राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों के समापन अवसर पर नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का उद्बोधन संघ की सौ वर्षों की यात्रा के साथ भारत के सामाजिक चरित्र, सांस्कृतिक चेतना और भविष्य की चुनौतियों पर विचार करने का अवसर भी था। अपने संबोधन में उन्होंने भारत की राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संगठन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि देश को अस्थिर करने के प्रयास सफल नहीं होंगे और भारत की एकता एवं स्थिरता को बनाए रखना आवश्यक है।

इस उद्बोधन का केंद्रीय प्रश्न यह था कि भारत अपनी सभ्यतागत पहचान को सुरक्षित रखते हुए एक सशक्त, समरस और विश्व का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्र कैसे बने। इस संदर्भ में डॉ. भागवत ने संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित ‘हम भारत के लोग’ की भावना, स्वबोध, सामाजिक एकात्मता, पंच परिवर्तन, विवेकपूर्ण विकास और नागरिक कर्तव्यों के महत्व को रेखांकित किया। उनके विचारों में राष्ट्र निर्माण को केवल शासन, राजनीति या किसी एक संगठन की जिम्मेदारी न मानकर समाज के सामूहिक प्रयासों और दैनिक आचरण से जोड़ने पर विशेष जोर दिखाई देता है।

संघ के सौ वर्ष: सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत में सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्मता के विकास को समझने का अवसर भी है। इस यात्रा के पीछे हजारों प्रचारकों, लाखों स्वयंसेवकों और अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के लंबे समय के प्रयास रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय और धर्म जागरण जैसे संगठनों ने शिक्षा, सेवा, सामाजिक जागरूकता तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में कार्य किया है।

संघ की विचारधारा के केंद्र में यह प्रश्न रहा है कि जाति, भाषा, संप्रदाय और क्षेत्र की विविधताओं के बावजूद समाज में सांस्कृतिक एकता, आपसी सद्भाव और सामूहिक उत्तरदायित्व को कैसे मजबूत बनाया जाए। इस दिशा में संगठनात्मक गतिविधियों के साथ शिक्षा, सेवा कार्यों, सामाजिक समरसता और धार्मिक नेतृत्व के बीच संवाद को भी महत्व दिया गया है। संघ की दृष्टि में समाज का संगठित होना केवल संख्या या संरचना का विषय नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना, अनुशासन, आत्मीयता और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यबोध का विषय है।

इस प्रकार, संघ का शताब्दी वर्ष उसके सौ वर्षों के कार्यों, विचारों और सामाजिक प्रभाव का मूल्यांकन करने के साथ-साथ भारत के भविष्य पर चिंतन का अवसर भी प्रस्तुत करता है। स्वबोध, सामाजिक समरसता, नागरिक अनुशासन, विवेकपूर्ण विकास और समाज की सक्रिय भागीदारी जैसे विषय इस विमर्श के प्रमुख आधार हैं। इन विचारों की व्यापक प्रासंगिकता इस बात में है कि भारत की प्रगति को आर्थिक और भौतिक विकास के साथ सामाजिक सद्भाव, सांस्कृतिक चेतना, पर्यावरणीय संतुलन और नागरिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा जाए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में संघ के कार्यों, विचारों और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को स्मरण किया जा रहा है। इस अवसर पर संत शिरोमणि रविदास जी महाराज के 650वें जन्म जयंती वर्ष, स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान के 100 वर्ष, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती जी की जन्म शताब्दी तथा ‘हिंदू मेला’ के प्रेरक राज नारायण बसु के 200वें जन्म वर्ष का विशेष महत्व है। संघ का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, स्वबोध, सामाजिक समरसता और स्वदेशी के भाव को जागृत कर राष्ट्र को संगठित एवं सशक्त बनाना है। इसी दिशा में संघ ने पंच परिवर्तन की पहल की है, जिसमें स्व का बोध और स्वदेशी का आचरण प्रमुख हैं।

भारत के संविधान में हम स्वयं को ‘हम भारत के लोग’ के रूप में परिभाषित करते हैं। विविधता के बावजूद हमारी एकता का आधार यह भावना है कि सभी मत, पंथ, भाषा, जाति और प्रांत एक ही राष्ट्र के अंग हैं।भारत की सनातन परंपरा सिखाती है कि बाहरी विविधताएँ परिवर्तनशील हैं, पर उनके पीछे की आत्मिक एकता शाश्वत सत्य है। जब हमने इस एकता और आत्मबोध को भुलाया, तब हम कमजोर और विभाजित होकर गुलामी झेलने को विवश हुए।

