भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस समय कांग्रेस और कांग्रेस के कम्युनिस्ट इकोसिस्टम के निशाने पर हैं। केवल इस स्वार्थी  इकोसिस्टम के निशाने पर ज्ञानेश कुमार ही नहीं हैं बल्कि ज्ञानेश कुमार का पूरा परिवार आ गया है। केंद्र सरकार के विरोध में ये इकोसिस्टम बे-सिर-पैर के नैरेटिव फैला रहा है। देश की सांविधानिक संस्थाओं को लेकर समाज में भ्रम, अराजकता और नकारात्मकता का वातावरण बना रहा है। ऐसे झूठे दावे किए जा रहे हैं कि 2014 में मोदी सरकार आने के बाद ही ज्ञानेश कुमार के परिवार की प्रगति हुई है! ऐसे में आपको सत्य और तथ्य दोनों का जानना आवश्यक है।  

दरअसल ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के IAS हैं। उस समय देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। ज्ञानेश कुमार की बेटी मेधा रूपम ने UPSC CSE 2013 में अखिल भारतीय रैंक 10 हासिल की—परिणाम 2014 में घोषित हुए, जब  मनमोहन सिंह की सरकार चल रही थी। उसी परीक्षा में मनीष बंसल की रैंक लगभग 53 रही। दोनों की नियुक्ति 2014 बैच के रूप में हुई।  प्रशिक्षण अकादमी (LBSNAA) में मुलाकात के बाद, चयन के बाद उनका विवाह सुनिश्चित हुआ। यानी परीक्षा, रैंक और चयन—सब UPA काल में पूरा हो चुका था। भाजपा सरकार आने के बाद “नौकरी मिलने” का दावा इस समय-रेखा से टूट जाता है।

कुछ लोगों को बेवकूफ बनाना सरल रहता है। वो दूसरों पर हँसने से स्वयं की योग्यता कैसे सिद्ध करते है? पता नहीं।

किसी की योग्यता रैंक, परीक्षा परिणाम, कार्य-प्रदर्शन और सार्वजनिक रिकॉर्ड से सिद्ध होती है। किसी परिवार के सदस्यों के चयन को “व्यवस्था” बताकर हँसना या संदेह पैदा करना—वह स्वयं योग्यता का प्रमाण नहीं है। यह अक्सर ध्यान भटकाने का तरीका बन जाता है। जब कोई व्यक्ति या समूह तथ्यों (रैंक, बैच, परीक्षा वर्ष) को छोड़कर केवल “परिवार में कई अधिकारी” दिखाकर निष्कर्ष निकालता है, तो वह बहस को मेरिट से हटाकर अटकल की ओर ले जाता है।

अज्ञानता, मूर्खता और भ्रम का लाभ : 

यह इस Narrstive warfare का गहरा भाग है। जब लोग परीक्षा की प्रक्रिया, रैंक की सार्वजनिक उपलब्धता और समय-रेखा नहीं जानते, तो वे आसानी से तैयार किए गए आख्यान को स्वीकार कर लेते हैं। “सब 2014 के बाद बने” जैसे वाक्य भावनात्मक प्रभाव डालते हैं, भले ही वे अधूरे या गलत हों। 

व्यक्तिगत अहं यहाँ बाधा बनता है—जब हम अपनी पूर्वधारणा की पुष्टि चाहते हैं, तो हम विरोधी तथ्यों को अनदेखा करते हैं। शत्रु (चाहे राजनीतिक हो या वैचारिक) ठीक इसी जगह प्रवेश करता है: वह जटिल वास्तविकता को सरल, भावनात्मक कहानी में बदल देता है। व्यक्ति सोचता है कि वह “सच” जान रहा है, जबकि वह केवल अपनी सीमित जानकारी और पूर्वाग्रह के दायरे में घूम रहा होता है।

वास्तविकता यह है कि सिविल सेवा परीक्षा कठिन है, चयन पारदर्शी प्रक्रिया से होता है, और परिवार की शैक्षिक संस्कृति मददगार हो सकती है—लेकिन वह परीक्षा को आसान नहीं बनाती। मेधा की रैंक 10 और मनीष की 53 इस बात की गवाही हैं कि चयन मेरिट पर आधारित था। विवाह बाद में हुआ, इसलिए “रिश्ते से नौकरी” का आरोप भी कमजोर पड़ता है।

अब आइए उनके पूरे परिवार के बारे में तथ्यात्मक तौर पर जान लेते हैं — 

ज्ञानेश कुमार : 

1988 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी हैं। चुनाव आयुक्त मार्च 2024 में बने, मुख्य चुनाव आयुक्त फरवरी 2025 में। यानी CEC पद 2014 के तुरंत बाद नहीं मिला। वे दशकों से सेवा में थे।

बड़ी बेटी मेधा रूपम : 

2014 बैच की उत्तर प्रदेश कैडर IAS। UPSC CSE 2013 में अखिल भारतीय रैंक लगभग 10। सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र, राष्ट्रीय स्तर की शूटर भी रही हैं। पति मनीष बंसल से मुलाकात LBSNAA प्रशिक्षण के दौरान हुई।

दामाद मनीष बंसल : 

2014 बैच IAS, रैंक लगभग 53। IIT दिल्ली से B.Tech/M.Tech। अभी आगरा DM बताए जाते हैं। चयन स्वतंत्र परीक्षा से हुआ, विवाह चयन के बाद।

