माननीय श्री एकनाथ रानडे जी का नाम लेते ही स्वामी विवेकानन्दजी सहज याद आते हैं, और जब स्वामी विवेकानन्द की बात होती है तो आँखों के सामने उभरता है कन्याकुमारी स्थित, भव्य विवेकानन्द शिलास्मारक का दृश्य। ऐसा क्यों? इसका उत्तर है, स्वामीजी, एकनाथजी और विवेकानन्द शिलास्मारक तीनों का ध्येय एक है। तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, तीनों की भव्यता एक ही ध्येय की पूर्ति के लिए प्रेरित करती है-‘मनुष्य निर्माण और राष्ट्र पुनरुत्थान’। एकनाथजी ने स्वामीजी के विचारों को समाज जीवन में चरितार्थ करने के लिए पूरा जीवन खपा दिया। एक कुशल संगठक के रूप में उनकी योजनाएं, गतिविधियां, अध्ययन, सम्पर्क और सभी प्रकार के प्रयत्न उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समर्पित था।

 “एक जीवन-एक ध्येय” के सन्देश को निज जीवन में साकार करनेवाले माननीय एकनाथजी का जन्म 19 नवम्बर, 1914 को विदर्भ के अमरावती जिले के एक छोटे से गांव टिमटाला में हुआ। उनके पिताजी का नाम रामकृष्ण राव तथा माताजी का नाम रमाबाई था। वे अपने माता-पिता की आठवीं संतान थे। इस कारण उनकी तुलना देवकी-वसुदेव के पुत्र भगवान श्रीकृष्ण से की जाती थी। माननीय एकनाथजी पर उनके जीजाजी आण्णाजी सोहनी का बहुत प्रभाव रहा। एकनाथजी के पिताजी रेलवे कर्मचारी थे। उस नौकरी में पुराने समय में वेतन बहुत ही कम हुआ करता था तथा इनका परिवार भी बहुत बड़ा था। अत: परिवार का खर्चा चलाने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता था। अत: उनके बड़े भाई ने उच्च शिक्षा का विचार छोड़ नौकरी करने का निर्णय किया।

वर्ष 1920 में जब माननीय एकनाथजी की आयु केवल छह वर्ष थी तब वे अपनी माताजी के साथ नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में एक प्रदर्शनी देखने गए थे। उसमें उन्होंने देखा कि लोकमान्य तिलक के चार हाथ (हिन्दू पौराणिक कथाओं में देव शक्ति का प्रतीक)  हैं। बाल सुलभ उत्सुकता से एकनाथ ने अपनी माँ से पूछा कि लोकमान्य तिलक की चार भुजाएं क्यों दिखाई जा रही हैं? तब, “माँ ने कहा, उनमें अद्भुत क्षमता थी तथा उन्होंने भारतीय जनमानस में आशा जगायी है।” तब एकनाथ ने पूछा, “तो क्या वे भगवान हैं?” माँ ने कहा, “नहीं बेटा, वे अपने जैसे ही मनुष्य हैं।” माँ के इस उत्तर से एकनाथजी की शंका का समाधान नहीं हुआ। अतः उन्होंने फिर कहा कि यदि वे ह भगवान नहीं है तो फिर उनके चार हाथ कैसे हैं? तब उनकी माँ ने कहा, “उन्होंने स्वयं के स्तर को इतना ऊपर उठाया कि वे एक महान व्यक्ति बने।” बालक एकनाथ बडे़ गौर से माँ की बात सुन रहा था। लोकमान्य तिलक का प्रभाव उसके बाल मन पर पैठ गया तथा इनके जैसे ही मैं अपना जीवन विकसित करूँगा, यह संकल्प उस बाल मन ने लिया।     

एकनाथजी नागपुर में अपनी बड़ी बहन तथा जीजाजी के साथ रहते थे। उनके जीजाजी अण्णाजी सोहोनी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के अनुयायी थे। वर्ष 1926 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थानीय संघ शाखा में एकनाथजी प्रतिदिन जाने लगे। संघ की विचारधारा का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा। इस सन्दर्भ में एकनाथजी ने स्वयं कहा है कि, “यदि मैं संघ के साथ न जुड़ा होता तो मैं या तो उत्तम पहलवान होता या मराठी साहित्य का लेखक होता। परन्तु मेरे जीवन को संघ ने आकार दिया तथा आज मैं जो हूँ वह उसी के कारण ही।” 