स्वतंत्रता के बाद अब हमें अपनी विस्मृति दूर कर उस एकता को फिर से अपनाना होगा। देश की प्रगति और ‘विश्वगुरु’ की स्थिति के लिए स्वाधीनता संग्राम से भी अधिक तपस्या, संगठन और समर्पण आवश्यक है। सभी का सम्मान करते हुए आपसी हित और राष्ट्रीय एकता के लिए कटिबद्ध होना ही हमारी असली ताकत है

भारत की सनातन दृष्टि में सभी विविधताओं को सम्मान, स्वीकार और संरक्षण देना, साथ ही समय के अनुसार अनुचित या पुरानी प्रथाओं को बदलने की लचीलता शामिल है। जब यह भाव जनता में प्रबल रहा, तब भारत विश्व में आदर्श राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित था। किंतु आत्मविस्मृति, विघटन और आपसी संपर्क के टूटने से हम कमजोर, संकुचित और भयग्रस्त हो गए, जिसका परिणाम देश की दुर्गति थी।अब आवश्यकता है कि हम अपनी अस्मिता और एकता के इस आधार को पुनः अपनाएँ, संगठित हों और परस्पर हित तथा राष्ट्रहित के लिए समर्पित बनें।

संघ शताब्दी कार्यक्रम

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी के अवसर पर देशभर में शाखाओं एवं स्वयंसेवकों के संपर्क विस्तार, सामाजिक समरसता और भारत, हिंदुत्व तथा संघ के विचारों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। संपर्क अभियान के अंतर्गत 4,61,527 गाँवों और 41,076 नगरीय बस्तियों में 10,19,88,511 घरों तक संपर्क किया गया। देश के 1,117 जिलों में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियों में 4,26,497 महिला एवं पुरुष शामिल हुए। इसके अतिरिक्त, 5,036 खंडों में सद्भावना बैठकें, 34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन आयोजित किए गए तथा युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवाओं ने भाग लिया।

शताब्दी के निमित्त संघ के कार्यकर्ताओं ने पश्चिमी देशों में भी प्रवास कर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा, हिंदुत्व की समावेशी भावना तथा संघ के उद्देश्यों और कार्यों की जानकारी दी। भारत के प्रति विश्व में बढ़ती रुचि के बीच भारतीय दृष्टिकोण को पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक विविधता, पारिवारिक मूल्यों और संतुलित उपभोग जैसी वैश्विक चुनौतियों के समाधान के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया। इन संवादों के माध्यम से संस्कारों और जीवन-मूल्यों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाकर ही समाज में व्यापक और दीर्घकालिक परिवर्तन लाया जा सकता है।

इसी क्रम में संघ की पंच परिवर्तन पहल के पाँच प्रमुख आयाम—सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध एवं स्वदेशी तथा नागरिक अनुशासन—को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाने पर जोर दिया गया। इन पहलों का उद्देश्य सामाजिक सद्भाव बढ़ाना, परिवार एवं संस्कारों को मजबूत करना, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी विकसित करना, भारतीय पहचान और स्वदेशी भावना को प्रोत्साहित करना तथा नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। संघ के अनुसार, ये पहल केवल एक वर्ष के कार्यक्रम नहीं, बल्कि जीवनशैली और व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाने का माध्यम हैं।

 विवेकशील आचरण की आवश्यकता

आज की युवा पीढ़ी को परिवार, विद्यालय और समाज से उचित संस्कार एवं विवेक प्रदान करना एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और OTT प्लेटफार्म से बिना छानबीन के मिलने वाली जानकारी के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।इसलिए शासन-प्रशासन को इन माध्यमों पर उचित नियंत्रण पर विचार करना चाहिए, साथ ही युवाओं को उचित-अनुचित का विवेक सिखाना भी आवश्यक है। विवेक के अभाव से नशे की लत एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बन रही है।अभिभावक पीढ़ी, समाज और स्वयंसेवकों को मिलकर नशे के विरुद्ध देशव्यापी जागरूकता और प्रतिरोध खड़ा करना होगा। भविष्य में विश्वगुरु भारत के निर्माण का दायित्व युवा पीढ़ी पर होगा, इसलिए उन्हें हर स्तर पर तैयार और सजग रहना होगा।

