कॉकरोच जेन-ज़ी नहीं हैं और जेन-ज़ी कॉकरोच नहीं है।साथ ही एक बात लिखकर रख लें ये गालीबाज भारत की जेन -ज़ी का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते।पिछले 50 दिनों से देश को एक सस्ता, अश्लील और शोरगुल भरा तमाशा दिखाया गया।कुछ लोग जंतर-मंतर पहुँचे।उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गालियाँ दीं।उन्होंने भारतीय सेना का अपमान किया।

उन्होंने हिन्दू देवी देवताओं को गालियां दी, यहाँ तक कि देश को भी गालियां दीं....उन्होंने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया।उन्होंने अराजकता को आंदोलन का नाम दिया।

और फिर सोशल मीडिया ने घोषणा कर दी—

"यही है भारत की जेन-ज़ी!"

मैं पूछता हूँ—

क्या कुछ हज़ार लोगों की भीड़, जिसमें ख़तरनाक अपराधी भी सम्मिलित हैँ, देश के करोड़ो युवाओं का प्रतिनिधित्व कर सकती है? क्या एक माइक, कुछ कैमरे, कुछ बैरिकेड और नाली से निकली भाषा किसी पीढ़ी की पहचान बन सकती है?

नहीं। हज़ार बार नहीं।क्योंकि जब कैमरे गाली-गलौज का प्रसारण कर रहे थे, तब भारत की असली जेन-ज़ी इतिहास रच रही थी।जब कुछ लोग नारे लगा रहे थे, तब कुछ युवा तिरंगा ऊँचा उठा रहे थे।जब कुछ लोग तोड़फोड़ कर रहे थे, तब कुछ लोग भारत का नाम दुनिया के मंच पर स्वर्ण अक्षरों में लिख रहे थे।

ग्लासगो में भारतीय युवाओं ने पदकों की बारिश कर दी।

किसी ने स्वर्ण जीता।

किसी ने रजत जीता।

किसी ने कांस्य जीता।

उन्होंने भारत को शर्मिंदा नहीं किया।उन्होंने भारत को गौरवान्वित किया।उन्होंने गालियाँ नहीं दीं।उन्होंने राष्ट्रगान के साथ तिरंगे को सलामी दी।उनकी आँखों में घृणा नहीं थी।उनकी आँखों में गर्व के आँसू थे।फिर आया अंतरराष्ट्रीय गणित ओलंपियाड।

भारत के युवा दुनिया के सबसे कठिन प्रश्नों को हल कर रहे थे।कोई स्वर्ण जीत रहा था।कोई रजत जीत रहा था।कोई अपने दिमाग की शक्ति से भारत का परचम लहरा रहा था।न कोई अभद्रता।न कोई अश्लीलता।न कोई अराजकता।सिर्फ़ परिश्रम।सिर्फ़ अनुशासन।सिर्फ़ उत्कृष्टताऔर सिर्फ़ भारत माता के प्रति समर्पण।

फिर शतरंज को देखिए—

गुकेश।

प्रज्ञानानंदा।

वैशाली।

दिव्या देशमुख।

ये युवा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों को चुनौती दे रहे हैं।

खेलों में देखिए—

नीरज चोपड़ा।

लक्ष्य सेन।

अंतिम पंघाल।

पलक गुलिया।

अस्मिता डे 

अरुंधति चौधरी 

साक्षी चौधरी 

ये भारत के सपनों को अपने कंधों पर लेकर चल रहे हैं।

और खेलों से भी आगे देखिए—

भारत के युवा उपग्रह बना रहे हैं।एआई विकसित कर रहे हैं।रोबोटिक्स में क्रांति ला रहे हैं।रक्षा तकनीक को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा रहे हैं।स्पेस स्टार्टअप खड़े कर रहे हैं।सेमीकंडक्टर बना रहे हैं।वे भविष्य गढ़ रहे हैं।