अन्य परिवारों की भांति एकनाथजी को भी घर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ने के कारण डांट पड़ी थी, विशेषकर उनके बड़े भाई इसका विरोध करते थे परन्तु दूसरी ओर उनकी बड़ी बहन व जीजाजी उन्हें संघकार्य के लिए प्रोत्साहित करते थे। सन 1932 में नागपुर के न्यू इंग्लिश स्कूल से मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद नागपुर के ही हिस्लॉप कॉलेज में उन्होंने प्रवेश लिया तथा उसी समय उन्होंने संघ प्रचारक बनने की इच्छा प्रकट की। तब डॉ. हेडगेवार ने उन्हें पहले स्नातक पूरा करने की सलाह दी। इस कारण उन्होंने अपनी पढ़ार्इ जारी रखी तथा दर्शन शास्त्र में उन्होंने स्नातक किया। महाविद्यालयीन जीवन में एकनाथजी संघ कार्य में बहुत सक्रिय थे। उनका शरीर सुगठित था तथा शारीरिक श्रम करने की उनमें क्षमता थी। इन्हीं दिनों उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के साहित्य को पढ़ना प्रारम्भ कर दिया था। स्वामीजी के विचारों से वे अत्यधिक प्रभावित हुए। राष्ट्र-निर्माण एवं मातृभूमि के प्रति स्वामीजी की वचनबद्धता से वे अत्यन्त प्रभावित हुए। इस तरह के साहित्य पढ़कर एकनाथजी एक परिपक्व व बुद्धिमान व्यक्ति के रूप में उभरकर आए। उनके विचारों एवं उनके जीवन-मूल्यों में स्पष्टता आने लगी थी। भावी जीवन में जो कार्य करना था उसको नियति एक आकार दे रही थी।

मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यक्रम के दौरान परम पूज्य श्रीगुरुजी ने कहा कि, ‘तुम मेरी बात को भले ही भूल जाओ, पर एकनाथ ने जो कहा है उसको सदैव स्मरण रखना।’  इससे अधिक गौरवपूर्ण बात एक युवा के लिए क्या हो सकती है। इन्हीं दिनों एकनाथजी ने लोकमान्य तिलक द्वारा लिखित ‘गीता रहस्य’ नामक ग्रंथ को पढ़ना प्रारम्भ किया, उपनिषदों का अभ्यास भी प्रारम्भ किया। इन ग्रंथों के कारण उनकी बौद्धिक क्षमता और अधिक विकसित हुई। एकनाथजी स्नातक होते ही जैसे अन्य घरों में उन लड़कों के विवाह की बात चलती है वैसे ही एकनाथजी के घर पर चली तथा उन पर विवाह हेतु दबाव भी बढ़ने लगा परन्तु एकनाथजी का ध्येय निश्चित था। अतः उन्होंने अपने अविवाहित रहने के प्रण से घरवालों को अवगत कराया तथा कहा कि मैंने पहले से ही ‘हेडगेवार व्रत’ अपना लिया है। इसका अर्थ उनके बड़े भाई को पता था अत: उन्होंने इसे मजाक में लिया परन्तु एकनाथजी अडिग रहे और उनका मत परिवर्तन कोई भी नहीं कर पाया।

वर्ष 1938 में एकनाथजी संघ के प्रचारक 

वर्ष 1938 में एकनाथजी संघ के प्रचारक बन गए। उन्हें महाकौशल प्रान्त में प्रचारक के रूप में भेजा गया। उस समय 'गुंडा अधिनियम' अस्तित्व में था, उस सम्बन्ध में हमें ज्ञान होना चाहिए  यह सोचकर उन्होंने कानून की पढ़ाई प्रारम्भ की। वर्ष 1945 में वे विधि स्नातक हुए। इसी दौरान उन्हें महाकौशल तथा मध्य भारत के प्रचारक का दायित्व दिया गया। इस नियुक्ति के पश्चात उन्होंने विविध भागों में कार्य का विस्तार करना प्रारम्भ किया। संगठनात्मक कार्य का उनका नियोजन बहुत अच्छा था तथा कार्य के लिए योग्य व्यक्ति का चयन करने का काम वे बड़ी सावधानीपूर्वक करते थे और कार्यकर्ताओं को जो दायित्व दिया गया है उस सम्बन्ध में वे उन्हें प्रशिक्षण देते थे। इस अभियान के अन्तर्गत सागर विश्वविद्यालय के परिसर में बड़ी सभा का आयोजन किया गया उसमें 2500 से अधिक स्वयंसेवक उपस्थित थे। उस समय हमें स्वतन्त्रता प्राप्त हो चुकी थी। इस कारण चारों ओर उत्साह का वातावरण था। इसका लाभ उठाते हुए एकनाथजी ने विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हुए अपना कार्य दोगुनी गति से आगे बढ़ाया।