संतुलित और समग्र विकास की दृष्टि

भारत की सनातन जीवन-दृष्टि समन्वय और संयम पर आधारित है। विज्ञान और तकनीक जीवन को बेहतर बनाते हैं, लेकिन उनका उपयोग विवेक और जिम्मेदारी से होना चाहिए। नेपाल की हालिया त्रासदी हमें सिखाती है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास करते समय पर्यावरण का ध्यान रखना जरूरी है। तकनीक के साथ नैतिकता और अनुशासन भी जिसमें आर्थिक प्रगति, प्रकृति की सुरक्षा और मानव कल्याण के बीच संतुलन बना रहे और वह विश्व के लिए उदाहरण बने।भारत को समग्र एवं एकात्म विकास का नया प्रतिमान बनकर विश्व के सामने उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।

हिन्दू भाव व हिन्दू स्वभाव — एकता का आधार

सनातन संस्कृति भारत की पहचान है। इसका आधार किसी विशेष पूजा-पद्धति, खान-पान, भाषा, जाति या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवता, आध्यात्मिकता और विश्वबंधुत्व है। यही भाव भारतीयों को आपस में जोड़ता है और भारत की एकता को मजबूत बनाता है। भारत के प्रति प्रेम, अपने पूर्वजों पर गर्व और सनातन संस्कृति के मूल्यों को जीवन में अपनाना इस भावना के प्रमुख आधार हैं। इस हिन्दू भाव और स्वभाव का संरक्षण भारत की प्रगति, सामाजिक एकता और विश्व में सद्भाव बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है।

हम सभी भारतवासियों की एकता — स्वाभाविक और बिना शर्त

हम भारतीयों का आपस में और भारत माता से गहरा भावनात्मक रिश्ता है। यह रिश्ता प्रेम, अपनापन और समर्पण पर आधारित है, इसमें कोई शर्त नहीं होती। “तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें” इसी निस्वार्थ देशभक्ति की भावना को दर्शाता है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने भी इसी भावना से देश के लिए संघर्ष किया और अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज में इसी अपनत्व और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करने के लिए कार्य करता है। समाज की सुरक्षा, सम्मान और प्रगति के लिए उसका संगठित और सक्षम होना आवश्यक है। इस दृष्टि के अनुसार, सभी पंथों का सम्मान करते हुए समाज में सद्भाव, एकता और अच्छे आचरण को बढ़ावा देना चाहिए। पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाले ऐसे संस्कार ही कैप्टन स्मित मच्छार जैसे लोगों को दूसरों की रक्षा के लिए अपना जीवन तक जोखिम में डालने की प्रेरणा देते हैं।

सद्भावनापूर्ण व्यवहार आवश्यक

भारत विविधताओं से भरा है, एक समाज है। अतः मन, वचन और कर्म में परस्पर सद्भाव व अपनापन होना चाहिए। इतिहास की पुरानी आशंकाओं से नई गाँठें न बनने दें ।शासन-प्रशासन और समाज के सभी लोगों का व्यवहार भद्र, सम्मानजनक व आत्मीय होना चाहिए। संघ का आधार सेवा, प्रेम और स्वयंसेवकों के समर्पण पर है; उसकी सद्भावना पर आधारहीन संदेह उठाने के प्रयासों से सतर्क रहना चाहिए।

भारत अपनी शक्ति, नीति और नेतृत्व से विश्व में स्थान बना रहा है। भारत की बढ़ती शक्ति और आत्मनिर्भरता से वैश्विक राजनीति में बदलाव आ रहा है। ऐसी ताकतें भारत की प्रगति को अपने हितों के लिए चुनौती मानती हैं और भारत, हिंदू समाज तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एकता को कमजोर करने के प्रयास करती हैं। इसलिए भारत की एकता, सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए रखना महत्वपूर्ण है। समाज में आंदोलन होंगे, पर वे समाधान के लिए होने चाहिए, द्वेष या विभाजन के लिए नहीं।भावनाएँ चाहे कितनी भी तीव्र हों, हमारे वचन-कर्म संविधान, कानून और भद्र व्यवहार की मर्यादा में रहें। लोकप्रियता या राजनीतिक लाभ के लोभ से विवेक व सद्भावना पर हावी नहीं होने देना चाहिए।

