लोग इंद्र पूजा की तैयारी कर रहे हैं और तुम यहां यमुना के पानी पर अपनी बांसुरी रख रहे हो कान्हा? दाऊ ने यमुना जल को अपनी बंशी से मापते कृष्ण को देखकर पूछा।

आप भी मेरी सहायता करो ना दाऊ, वह बांस की डंडी देख रहे यमुना में! परसों लगाया था तब से लेकर पचास बांसुरी किनारा जल में डूब गया है। अब भादों की आखिर में प्रचंड बरसात होने वाली है, इस बार यमुना जल का विस्तार ऐसा ही होता रहा तो पानी गोकुल तक पहुंचने में ज्यादा दिन नहीं लगेंगे, कृष्ण बांसुरी को कमर में खोंसते हुए बोले।

हां इस बार तो प्रतिदिन दोनो पहर बारिश हो रही है, पर हर बार की तरह यमुना द्वार पखार कर चली जाएंगी, इसलिए तो हम इंद्र की पूजा कर रहे हैं, दाऊ बोले।

इस बार जल तीन गुना तेजी से बढ़ रहा है, यदि प्रतिदिन ऐसे ही बरसात हुई तो बढ़ने की गति कई गुनी हो जाएगी। बादलों को गति, उनका आकार और रंग देखकर मुझे लगता है ये बादल अगले सात दिन लगातार बरसेंगे। कृष्ण ने बांसुरी से बादलों को दिखाते हुए कहा।

तो इसका अर्थ है कि हमारे घर, खेत और गईयां सब डूब जायेंगे?

लगता तो यही है दाऊ!

फिर क्या किया जाए?

आपके हलधर बनने का समय आ गया है। हल उठाइए और चलिए गोवर्धन पर।

दोनो भाई गोवर्धन के ऊंचे हिस्से पर पहुंच गए, दाऊ को वहां की जगह पर उगे झंखाड को साफ करने और नीचे तक रास्ता बनाने को कह कृष्ण वहां से चले गए। कुछ देर बाद वह नीचे उतरे तब तक दाऊ रास्ता बना चुके थे। भाई का हाथ पकड़ा और ऊपर ले गए जहां कंदराओं के पास विशाल वृक्षों से बंधे बड़े छोटे छप्पर और बल्लियां थीं।

यह क्या है कान्हा?

मेरी इंद्र पूजा! यह उस समय के लिए है जब यमुना का पानी हमारे घरों तक आएगा, बरसात की तेजी से पानी बढ़ेगा और तब गिरिराज जी हमें घर प्रदान करेंगे। 

बरसात तेज होने लगी, दोनो भाई नीचे उतर आए। घर पहुंचे तो देखा मैया फूल और कपड़े सजा रही थी। 

मैया अब इंद्र की पूजा नही, गिरिराज की पूजा का समय आ गया है, वही हमारे रक्षक हैं, पालक हैं, कान्हा बोले।

तू जो मन में आता है कह देता है, तू ही बता पूजा किसकी होनी चाहिए? माता ने रोष भरे स्वर में कहा।

पूजा करनी है तो गौ की करो मैया जिनके दूध पीकर हम में चलने की शक्ति आती है, उन खेतों की गोचर भूमि की करो, जल पिलाने वाली यमुना की करो, बादलों को रोक बरसात कराने वाले गोवर्धन की करो, यह कहकर कान्हा ने भाई का हाथ पकड़ा और अपने सखाओं से मिलने जाने लगे।

इतनी तेज बरसात में कहां जा रहा है? माता ने पुनः डांटा।

इसे जाने दो मैया, मैं तेरे पास रह लूंगा, जब यह तेरे पास रहता तू इसे ही प्यार करती है मुझे नहीं, दाऊ मां से लिपट गए।

यमुना का पानी द्वार तक पहुंच गया, चौखट डूबने लगी, बरसात की बूंदे हरहराने लगीं। आसमान देखकर लगता कि गंगा जी साक्षात उतर रही हों, काले बादल वर्ष भर का पानी एक दिन में गिराने को तत्पर दिख रहे थे। 

कृष्ण जब वापस आए तो नंद के घर गोकुल के सभी सभासद चिंतित बातचीत कर रहे थे। इंद्र की पूजा में आए व्यवधान के कारण उनके कोप से सारा ब्रज डूब रहा है, कृष्ण के अंदर आते ही सबकी निगाहें उन पर थीं। अंदर फर्श डूब गया था, बाहर बरसात रुकने का नाम नहीं ले रही थी। कृष्ण ने दाऊ की तरफ देखा और बोले,

सात दिन का समान बंध गया दाऊ? 

हां कान्हा, बाकी सभी सखाओ ने भी तैयारी कर ली?

हां, अब गौवों को खोल लेते हैं और गिरिराज की तरफ चलते हैं। बाबा आप सब से कहिए कि अपने घर जाएं और दाऊ जो कहें वह करें।

बादलों की गड़गड़ाहट हृदय में कंपन कर रही थी, सांझ रात में बदलने वाली थी, दाऊ ने संकेत किया और सभी गोकुल वासी सामान और गौ लेकर दाऊ के पीछे हो लिए। कृष्ण सारे बालकों के साथ गोवर्धन के कंदराओं वाले उस स्थान पर पहुंचे जहां पर बल्लियां पड़ी थीं। आगे बढ़कर उन्होंने विशाल चट्टान उठाकर अपने बाहुबल का हुंकार किया, कंदाराएं खुल गईं। इसके बाद उन्होंने जब बल्लियां उठाई तो वृक्षों से बंधे छप्पर उठने लगे, लगा गोवर्धन पर्वत कान्हा की उंगली पर आ गया हो। बंशी बजाने वाली उंगलियों पर गिरिराज विराजमान हो गए, सारा गोकुल मूसलाधार बारिश से अब सुरक्षित था। 

इस कर्म के लिए कान्हा ने गिरिराज की कितनी परिक्रमा की थी, बांस, बल्ली, छप्पर, चट्टानों को इकट्ठा करने में सैकड़ों गोवर्धन की पचास से ज्यादा बार प्रदक्षिणा की होगी तब जाकर यह स्थान गोकुलवासियों के लिए अभ्यारण्य का रूप ले पाया होगा। कंदराओं में सामान रख दिए गए, छप्पर के नीचे गौवें आ गईं, सारा गोकुल जल में नही बल्कि गिरधर द्वारा प्रदत्त आनंद में डूब गया। 

सात दिन बरसात होती रही, सात दिन कान्हा की बांसुरी गाती रही, आखिर इंद्र देव शांत हुए, बादल छंट गए, यमुना ने अपने किनारे समेटे, ब्रजवासी गौवों के साथ गिरधारी और गिरिराज की जयकार लगाते नीचे उतरे।

गोवर्धन धारण करें, लीलाधर बृजराज।

मोर मुकुटधर वेणुधर,गिरधर बन गए आज।

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