इसी समय 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, यह हत्या हालांकि नाथुराम गोडसे ने अकेले ही किया था परन्तु तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के संघ कार्य को इसके लिए जिम्मेदार मानकर उस पर पाबंदी लगा दी। इस कारण हजारों स्वयंसेवकों को पकड़ लिया गया। उसी समय एकनाथजी इन्दौर में थे तथा जबलपुर जाने ही वाले थे परन्तु उन्होंने अपने कार्यक्रम में परिवर्तन किया तथा वे नागपुर चले गए। नागपुर में स्थिति और गम्भीर थी। नागपुर में जगह-जगह पुलिस थी तथा वातावरण अधिकाधिक गम्भीर होता जा रहा था। समाज-कंटकों के एक समूह द्वारा श्रीगुरुजी पर हमला करने की योजना बनाई जा रही थी। बड़ी चतुराई से एकनाथजी पुलिस के जाल से बचते हुए उस घर की छत पर चढ़कर उस कक्ष में पहुँच गए जहाँ श्रीगुरुजी का निवास था। उन्होंने श्रीगुरुजी से वहाँ से चले जाने का अनुरोध किया लेकिन श्रीगुरुजी ने ऐसा करने से मना कर दिया। उनका सन्देश था, “सभी प्रकार के उकसावे के बावजूद भी आप लोग शान्त रहेंगे और एकत्रित रहेंगे।” श्रीगुरुजी के इस आदेश प्राप्त होने ही एकनाथजी अपने गन्तव्य के लिए रवाना हुए। श्री गुरुजी अपनी सायंकालीन पूजा-अर्चना में व्यस्त हो गए। इसके तुरन्त बाद पुलिस आयी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

संघ पर बंदी आने के पश्चात एकनाथजी सहित हजारों कार्यकर्ता भूमिगत हो गए। उस समय लगभग अस्सी हजार स्वयंसेवकों को कैद किया गया था परन्तु जो पकड़े नहीं गए थे उन्हें पकड़ने के लिए अत्यन्त प्रभावी ढंग से तानाबाना बुना जा रहा था। उसमें एकनाथजी का नाम भी शामिल था। कुछ समय पश्चात वातावरण सामान्य होने लगा तथा संघ के प्रति लोगों का मानस सहानुभूतिपूर्ण रहा। उस समय एकनाथजी ने प्रसिद्ध उद्योपति श्री जी.डी. बिड़ला से सम्पर्क कर प्रभावशाली नेता सरदार वल्लभभाई पटेल से भेंट करने की योजना बनार्इ। सरदार पटेल से भेंट के दौरान एकनाथजी ने बहुत चतुरता से वल्लभभाई पटेल को अपने अनुकूल बना लिया। सरदार पटेल ने कहा कि आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संविधान बनाकर उसकी एक प्रति मुझे दे दीजिए। बहुत ही कम समय में एकनाथजी ने संघ के अन्य वरिष्ठ सदस्यों के परामर्श कर एक लिखित संविधान तैयार किया और उसे गृह मंत्री को सौंप दिया। सरदार पटेल को आश्वस्त होने में देर नहीं लगी और फिर संघ पर से प्रतिबंध हटा लिया गया। सरदार पटेल को यह टिप्पणी करते हुए सुना गया था, “लोग मुझे लौह पुरुष कहते हैं, पर आप तो एक स्टील मैन (फौलादी पुरुष) हैं।” 

