देवांशु झा

पिछले चार दिनों से जंतर-मंतर के सैकड़ों आक्रामक वीडियोज़ और गंदी गालियों से भरे पोस्टर्स देखते हुए मेरे मन में यह विचार बार-बार आया कि इसे छात्रों का आंदोलन कहने वाले कितने मासूम हैं। विशेषकर वहां मौजूद कम-उम्र लड़कियों की यौनिकता और यौन कुंठा से भरे उद्गार सुनकर मैं सोचने को विवश हुआ कि ये लड़कियां बेहतर शिक्षा व्यवस्था चाहती हैं? ये नीट का पर्चा लीक होने से बहुत दुखी भी हैं! इसी दुख में ये शिक्षा मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक की मां बहन कर रही हैं ! इन्हें देखकर पहला प्रश्न जो मेरे मन में आता है, वह यह है कि ऐसी गंदी-गंदी गालियां देकर कौन सी शिक्षा व्यवस्था सुधारी जा सकती है? देश के प्रधानमंत्री किसी भी तरह से ऐसी गालियों के अधिकारी नहीं हो सकते परन्तु इन लड़कियों ने साबित किया कि कोई रेखा नहीं होती। प्रश्न यह भी है कि घर में कोई ऊंच-नीच हो जाने पर या मतभेद होने पर ये आधुनिक दीदियां अपने मां-बाप भाई-बहन को भी ऐसी ही गालियां देती हैं या गालियां केवल मोदी विरोध के लिए सुरक्षित रखती हैं। कहना आवश्यक नहीं है कि ये ब्रेन वाश्ड हैं। इनका इस्तेमाल किया गया है। ये ग्रूम की गईं हैं। समय की प्रतीक्षा की गई और इन्हें मैदान में उतार दिया गया।

यह बात भी समझी जा सकती है कि दीदियां स्क्रीन पर स्टार बन चुकी हैं तो अपने घर में भी देखी जा रही होंगी। ओटीटी प्लैटफॉर्म पर ऐसी ही गालियां दी जाती हैं। इन दीदियों ने जंतर-मंतर को अपना प्लैटफॉर्म बनाया। इन दीदियों को गाली देते हुए देखकर घर वालों की प्रतिक्रिया क्या होती होगी, हम नहीं जानते। हो सकता है पापा की परियां हों। प्रधानमंत्री की मां-बहन कर गईं तो क्या हुआ? इट इज कूल..। कहने का अधिकार है। बस यही जिज्ञासा रह गई है कि कोठेवालियों जैसी भाषा छोटी-छोटी लड़कियों की जबान पर कैसे चढ़ गई? मौसम फिल्म का एक दृश्य याद आता है। बुजुर्ग संजीव कुमार अचानक एक लड़की से टकराते हैं। वह नहीं जानते कि लड़की उनकी ही बेटी है। संजीव कुमार हतप्रभ होकर उसका चेहरा देखते हैं। तभी वह गालियां बकती है। वह कहते हैं-इतनी गंदी ज़बान! जंतर-मंतर की जबान के सामने उस जबान को गंदा कहना ठीक नहीं होगा। वह तो बेहतर थी। इस जबान ने हैरान किया है। 

जंतर-मंतर वाली दीदियों का सामान्य ज्ञान असाधारण है। दीदियां प्रचंड संस्कारी भी हैं। रामायण से लेकर भगवान राम और राममंदिर तक को फक-फुकाती चलती हैं। दीदियों को डाॅक्टर बनना है शायद। पर डाक्टर बनने से पहले ही वे इस पीढ़ी को गालियों का इंजेक्शन दे रही हैं। अचूक इलाज। इस जंतर-मंतर पर संपूर्ण क्रांति के लिए जुटी दीदियां अपनी अभिव्यक्ति में रचनात्मक हैं। उनके हाथों में जो तख्तियां, पोस्टर हैं उन पर यौन व्यापार से उपजे माॅडर्न सभ्यता के फूल खिले हैं। वे फूल चुनने आई हैं। फूल बरसा रही हैं। आग से दहकते फूल। वैसे तो क्रोध प्रकट करने के अनेक तरीके हो सकते थे। तख्तियों और पोस्टरों पर शब्द बदले जा सकते थे परन्तु दीदियां इन गालियों से सुख पाती हैं। फक-फुकाती भाषा की बात ही और है। 