छोटी बेटी अभिश्री : 

UPSC 2017 से IRS, रैंक लगभग 297। सेंट स्टीफंस से पढ़ाई। पति अक्षय लाबरू/लबरू 2018 बैच IAS (त्रिपुरा/AGMUT), CSE 2017 में रैंक लगभग 104, कश्मीरी पंडित परिवार से, DU/JNU। चित्र में 2018 बैच सही है; कुछ रिपोर्टों में 2017 लिखा जाना भ्रम है।

इतना ही नहीं उनके परिवार में और भी अधिकारी हैं (भाई IRS, बहनोई IPS आदि)। यह “केवल 2014 के बाद बेटियाँ-दामाद” तक सीमित नहीं है। ऐसे में सोशल मीडिया में जो फोटो ज्ञानेश कुमार को लेकर फैलाया जा रहा है। वो  गलत या अधूरी कहानी कहता है- उस फोटो के अनुसार ज्ञ“सबको नौकरी 2014 के बाद मिली इसलिए राजनीतिक सौगात है”

किन्तु  साल 2014–18 के आसपास कुछ का चयन हुआ, यह ऐसे 50 हजार लोगों के चयन में से है, जो सही है। लेकिन IAS/IRS सीटें UPSC की लिखित और साक्षात्कार से मिलती हैं, मंत्रालय की नियुक्ति से नहीं। मेधा की रैंक 10 और मनीष की 53 सामान्य “सिफारिश” की कहानी से मेल नहीं खातीं बल्कि NarrativeWarfare और propaganda काम प्रयोग मात्र है।

ज्ञानेश कुमार का CEC होना कारण नहीं : 

बेटियाँ और दामाद तब चुने गए जब ज्ञानेश CEC नहीं थे। वे तब सामान्य वरिष्ठ IAS थे। CEC पद बहुत बाद में मिला।

“कोई IPS बना” वाली पंक्ति

वायरल फोटो में दिखाए जा रहे चार युवा अधिकारियों में IPS नहीं है।  IPS परिवार के अन्य सदस्य (बहनोई) हैं।- “आपके बच्चे पीछे रह जाएँगे”

वस्तुत: यह वही समाज को भ्रमित करने एवं असंतोष निर्माण वाली राय कायम करना है। हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी परिवार में सिविल सेवा में जाने की परंपरा और अफसरों का आपस में विवाह होना । ये अपने आप में अनैतिक नहीं माना जाता है। UPSC में लोगों का चयन व्यक्तिगत परीक्षा से होता है। जबकि विवाह अक्सर प्रशिक्षण या सेवा के दौरान होता है। यानी चयन के बाद। इसलिए “सगे-संबंधी बाद में संख्या बढ़ाते हैं” — ऐसे में इसे  स्वतः धांधली नहीं कहा जा सकता—यह नौकरशाही में आम सामाजिक पैटर्न भी हो सकता है।

विवाद तब बनता है जब चयन के साल को सत्ता-परिवर्तन से जोड़कर निष्कर्ष निकाल दिया जाए। 2014 के बाद परीक्षा उत्तीर्ण होना समय का तथ्य है। परीक्षाएं UPSC चलाती है, सत्तारूढ़ दल सीट नहीं बाँटता। मेधा रूपम की उच्च रैंक इन बेबुनियाद आरोपों को और कमजोर करती है। ज्ञानेश कुमार तो स्वयं 1988 बैच के अधिकारी हैं; CEC बहुत बाद में बने। अर्थात् हर व्यक्ति को ये समझना चाहिए कि 

“कम्युनिस्ट इकोसिस्टम जानबूझकर भ्रम फैला रहा है”—यह राजनीतिक आरोप है, सिद्ध तथ्य नहीं। सच यह है कि विपक्षी दल, सोशल मीडिया और कुछ मीडिया घराने संवेदनशील संस्थाओं (चुनाव आयोग) के विवाद के समय परिवार-वृक्ष चलाते हैं; सत्तापक्ष उसे “षड्यंत्र” कहता है। दोनों तरफ प्रचार होता है। सत्य और तथ्य एक-एक करके बताए गए हैं। बाकी सब एक आख्यान मात्र रायबहादुरी है, जिसका कोई प्रमाण नहीं है। ऐसे में एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य होता है कि कभी भी किसी भ्रामक नैरेटिव, अफ़वाह के शिकार न बनें। आप यदि थोड़ा बहुत भी पढ़े लिखे हैं तो अगर तथ्यों की पड़ताल करेंगे तो लगभग सारी, सही जानकारी आपको मिल जाएगी‌। ऐसे में ये ध्यान रखें कि ये सब चुनाव आयोग, UPSC जैसी हमारी सभी सांविधानिक संस्थाओं के ख़िलाफ़ चलाया जा रहा अभियान है।ये लोकमानस की उसके लोकतंत्र और संविधान में अनास्था उत्पन्न करने और अराजकता फैलाने का वातावरण तैयार किया जा रहा है। इसीलिए हर व्यक्ति का सतर्क होना,सजग होना आवश्यक है। क्योंकि राजनीति और सत्ताएं अपनी जगह होती हैं। किन्तु देश और समाज से बढ़कर कोई नहीं हो सकता। 

Disclaimer : इस लेख/रचना में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। हर तरह के वाद, विवाद के लिए लेखक व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार हैं।
अपने लेख इस पते पर भेजें :- editatalraag@gmail.com