एकनाथजी के स्वभाव की यह विशेषता थी कि हाथ में लिया हुआ हर कार्य को वे  पूरा करते ही थे, भले ही उन्हें हजारों समस्याओं का सामना क्यों न करना पड़े! जिस समय संघ पर प्रतिबंध था उस समय एकनाथजी गुप्तचर विभाग के मुख्य अधिकारी श्री बी. एन. मलिक से मिलने गए। यह बात सन 1948 की है। श्री मलिक के निवास स्थान पर पुलिस का सख्त पहरा था परन्तु एकनाथजी बेधड़क मलिकजी के घर गए तथा उनसे भेंट की। एकनाथजी ने श्री मलिक से कहा कि ‘संघ के कार्यकर्ता और अन्य सामान्यजनों के साथ आपका जो व्यवहार है वह बिल्कुल ठीक नहीं है।’ उस समय मलिकजी बोले- ‘क्या आपको मालूम है कि मैं अभी ही आपको गिरफ्तार कर सकता हूँ।’ इतनी बात सुनने के बाद भी एकनाथजी ने अपनी बात रखते हुए, उनका मन परिवर्तन करने के अपने प्रयास को भी जारी रखा। नियत कार्य पूरा होने के बाद वे उनके निवास स्थान से बाहर आ गए।

सन 1960 के समय एकनाथजी पर विविध जिम्मेदारियां थीं तथा उनकी कार्यक्षमता को देखते हुए उन्हें बंगाल एवं असम प्रान्त का दायित्व दिया गया था। वहाँ वे क्षेत्र प्रचारक के रूप में गए थे। उनके कार्य का एक भाग होने के कारण वे बार-बार असम प्रान्त में जाते थे। उस समय श्री रामसिंहजी असम के प्रान्त प्रचारक थे। रामसिंहजी की सहायता से ही एकनाथजी ने असम प्रान्त में संघ कार्य का दृढ़ीकरण किया। विभाजन के पश्चात पश्चिम बंगाल में निर्वासित नागरिकों के लिए वास्तुहारा सहायता समिति शुरू कर अनेक सेवाकार्य प्रारम्भ किए।

वर्ष 1954 से 1960 के कालखण्ड में सिन्दी तथा इन्दौर की बैठकों में प्रस्तावों के अनुसार संघ के संगठनात्मक ढांचे में श्रीगुरुजी ने कुछ परिवर्तन किये, इस समय सरकार्यवाह का दायित्व एकनाथजी पर सौंपा गया। पूर्व से सरकार्यवाह भैयाजी दाणी ने अपने पारिवारिक कारणों के चलते अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। अतः वह दायित्व एकनाथजी पर आ गया। सन 1962 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बौद्धिक प्रमुख का दायित्व सौंपा गया। यह वह समय था जब चीन ने भारत के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया था। इस युद्ध में अपनी हार होने के कारण राष्ट्र के आत्मविश्वास को गहरी ठेस पहुँची थी तथा जनता का मनोधैर्य भी टूट चुका था। राष्ट्र में फिर उत्साह जगे, इस हेतु संघ ने अनेक उपक्रमों को प्रारम्भ किया था। संयोगवश इसी समय स्वामी विवेकानन्द की जन्म शताब्दी थी। राष्ट्र का आत्मविश्वास जगाने तथा स्वामीजी के तेजस्वी विचारों का प्रभाव लोगों के मानस पटल पर स्थापित करने के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। अतः स्वामीजी के साहित्य, उनके व्याख्यान आदि का संकलन कर उसे पुस्तक रूप में प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया तथा यह कार्य एकनाथजी को सौंपा गया। स्वामीजी का जीवन व उनके कार्य का गहराई से अध्ययन करने हेतु वे स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित रामकृष्ण मठ के बेलुड़ आश्रम पहुँचे। एकनाथजी के अथक परिश्रम से ‘दी राउजिंग कॉल टू हिन्दू नेशन’ नामक पुस्तक का प्रकाशन हुआ। यह पुस्तक अंग्रेजी भाषा में थी। यह पुस्तक वास्तव में एकनाथजी के आध्यात्मिक गुरु के रूप में स्वामी विवेकानन्द को अर्पित की गई आदरांजलि थी।

सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्वामीजी के जन्म शताब्दी के कारण बहुत से कार्यक्रम चल रहे थे। उसी समय मद्रास प्रान्त के प्रान्त प्रचारक श्री दत्ताजी डिडोलकरजी ने यह प्रस्ताव रखा कि जिस स्थान पर तप करने से स्वामीजी को आत्मसाक्षात्कार हुआ, उसी शिला पर उनका एक स्मारक बनाया जाए। इस आशय का प्रस्ताव भी रखा गया। परन्तु तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री हुमायूं कबीर एवं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री श्री भक्तवत्सलम् ने शिला स्मारक हेतु अनुमति देने से मना कर दिया तथा केरल के अल्पसंख्यक समुदाय ने भी इस स्मारक का विरोध किया। इन सब समस्याओं का निराकरण किस प्रकार किया जाए? इस हेतु श्री गुरुजी के समक्ष एक आपातकालीन बैठक बुलार्इ गई। इस बैठक में एकनाथजी को यह दायित्व सौंपा जाए, ऐसी विनती श्री गुरुजी से की गर्इ। श्री गुरुजी ने इस सम्बन्ध में एकनाथजी से चर्चा की। तब एकनाथजी ने गुरुजी से कुछ समय मांगा क्योंकि वे चाहते थे कि इसका पूरा अध्ययन किये बगैर निर्णय लेना उचित नहीं रहेगा; क्योंकि यदि स्वामीजी का स्मारक बनाना है तो विवेकानन्द के विचार प्रतिबिम्बित होने चाहिए तथा उनकी भारतवर्ष के के सम्बन्ध में जो संकल्पना थी उसका जीवन्त उदाहरण प्रत्यक्ष रूप से, स्मारक के माध्यम से दिखना चाहिए। ऐसी इच्छा प्रकट कर एकनाथजी ने श्री गुरुजी का आशीर्वाद प्राप्त किया। संघ के दायित्व से उन्हें मुक्त कर दिया। यहीं से एकनाथजी की महत्त्वपूर्ण यात्रा प्रारम्भ हुई।

इस तरह माननीय एकनाथजी के जीवन कार्य को तीन भागों में समझा जा सकता है। जन्म से लेकर अर्थात वर्ष 1914 से वर्ष 1938 तक उनका प्रारम्भिक काल। यह समय उन्होंने अपने परिवार के साथ व्यतीत किया था। दूसरा काल खण्ड है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ उनका सम्बन्ध तथा प्रचारक के रूप में व्यतीत किया गया महत्त्वपूर्ण समय अर्थात सन 1938 से सन 1963 तक। उनके जीवन का अन्तिम तथा महत्त्वपूर्ण समय सन 1963 से वर्ष 1982 तक का है। स्वामीजी के साहित्य का गहन चिन्तन और मनन करने के पश्चात उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र पुनरुत्थान हेतु समर्पित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। इस कार्य हेतु उन्हें तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी गोळवलकर से आज्ञा प्राप्त थी। उन्होंने कन्याकुमारी स्थित शिलास्मारक निर्माण एवं विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना कर देश के कोने-कोने में स्वामीजी का सन्देश पहुँचाने का निश्चय किया तथा उसी के अनुसार अपना जीवन व्यतीत किया।

एक जीवन-एक ध्येय

स्वामी विवेकानन्दजी ने कहा था, “मस्तिष्क को उच्च विचारों से, उच्च आदर्शों से भर दो। उन्हें दिन-रात अपने सामने रखो और तब उसमें से महान् कार्य निष्पन्न होगा।...उस आदर्श के बारे में हम अधिक से अधिक श्रवण करें ताकि वह हमारे अन्तःकरण में, हमारे मस्तिष्क में, हमारे रगों में समा जाए। यहां तक कि रक्त की प्रत्येक बूंद में चैतन्य भर दें और शरीर के प्रत्येक रोम में समा जाए। हम हर क्षण उसी का चिन्तन करें। अन्तःकरण की परिपूर्णता में से ही वाणी मुखरित होती है और अन्तःकरण की परिपूर्णता के पश्चात् ही हाथ भी कार्य करते हैं।”  स्वामीजी के इस विचार एकनाथजी ने मानों अपने जीवन का अंग ही बना लिया था।

विवेकानन्द शिला स्मारक के निर्माण का दायित्व जब उनके कंधे था, वे उसकी पूर्ति के लिए दिन-रात लगे रहते, उसी का स्वप्न वे देखते। अपने एक मित्र डॉ. सुजीत धर के साथ जब वे एक शाम कन्याकुमारी के समुद्र तट पर टहल रहे थे, तब उन्होंने उनसे पूछा, “सुजीत, तुम्हें वहां क्या दिखाई दे रहा है?”