दीदियों में से अधिकांश को नीट का फुल फॉर्म तक नहीं पता। कुछ दद्दा तो उनसे भी आगे हैं। उन्हें देखकर ही यह अनुभव हो जाता है कि वे टाॅपर हैं। ऐसे अनेक दद्दा दद्दी वहां भटकते हुए मिले जो गाली देने में नंबर-वन थे पर ग्रेजुएशन का हिज्जे नहीं लगा पाते थे। ये सभी गंभीर दद्दे दद्दी हैं। अत्यंत मेधावी, मेहनती। इन्हें रोजगार चाहिए, इस्तीफा चाहिए, मोदीजी की मां-बहन करने का अधिकार चाहिए, उमर खालिद की रिहाई चाहिए, कश्मीर चाहिए, ले के रहेंगे वाली आजादी चाहिए। और बहुत कुछ चाहिए।

इन दद्दियों के चिंघाड़ते स्वरों को सुनकर हमारे देश के कई स्वनामधन्य महानुभाव दहक उठे। नसीरुद्दीन शाह,सलमान भाई, जावेद अख्तर जी, शबाना आजमी जी, दीप्ति नवल जी, बादशाह खान जी, तैमूर के बाबूजी, उनकी अम्मा जी, यहजी वहजी, सोशल मीडिया पर छाए रहने वाले कवि-लेखक जी। सबकी छाती से दूध टपकने लगा। बच्चे.. प्यारे-प्यारे बच्चे। जाहिल सरकार इनका गला घोंट रही है! आओ मेरे बच्चे! बच्चों के साथ ज्यादती न करो! होश में आओ! जाहिल हो! देश को जाहिल बनाना चाहते हो? 

शाह ने गुल खिलाया। गुल गुलशन.. गुलफाम हंसा। दद्दा दीदी को बल मिला। वे दुगनी रफ्तार और गर्मी से गालियां उगलने लगे। आज से बीस-पच्चीस बरस पहले अठारह बीस साल की लड़कियों के मुंह से गालियां सुनना हमारे लिए हैरतअंगेज घटना होती थी अब यह न्यूज चैनल के स्क्रीन पर घड़ी-घड़ी उभरने वाले ब्रेकिंग न्यूज की तरह हो गया है। देखने वाली बात यह है कि दीदियों ने पोस्टर्स  पर इंग्लिश स्टाइल में गालियां लिखी थीं लेकिन बोलने के लिए एकदम देसी स्टाइल का चुनाव किया। जननांगों का उच्चारण करते हुए यह ध्यान रखा कि वर्ण-वर्ण उद्घाटित हो। एकदम साफ स्पष्ट। चीख चीखकर। ध्यान से जिह्वा उलटते हुए लवणेन को लौड़ेन कहा। 

जंतर-मंतर पर नए भारत का उदय हुआ। वो सुबह कभी तो आएगी! आ गई.. छप्परफाड़ गालियों की गगरी छलक उठी। दीदियां उठतीं बैठतीं, हंसती गाती, नाचती शोर करती हुई बल्ल बल्ल गालियां उगलती रहीं। हमारे समाज में कई बार शुभ अवसरों पर स्त्रियां गाली देती थीं। परन्तु उन गालियों में मर्यादा होती।‌ हंसी ठिठोली से युक्त वे गालियां रस वर्षा करतीं। अब दीदियां महान प्रदर्शन के शुभ अवसर पर मुंह से आग बरसा रही हैं। दीदियां गुस्से में हैं। छूटते ही मां-बहन कर डालती हैं। दीदियों को शिक्षा व्यवस्था में स्थान मिलना चाहिए। इन दिनों साहित्य और सिनेमा में भी गालियों की प्रधानता है। गाली और सेक्स दिखलाने से सबकुछ रियल लगता है। दीदियां सीख रही हैं। जंतर-मंतर पर भी सबकुछ रियल लगना चाहिए। वे क्रोध में हैं तो प्रधानमंत्री से लेकर आपके हमारे आराध्यों को गाली नहीं दे सकतीं? अरे भाई, मौलिक अधिकार भी तो कोई चीज है! व्हाय शुड बाॅयज़ हैव आल द फन?

अंत में: ये भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं! यह भारत की आम बेटियों और बहनों की भाषा नहीं है। यह केवल इतना ही बताता है कि भारत के कुंठित विपक्ष और जिहादियों ने इस अवसर को भुनाया है। उनके भीतर जितना मवाद भरा था सब बाहर निकाल रहे। ये मूर्ख लड़कियां उनका मोहरा बन रही हैं।