समाज के प्रयासों से समाधान

समाज की समस्याओं का समाधान केवल सरकार या आंदोलनों से ही नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और संवाद से भी हो सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक समाज की भागीदारी से समस्याओं के समाधान का प्रयास करते हैं। 21 प्रांतों के 210 जिलों के लगभग 1,296 ग्रामीण विद्यालयों में किए गए प्रयासों से विद्यार्थियों की उपस्थिति, पढ़ाई के स्तर और अभिभावकों की भागीदारी में सुधार देखा गया। ग्रामीणों ने शिक्षा, स्कूलों की सुविधाओं, खेलकूद और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी योगदान दिया। इसी तरह, हजारों गाँवों में सामूहिक प्रयासों से विकास कार्य किए जा रहे हैं। इन सेवा कार्यों का उद्देश्य समाज में आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी की भावना को मजबूत करना है।

सजगता की आवश्यकता

देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव हम सभी में होना चाहिए। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उन्हें समाज में विभाजन का कारण नहीं बनने देना चाहिए। आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि समाज में नफरत और अव्यवस्था फैलाना। इसलिए किसी भी बात पर बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया देने के बजाय तथ्यों को समझना और विवेक से काम लेना आवश्यक है। हमें आपसी सद्भाव, अनुशासन और राष्ट्रीय एकता बनाए रखते आवश्यक हैं, ताकि परमाणु विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग न हो। भारत को ऐसा विकास मॉडल अपनाना चाहिए,हुए देश की प्रगति के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिए। आपसी सम्मान, एकता और राष्ट्र के प्रति समर्पण ही समाज को मजबूत बनाते हैं।

एकता के सूत्रों पर दृढ़ रहें

लॉर्ड कर्ज़न के बंग-भंग का विरोध समाज की एकता और ‘वन्दे मातरम्’ की भावना से हुआ था, जिससे विभाजन वापस लेना पड़ा। पर 1947 में सांप्रदायिकता, अलगाव और स्वार्थ के कारण देश बँट गया—जिससे शांति नहीं, अविश्वास और अशांति बढ़ी।बंग-भंग के विभाजनकारी षडयंत्र को परास्त करने वाला वन्देमातरम आज भी वही एकता की प्रेरणा देने में सशक्त है; इसे पूरे स्वाभिमान से गाना चाहिए। भारत-भक्ति, पूर्वजों का गौरव और सनातन भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्य—यह त्रिसूत्र सभी पंथ, भाषा और जाति से ऊपर हमें जोड़ता है। छोटी पहचानों के अहंकार और अलगाव की भावना त्यागकर, हमें देश की एकता के इन आधारों पर दृढ़ रहकर राष्ट्र के लिए जीना चाहिए।

भारत का वैश्विक दायित्व और हमारा कर्तव्य

आज दुनिया में अशांति और आतंक का मूल कारण जीवन के अधूरे दृष्टिकोण है। हमें दूसरों से अच्छी बातें सीखते हुए अपनी राष्ट्रीयता, एकता और गुणवत्ता को अपनाकर संगठित प्रयास करना चाहिए।भारत को धर्म और नैतिक मूल्यों के साथ विकास का नया मार्ग दिखाना है, ताकि वह विश्व को सुख और शांति दे सके। इसके लिए हमारा हर काम उत्कृष्ट होना चाहिए और समाज व देश की सुरक्षा, एकता, न्याय और प्रगति के लिए होना चाहिए।भारत का वैभव और विश्वगुरु बनना हर व्यक्ति के कर्तव्यनिष्ठ प्रयास से ही संभव है। इसका कोई शॉर्टकट नहीं है। व्यक्ति, परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र में छोटे-छोटे अच्छे कार्यों से ही बदलाव आएगा। संघ के पंचपरिवर्तन और स्वयंसेवकों की गतिविधियाँ लोगों को देशसेवा और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाती हैं। अपने शताब्दी लक्ष्यों को पूरा करने के बाद संघ समाज में संगठित, सक्षम और विजयी शक्ति खड़ी करने की ओर बढ़ेगा।

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