सुजीत धर ने बताया, “मुझे सामने शिला खंड दिखाई दे रहा है।” तब एकनाथजी ने कहा कि, “मुझे इस सागर के मध्य शिला पर भव्य स्मारक दिखाई दे रहा है।”

एकनाथजी यह बात उस समय बोल रहे थे, जब शिला स्मारक के निर्माण को लेकर देश में अनुकूल परिस्थिति नहीं थी। एक तरफ जहां भारत-चीन के युद्ध में भारत को पराजय का मुख देखना पड़ा था, वहीं दूसरी ओर देश में अकाल की स्थिति थी। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू राजनीतिक मज़बूरी के चलते विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण को लेकर स्पष्ट नहीं थे। केन्द्रीय सांस्कृतिक मंत्री हुमायूं कबीर प्राकृतिक सुन्दरता के लिए स्मारक के निर्माण को सही नहीं बता रहे थे। वहीं ईसाई समुदाय के दबाव में तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम ने यहां तक कह दिया कि, “मेरे जीते जी कन्याकुमारी में विवेकानन्द शिलास्मारक कभी नहीं बनेगा।”

एकनाथजी हर समस्या के मूल में जाकर उसके समाधान का विचार करते थे, यह उनके स्वभाव की विशेषता थी। वे विपरीत परिस्थितियों के आगे कभी नहीं झुकते थे, वरन हर चुनौती को अवसर के रूप में परिणत करने में वे प्रवीण थे। राजनीतिक परिस्थिति को स्मारक निर्माण के लिए अनुकूल बनाने के लिए उन्होंने 323 सांसदों के हस्ताक्षर मात्र 3 दिनों में प्राप्त कर उसे प्रधानमंत्री के कार्यालय पर पहुंचा दिया और स्पष्ट किया कि विवेकानन्द शिला स्मारक के निर्माण के लिए सभी राजनीतिक दल और सांसदों का समर्थन प्राप्त है। इसलिए स्मारक के निर्माण के लिए त्वरित अनुमति देना चाहिए। एकनाथजी के इस कुशलता का परिणाम ही था कि स्मारक के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। उन्होंने स्मारक के निर्माण के लिए उस अकाल के समय 1 और 2 रुपये का कूपन बनाकर देशभर के सामान्य जनता से लगभग 85 लाख का धन संग्रह किया। देश के सभी राज्यों मुख्यमंत्री, सभी राजनीतिक दलों के सांसदों से सहयोग राशि ली। विरोधियों को भी अपना सहयोगी बनाने में एकनाथजी माहिर थे। एकनाथजी के कठोर परिश्रम, कुशल योजना, प्रखर नेतृत्व और संगठन कौशल से केवल 6 वर्षों में सागर के मध्य भव्य शिला स्मारक का निर्माण हुआ। श्री एकनाथजी रानडे एक कुशल संगठक के साथ ही कार्य को समयबद्ध और परफेक्शन से पूर्ण करनेवाले व्यक्तित्व के रूप में जाने जाते हैं।

लक्ष्य के अनुरूप निर्माण 

स्वामी विवेकानन्द ने बिखरी हुई आध्यात्मिक शक्तियों को संगठित करने के लिए ‘ॐ’ के मंदिर की स्थापना की कल्पना की थी। इसलिए एकनाथजी ने विवेकानन्द शिला स्मारक के तल पर ‘ॐ’ का मन्दिर बनाया। शिला स्मारक में स्वामीजी की प्रतिमा का आकर, स्वरूप और धातु को लेकर भी वे बहुत स्पष्ट थे। उनका कहना था कि स्वामीजी ने भले ही इस शिला पर ध्यान किया था, लेकिन इस स्थान पर स्वामीजी की ऐसी मूर्ति स्थापित हो जो देशवासियों को उदात्त कार्य के लिए प्रेरित करती हो। अतः उन्होंने स्वामी विवेकानन्द की खड़ी प्रतिमा वहां स्थापित की जो कार्य सिद्धि के लिए तत्परता का आह्वान की दृष्टि प्रदान करती है।

