कहा गया है। इन दोनों की संधि से शब्द "हरे" बनता है। इसीलिए कीर्तन में प्रभु के नाम के आगे "हरे हरे" का उच्चारण आता है। "हरे" में तीनों गुण और पाँचों तत्व समाए होते हैं। सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीन गुण होते हैं तथा धरती, जल, आकाश, अग्नि और वायु पाँच तत्व माने गए हैं। अब "दशहरे" का आशय हुआ पाँचों तत्वों और तीनों गुणों के अनुरूप कार्य करना। यही प्रभु का काज है। इसके लिए सदैव चैतन्य रहना आवश्यक है। सत्य की रक्षा और धर्म की स्थापना प्रकृति का कार्य है। इसी के लिए ये दोनों युद्ध हुए। इसलिए इस त्योहार का नाम "दशहरा" और "विजय दशमी" रखा गया।

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