वे उन समस्याओं को हल कर रहे हैं जिनका नाम तक अराजकता फैलाने वाले लोग ठीक से नहीं बोल सकते।यही है भारत की जेन-ज़ी।यह पीढ़ी आलसी नहीं है।यह पीढ़ी दिशाहीन नहीं है।यह पीढ़ी सांस्कृतिक रूप से खोखली नहीं है।यह पीढ़ी बौद्धिक रूप से दीवालिया नहीं है।यह पीढ़ी महत्वाकांक्षी है।यह पीढ़ी प्रतिभाशाली है।यह पीढ़ी तकनीकी रूप से दक्ष है।यह पीढ़ी विश्व मंच पर भारत का भविष्य लिख रही है।

इसलिए मैं देशवासियों से कहता हूँ—

कुछ उपद्रवियों के कारण पूरी पीढ़ी का अपमान मत कीजिए।कुछ कैमरों की सुर्खियों को भारत के युवाओं की पहचान मत बनने दीजिए।जो राष्ट्र का अपमान करते हैं, वे राष्ट्र की आवाज़ नहीं हैं।जो सेना का अपमान करते हैं, वे युवाओं के प्रतिनिधि नहीं हैं।जो अराजकता फैलाते हैं, वे भविष्य के निर्माता नहीं हैं।

भारत का भविष्य वे युवा हैं—जो प्रयोगशालाओं में हैं।जो खेल के मैदानों में हैं।जो पुस्तकालयों में हैं।जो स्टार्टअप बना रहे हैं।जो सीमाओं की रक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं।जो तिरंगे को ऊँचा रखने के लिए दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं।भारत के सामने युवाओं की समस्या नहीं है।भारत के सामने समस्या यह है कि कैमरे बार-बार नाली की ओर मुड़ जाते हैं।

कैमरे शोर दिखाते हैं।लेकिन राष्ट्र निर्माण की तपस्या नहीं दिखाते।कैमरे अराजकता दिखाते हैं।लेकिन उपलब्धियाँ नहीं दिखाते।कैमरे गाली दिखाते हैं।लेकिन गौरव नहीं दिखाते।और इसी कारण एक झूठा भ्रम पैदा हो जाता है कि शोर ही सच है।

लेकिन याद रखिए— शोर कभी इतिहास नहीं बनाता।इतिहास वे बनाते हैं जो मेहनत करते हैं।

जो अनुशासन में विश्वास रखते हैं।जो अपने राष्ट्र को स्वयं से ऊपर रखते हैं।और आज भारत की करोड़ों जेन-ज़ी युवा उसी इतिहास को लिख रहे हैं।वे सितारों तक पहुँच रहे हैं।वे दुनिया जीत रहे हैं।वे भारत का भविष्य गढ़ रहे हैं।

और वही हैं — भारत की असली जेन-ज़ी।हाँ मैं समर्थक हूँ इस जेन-ज़ी का। अब इस देश की सज्जन शक्ति को एकजुट होकर राष्ट्र की असली ज़ेन- जी को पहचान देने का काम करना पड़ेगा। सकारात्मक काम कर रहे युवाओं को सोशल मीडिया पर प्रस्तुत करिए। भले वे स्वयं प्रचार-प्रसार से दूर रहते हों किंतु हमारा दायित्व है कि हम उनको इस सोशल मीडिया की दुनिया में प्रचारित-प्रसारित करें, तभी ज़ेन- जी की असली परिभाषा भारत को समझ आएगी।

गालियां देने वालों से बड़े दोषी इन गालियों को समर्थन देने वाले हैं।धिक्कार है तथाकथित ज़ेन ज़ी के इन दादा, चाचा,ताऊ, बड़े भाई, बड़ी बहनों को जो मोदी विरोध में अंधे होकर अपनी ही संतानों को गलत काम के लिए प्रोत्साहित कर रहे।संस्कारित पीढ़ी तैयार करने के लिए हजारों लोग अपना जीवन होम कर रहे हैं और तुम अपनी मानसिक गंदगी भारत पर थोपकर पूरी पीढ़ी को गलत मार्ग पर धकेल रहे।शर्म करो रे !

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
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