कार्यकर्ता की खोज 

मात्र शिला स्मारक के निर्माण से ही लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता। एकनाथजी कभी एक कार्य को पूरा करके संतुष्ट नहीं होते थे। उनके मन में विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण के साथ ही स्वामी विवेकानन्द के स्वप्न के अनुरूप कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओं के निर्माण की भी योजना थी। एकनाथजी ने इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए 7 जनवरी, 1972 को विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना की। इसका मुख्य कार्यालय कन्याकुमारी के विवेकानन्दपुरम् में है। आज देशभर में 1332 शाखाएं हैं। विवेकानन्द केन्द्र की कार्यपद्धति केन्द्र वर्ग, योग वर्ग, संस्कार वर्ग और स्वाध्याय वर्ग के माध्यम से बालकों, युवाओं और बड़ों में समाज के प्रति कर्तव्य बोध को जागृत किया जाता है।

विवेकानन्द केन्द्र ने ‘विवेकानन्द केन्द्र विद्यालय (वीकेवी)  के माध्यम से शिक्षा जगत में आदर्श स्थापित किया है। आज अरुणाचल में 42,  असम में 28, नागालैंड में 1, अंदमान-निकोबार में 11, तमिलनाडु में 2 और कर्नाटक में 1 ऐसे कुल 85 विद्यालय हैं। स्वामी विवेकानन्द के सन्देश को विश्व पटल पर रखने और उन संदेशों से वैश्विक हित के लिए चिन्तन की दृष्टि से एकनाथजी ने विवेकानन्द इंटरनैशनल फाउन्डेशन की कल्पना रखी थी। वर्ष 2009 में इस फाउंडेशन की स्थापना नई दिल्ली स्थित चाणक्यपुरी में की गई। विवेकानन्द केन्द्र इंस्टीट्यूट ऑफ कल्चर (गुवाहाटी), अरूण ज्योति प्रकल्प, विवेकानन्द केन्द्र प्रशिक्षण एवं सेवा प्रकल्प पिंपळद (नासिक), प्राकृतिक संसाधन विकास प्रकल्प (नारडेप) कन्याकुमारी, वैदिक विजन फाउंडेशन (कोडंगलूर), प्रकाशन, हॉस्पिटल्स आदि अनेक प्रकल्पों के माध्यम से केन्द्र शिक्षा, संस्कृति, सेवा, संस्कार, धर्म तथा राष्ट्रीय चेतना का अलख जगा रहा है।

स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि, “मेरा विश्वास आधुनिक पीढ़ी में है, युवा पीढ़ी में है। इसी में से मेरे कार्यकर्ता निकालेंगे, जो सिंह की तरह हर समस्या का समाधान कर देंगे।” स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, - “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। आवश्यकता है दृ वीर्यवान, तेजस्वी, दृढ़ विश्वासी और निष्कपट नवयुवकों की। बाकी सब अपने आप हो जाएगा।” उन्होंने कहा था, “सिंह के पुरुष से युक्त, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा से सम्पन्न, पवित्रता की भावना से उद्दीप्त सहस्रों नर-नारी, देश के एक कोने से दूसरे कोने में जाकर सामाजिक समरसता, बंधुता और मुक्ति का सन्देश देंगे।”

‘स्वामीजी के सपनों के युवाओं’ की खोज में एकनाथजी हमेशा लगे रहते थे। कार्यकर्ता की खोज में वे बेहद सकारात्मक दृष्टि रखते थे। वे कहते थे कि, “हमारी दृष्टि में समाज में दो ही तरह के लोग हैं, 1) जो कार्यकर्ता हैं और 2) जो कार्यकर्ता होनेवाले हैं।” वे कहा करते थे, “हम समाज को दो आँखों से देखते हैं, समाज हमें हजार आँखों से देखता है।” उनका कहना था कि स्वामी विवेकानन्द पर मात्र श्रद्धा रखने से काम नहीं चलेगा, वरन स्वामीजी के द्वारा रखे गए महान लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपना जीवन का हर क्षण न्योछावर करना होगा। वे देश के युवाओं से जब भी मिलते तो उनको आहवान करते थे कि स्वामीजी के स्वप्न के युवा बनों, राष्ट्र पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन उत्सर्ग कर दो। एकनाथजी के आह्वान से अनेक युवाओं ने अपना करियर, नौकरी और प्राप्त डिग्री के महत्त्व को एक ओर रखकर अपना जीवन ‘जीवनव्रती’ के रूप में विवेकानन्द केन्द्र को समर्पित कर दिया। आज भी सैकड़ों जीवनव्रती, हजारों कार्यकर्ता के कार्य और लाखों शुभचिंतकों के सहयोग से विवेकानन्द केन्द्र अनेक सेवा प्रकल्पों से सामाजिक पुनरुत्थान की दिशा में कार्यरत हैं।

