उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने न कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी देखी, न लोकतंत्र की आधुनिक प्रशासनिक संरचनाएं। उन्होंने न शासन का कोई विधान लिखा, न सत्ता का कोई शास्त्र। फिर भी उन्होंने उस भारत को पढ़ लिया था, जिसके लिए हर शासन का अस्तित्व सार्थक होता है। वह भारत खेतों की मेड़ों पर पसीना बोता था, चौपालों पर न्याय की राह देखता था, अपनी बेटियों के सपनों को चिंता की ओढ़नी में संभालता था, बच्चों की शिक्षा के लिए अभावों से जूझता था और टूटती परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान का दीप बुझने नहीं देता था। प्रेमचंद ने उसी भारत को शब्द नहीं दिए, उसे स्वर दिया।

इसीलिए प्रेमचंद किसी सत्ता के लेखक नहीं, समाज की अंतरात्मा के कथाकार थे। वे किसी विचारधारा के प्रवक्ता नहीं, मनुष्यता के प्रहरी थे। उनके लिए सुशासन का अर्थ राजमहलों की भव्यता नहीं, बल्कि किसान के चेहरे की संतुष्टि, श्रमिक के श्रम का सम्मान, नारी की निर्भय गरिमा और उस बालक की मुस्कान थी, जिसकी प्रतिभा गरीबी की दीवारों से टकराकर लौट न जाए।

यदि इसी मानवीय कसौटी पर आज के भारत को देखें, तो उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में लोककल्याण, न्याय, सुरक्षा, शिक्षा और अंत्योदय केंद्रित शासन व्यवस्था मुंशी प्रेमचंद की उसी संवेदनशील दृष्टि की स्मृति जगाते हैं। यह समानता व्यक्ति की नहीं, दृष्टि की है। सत्ता की नहीं, संवेदना की है और विचारधारा की नहीं, लोकमंगल के उस शाश्वत भाव की है, जिसे प्रेमचंद ने अपने साहित्य में अमर कर दिया।

प्रेमचंद के साहित्य में न्याय केवल न्यायालयों का विषय नहीं, समाज की आत्मा है। पंच परमेश्वर में वे बताते हैं कि न्याय तब जन्म लेता है, जब व्यक्ति अपने निजी आग्रहों से ऊपर उठकर सत्य के पक्ष में खड़ा होता है। यही कारण है कि किसी भी शासन की सबसे बड़ी पहचान केवल उसकी योजनाएं नहीं होतीं, बल्कि यह होती है कि क्या कानून वास्तव में सबके लिए समान है। उत्तर प्रदेश में कानून के राज, संगठित अपराध और माफिया के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा नागरिक सुरक्षा पर दिया गया बल इसी व्यापक प्रश्न को समकालीन संदर्भ देता है कि भयमुक्त समाज ही न्यायपूर्ण समाज की पहली शर्त है।

प्रेमचंद का किसान केवल अन्नदाता नहीं, भारतीय सभ्यता का आधार है। होरी के माध्यम से उन्होंने उस किसान की पीड़ा लिखी, जो विपन्न है, पर परिश्रम नहीं छोड़ता। जो अभावों से घिरा है, पर अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होता। आज जब सिंचाई, कृषि अवसंरचना, किसानों के हितों और ग्रामीण विकास को उत्तर प्रदेश शासन की प्राथमिकताओं में स्थान मिलता है, तब यह केवल आर्थिक नीति नहीं रह जाती, यह उस भारत के प्रति उत्तरदायित्व का संकेत बन जाती है, जिसकी आत्मा को प्रेमचंद ने अपने साहित्य में अमर कर दिया।

यदि प्रेमचंद के समूचे साहित्य में कोई स्वर सबसे अधिक करुण, सबसे अधिक दृढ़ और सबसे अधिक नैतिक है, तो वह भारतीय नारी का स्वर है। उनकी स्त्रियां दया की पात्र नहीं हैं, वे संघर्ष की प्रतिमूर्ति हैं। धनिया, निर्मला, सुमन, झुनिया ये केवल पात्र नहीं, भारतीय समाज के अंतःकरण की आवाज़ें हैं। 

प्रेमचंद का सबसे बड़ा आग्रह यही था कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक उन्नति का आकलन उसके महलों से नहीं, उसकी महिलाओं की गरिमा से होना चाहिए। वे जानते थे कि जिस समाज में स्त्री भय, अन्याय और असमानता के बीच जीने को विवश हो, वहां विकास का कोई भी दावा अधूरा है।

इसी दृष्टि से यदि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हुए परिवर्तनों को देखा जाए, तो नारी सुरक्षा, सम्मान, शिक्षा, स्वावलंबन और सहभागिता शासन की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरकर सामने आती हैं। मिशन शक्ति जैसे व्यापक जन-अभियान से लेकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष पुलिस तंत्र, महिला हेल्प डेस्क, एंटी-रोमियो स्क्वॉड, महिला बीट व्यवस्था, पिंक पेट्रोलिंग, महिला पुलिस की बढ़ती भागीदारी, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण तथा सरकारी सेवाओं में महिलाओं के बढ़ते अवसर, ये सभी प्रयास इस विचार को पुष्ट करते हैं कि नारी केवल संरक्षण की नहीं, नेतृत्व और सहभागिता की भी अधिकारी है।

