भारतीय समाज पुरातन काल से ही विविध संस्कृतियों को साथ लेकर आगे बढ़ता रहा है। भारतीय समाज विश्व का एकमात्र ऐसा समाज है, जहाँ मान्यता के अनुसार कहीं जाती है कि 33 कोटी देवी देवताओं की पूजा अर्चना की जाती है। अनेक भाषाएँ और बोलियां है , अनेक जातियाँ हैं, लेकिन इन सबके बीच एक सूत्र है, जो सभी अपनाते हैं, वह है —परिवार व्यवस्था।

हिंदू समाज ही दुनिया का एकमात्र समाज है, जहाँ परिवार केवल नियम-कानूनों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, संवाद, आत्मीयता, संस्कार और ‘हम’ की भावना के साथ चलता है। मैंने इसलिए ऐसा कहा, क्योंकि विदेशों में परिवारों को बनाए रखने के लिए भी कानूनों का सहारा लेना पड़ता है, लेकिन हिंदू समाज के पारिवारिक मूल्य इतने लचीले हैं कि वे स्वयं ही आत्मसात कर लिए जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए परिवार का प्रत्येक सदस्य सहयोग और समर्पण करता है। समय के साथ परिवर्तन भी निश्चित है और इसका प्रभाव भारतीय परिवारों पर भी देखने को मिल रहा है। संयुक्त परिवार विघटित होने की दिशा में हैं। एकल परिवारों की संख्या बढ़ रही है और परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित होते जा रहे हैं। भौतिकवादी विचारधारा इस तरह हावी हो रही है कि हम केवल संसाधन जुटाने की दौड़ में लग गए हैं। परिवार और सदस्यों के संबंध मजबूत करने के बजाय हम धन जुटाने के गुणा-भाग में लगे हुए हैं। ‘परिवार बड़ा हो’ की जगह ‘मकान बड़ा हो’ का विचार हावी होता जा रहा है।

 अकेलेपन और संस्कारों की कमी के कारण

इसका परिणाम यह है कि बच्चे और युवा अकेलेपन और संस्कारों की कमी के कारण अपनी दिशा खोते जा रहे हैं। हिंदू समाज के जीवन-मूल्यों से हटकर बच्चे और युवाओं में स्वार्थ, आक्रामकता, भौतिक सुख और आभासी दुनिया में रमने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। छोटी-छोटी बातों पर उन्हें क्रोध आता है और कई बार वे हत्या तथा आत्महत्या जैसे घातक कदम भी उठा लेते हैं। अभिभावक कहते हैं—क्या करें, समय ही बुरा है। बच्चे हमारी सुनते नहीं। लेकिन क्या यह सच है? नहीं, बिल्कुल नहीं। इसके लिए कहीं न कहीं हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं। हम खुद इस बात के साक्षी है कि बचपन में हमारे परिवारों में हमें बड़ों की बात का पालन करना होता था। ऐसा नहीं था कि वह थोपा जाता था  बल्कि हमें बचपन से सिखाया जाता था कि बड़े अनुभवी है और इसलिए जो कहते हैं, वह सही है। 

उस समय परिवार में एकजुटता थी, तब उसी वातावरण में बच्चों का प्रबोधन भी सहज रूप से हो जाता था। बड़े-बुजुर्गों, माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के बीच आत्मीयता और सम्मान की भावना, बच्चों को भी विवेकशील और सहनशील बनाता था। यह बात सदैव कही जाती रही है कि जो देखेंगे, वही सीखेंगे। शिक्षा से समाज में परिवर्तन निश्चित है। परिवर्तन तो आएगा, लेकिन वह किस दिशा में होगा, इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है। हमें स्वयं आकलन करना होगा कि क्या आज की शिक्षा भारतीय जीवन-मूल्यों को सुरक्षित रख पा रही है?  मैंने कई शिक्षित लोगों को देखा है, जो दूसरों से अमर्यादित व्यवहार करते हैं और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं, जो कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित हैं, लेकिन अपने शालीन व्यवहार से संस्कारित परिवार की छाप छोड़ते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल शिक्षा ही मनुष्य को संस्कारित नहीं बनाती। संस्कार जीवन जीने की कला सिखाते हैं।
     

परिवार ही संस्कार की पहली पाठशाला है और बच्चे की पहली गुरु मानी जाती है—माँ। इसलिए समाज को सही दिशा में ले जाने का महत्वपूर्ण दायित्व महिलाओं के पास ही है। विश्वभर में भारतीय समाज और परिवार को एक आदर्श के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में अपनी जड़ों को बचाए रखने के लिए महिलाओं से आगे आने की अपेक्षा स्वाभाविक है।

यदि माँ फिर से अपनी इस गुरु वाली भूमिका को धारण करे और बच्चों में कर्तव्यबोध का निर्माण करे, तो परिवार व्यवस्था को टूटने से बचाया जा सकता है। हम पश्चिमी संस्कृति के अनुकरणकर्ता नहीं हैं, जहाँ परिवार के संचालन के समय अधिकारों को ढूँढ़ा जाता है या अधिकारों का दावा किया जाता है। हम भारतीय संस्कृति के वाहक हैं, जहाँ पहले अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की भावना सिखाई जाती है।
 माँ बच्चों को संस्कार देगी तो बच्चे सही गलत का अंतर समझ सकेंगे। वे केवल विजय और दंड की भावना में नहीं पलेंगे, बल्कि बचपन से ही अपने लोगों और परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर रहने की कला सीखेंगे। उनमें सहनशीलता, संवेदना, सम्मान और सहयोग की भावना विकसित होगी।


 किसी भी देश का कानून संस्कार नहीं सिखा सकता। संस्कार परिवार से मिलते हैं, व्यवहार से आते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। संस्कारों के माध्यम से ही भारत जैसे ‘सर्वमंगल’ की भावना वाले देश में विश्वबंधुत्व और विश्वकल्याण की परिकल्पना संभव हो सकेगी।आज आवश्यकता है कि  विश्वकल्याण और विश्वशांति के लिए हम अपनी भारतीय संस्कृति में निहित मूल्यों पर गहरा विश्वास रखें। हम ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें कि हम पश्चिमी देशों का नहीं, बल्कि पश्चिमी देश  हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनुकरण के लिए बाध्य हो। संस्कृति का संरक्षण केवल अतीत को बचाना नहीं है, बल्कि भविष्य को सही दिशा देना भी है। परिवार में संस्कार होंगे, तो समाज में संस्कार दिखाई देंगे और संस्कारित समाज ही राष्ट्र के विकास को सही दिशा दे सकेगा।

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