विवेकानन्द केन्द्र के जीवनव्रती कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए एकनाथजी ने अति महत्वपूर्ण सन्देश सूत्र रूप में दिए। उनके व्याख्यान ‘आत्मविकास की ओर’ और ‘सेवा ही साधना’ में संकलित है। पुस्तक में एकनाथजी द्वारा प्रतिपादित विचारों के कुछ सूत्र रूप सन्देश इस प्रकार हैं :-

असाधारण योग्यता सम्पन्न, सक्षम एवं संकल्पवान कार्यकर्ता ही संगठन के आदर्श को मूर्त रूप दे सकते हैं। आन्तरिक सिद्धान्त या विचार कितना ही महान और श्रेष्ठ क्यों न हो, संगठन के बिना वह साकार नहीं हो सकता।
“समय और ऊर्जा” का संयोजन ही जीवन है।


‘एक जीवन-एक ध्येय’, यही हमारा आदर्श होना चाहिए। जीवन में कई आकर्षक वस्तुएं हैं, परन्तु यदि वे हमारे लक्ष्य की प्राप्ति के अनुकूल नहीं है तो हमें उसका परित्याग करना होगा, फिर वो चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हों?
जब “जीवन ध्येय” का बोध हो जाता है, तभी सच्चा जीवन आरम्भ होता है। यदि लक्ष्य निर्धारित है तो हमारी यात्रा उद्देश्यपूर्ण होती है अन्यथा वह एक निरर्थक, अनुपयोगी और महत्वहीन भटकाव है।हमें अपने आचरण और व्यवहार में से उन खामियों को दूर करना चाहिए जो दूसरों को चुभती हैं और उन्हें हमसे दूर रखती हैं। किसी कार्य में सफलता, उसमें लगाई गई ऊर्जा के अनुपात में ही मिलती है और यह इस बात पर निर्भर है कि व्यक्ति इस कार्य में अपना समय कितना लगाता है।


अपना कर्तव्य पूरे उत्साह, उमंग और दृढ़ता के साथ करो तथा सफलता से फूलो मत और असफलता से टूटो मत।
“संघर्ष विहीन समाज” यह भारत का विश्व के लिए अनुपम उपहार होगा। विवेकानन्द केन्द्र ने माननीय एकनाथजी की जीवनी, उनके कार्यों तथा उनके द्वारा दिए गए व्याख्यानों तथा संकलित साहित्य का प्रकाशन अनेक भाषाओं में किया है। इस क्रम में एकनाथजी द्वारा संकलित पुस्तक “हे हिन्दू राष्ट्र! उत्तिष्ठत!! जाग्रत!!”, कथा शिलास्मारक की, एकनाथजी (माननीय निवेदिता दीदी द्वारा लिखित), आत्मविकास की ओर, सेवा ही साधना आदि साहित्य उल्लेखनीय है। आइए, हम एकनाथजी के जीवन-कार्य तथा विचारों का अध्ययन करें तथा राष्ट्र पुनरुत्थान के इस महान यज्ञ में अपना योगदान दें।

सन्दर्भ साहित्य :

1) एकनाथजी - निवेदिता रघुनाथ भिड़े

2) आत्मविकास की ओर (एकनाथजी के व्याख्यानों का संग्रह) – सम्पादक – निवेदिता रघुनाथ भिड़े

3) सेवा ही साधना - एकनाथ रानडे

4) कथा शिला स्मारक की- एकनाथ रानडे

5) एकनाथजी का प्रबंध कौशल, लेखक – प्रो. सुभाष वामन भावे 

 

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