प्रेमचंद ने निर्मला में उस समाज की त्रासदी लिखी थी, जहां स्त्री की इच्छा से अधिक सामाजिक रूढ़ियां निर्णायक थीं। आज जब उत्तर प्रदेश में बालिकाओं की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सार्वजनिक जीवन में उनकी सक्रिय भागीदारी में ऐतिहासिक बढ़ोत्तरी हो रही है, तो यह केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक अन्याय को कम करने का प्रयास भी प्रतीत होता है, जिसकी पीड़ा प्रेमचंद ने एक शताब्दी पूर्व शब्दों में ढाली थी।

गोदान की धनिया भारतीय नारी की अदम्य शक्ति का प्रतीक है। वह टूटते हुए परिवार को संभालती है, संकट में निर्णय लेती है और विपन्नता के बीच भी आत्मसम्मान का दीप बुझने नहीं देती। आज उत्तर प्रदेश की करोड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों, उद्यमिता, शिक्षा, स्थानीय नेतृत्व और आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रही हैं, उसमें धनिया का वही अदृश्य साहस आधुनिक रूप में दिखाई देता है।

प्रेमचंद शिक्षा को केवल अक्षरज्ञान नहीं मानते थे। उनके लिए शिक्षा वह प्रकाश थी, जो मनुष्य को भाग्य के भरोसे रहने के बजाय अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करना सिखाती है।

इस नजरिए से देखें तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में शिक्षा को केवल भवनों और पाठ्यक्रमों तक सीमित न रखकर गुणवत्ता, पारदर्शिता और अवसर से जोड़ा गया है। 

नए विश्वविद्यालयों एवं मेडिकल कॉलेजों की स्थापना, डिजिटल शिक्षा, कौशल विकास और रोजगारोन्मुख शिक्षण के साथ निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित कर रहे हैं, जहां प्रतिभा को उसके परिश्रम का न्याय मिल सके। यही शिक्षा को केवल डिग्री का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बनाता है।

उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक परीक्षाओं में पारदर्शिता, नकल और पेपर लीक के विरुद्ध कठोर व्यवस्था तथा योग्यता-आधारित चयन की स्थापना केवल प्रशासनिक सुधार नहीं है, यह उस युवा के स्वाभिमान की रक्षा है, जिसकी प्रतिभा को छल से पराजित नहीं होने देना चाहिए।

प्रेमचंद ने महाजनी सभ्यता में चेताया था कि जब समाज मनुष्य से अधिक धन का सम्मान करने लगे, तब असंतुलन जन्म लेता है। उनका विरोध समृद्धि से नहीं था, उनका आग्रह यह था कि विकास का केंद्र मनुष्य बना रहे। आज जब उत्तर प्रदेश तीव्र आर्थिक विकास, औद्योगिक निवेश, आधुनिक अवसंरचना और तकनीकी परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब भी यह प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या इस विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है। यदि विकास के साथ अंत्योदय जुड़ता है, तभी प्रगति पूर्ण होती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सार्वजनिक जीवन भी बार-बार इसी अंतिम व्यक्ति के उत्थान के प्रति समर्पित दिखाई देता है...गरीब को आवास, किसान को सम्मान, युवाओं को अवसर, महिलाओं को सुरक्षा, अपराधमुक्त समाज, पारदर्शी व्यवस्था और विकास का लाभ गांव तक पहुंचाने का संकल्प।

आज जब योगी सरकार की हर नीति, हर निर्णय और हर व्यवस्था में अंत्योदय का संकल्प श्वास लेता दिखाई पड़ रहा है तो योगी राज में मुंशी प्रेमचंद की आत्मा मुस्कुराती हुई प्रतीत होती है।

यदि प्रेमचंद आज होते, तो वे निश्चित ही योगी के उत्तर प्रदेश के किसी गांव की उस बेटी की कहानी लिखते, जो निर्भय होकर विद्यालय जा रही है। उस छात्र की कथा लिखते, जिसकी प्रतिभा निष्पक्ष परीक्षा के कारण अपना उचित स्थान प्राप्त कर सकी। उस किसान की पीड़ा और संतोष दोनों को शब्द देते, जिसकी मेहनत को सम्मान मिला। उस महिला का संघर्ष लिखते, जिसने स्वयं सहायता समूह के माध्यम से आत्मनिर्भर होकर अपने परिवार का भविष्य बदल दिया और उस मां की आंखों का वह विश्वास रचते, जिसे लगता है कि उसके बच्चों का कल अब अभाव नहीं, अवसर तय करेगा। क्योंकि प्रेमचंद के लिए शासन की सबसे बड़ी सफलता आंकड़ों में नहीं, साधारण मनुष्य के जीवन में दिखाई देने वाला परिवर्तन थी।

यही वह धरातल है, जहां मुंशी प्रेमचंद की मानवीय चेतना और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोककल्याण-केंद्रित शासन-दृष्टि एक-दूसरे का मौन अभिवादन करती हुई प्रतीत होती हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में अंत्योदय, सुशासन, न्याय, सुरक्षा, पारदर्शिता और विकास को जिस प्रकार अंतिम व्यक्ति के जीवन से जोड़ने का सतत प्रयास दिखाई देता है, वह इस विश्वास को और सुदृढ़ करता है कि शासन की वास्तविक सफलता नीतियों की घोषणा में नहीं, बल्कि साधारण नागरिक के जीवन में आए परिवर्तन में निहित होती है। 

इसी कारण प्रेमचंद की दृष्टि और योगी आदित्यनाथ का सुशासन एक ही मानवीय सत्य की ओर संकेत करते दिखाई देते हैं कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके सबसे अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर खिली वह मुस्कान होती है, जिसमें न्याय का विश्वास, अवसर का आत्मविश्वास और भविष्य की आशा एक साथ दिखाई देती है।