अष्टमी की देवी महागौरी का स्वरूप स्वच्छता और पावित्र्य का प्रतीक है। कर्पूरगौर ने स्वयं गंगाजल से स्नान कराया तो काली भी गौरवर्णी हो गई। शिव संहार के देव हैं, महाकाल हैं। कल्मषवारिणी माता गंगा भी वास्तव में अशुभनाशिनी ही है। जिनको स्नान कराया जा रहा है वे भी असुरनिखंदन ही है। गौर, शुभ्र या पावन होना है तो मैल, दानव, शत्रु को पहचानना होगा। चाणक्य की युद्धनीति कहती है कि शत्रु के बल, दुर्बलता और रणनीति का अध्ययन ही हमें अपनी विजयी नीति बनाने के लिए तत्पर करता है।

धूम्रलोचन के आवरण को भेदने के लिए सत्य को ही प्रगट करना पड़ता है। मिथ्या के धुएँ से वास्तव को प्रकाशित करने के लिए कथ्य को तथ्य से मात देनी होती है। चण्ड-मुण्ड जिनकी सेना के सेनापति हैं वे शुम्भ-निशुम्भ दुर्गा ने जिनका मर्दन किया उन मधु-कैटभ के ही वंशज हैं। शंकर अर्थात् मंगल करनेवाले से स्नान की पात्रता के लिए वर्तमान में इन असुर जोड़ियों के अवतार को समझना अनिवार्य है। तभी शुभ्र वस्त्रों में महागौरी प्रगट होगी और प्रसाद प्रदान करेंगी।

मधु अर्थात् मधुर स्वाद से, मायावी रूप से कार्य करनेवाला। शुम्भ भी दंभ और प्रदर्शन का प्रतीक है। कैटभ कटु है, सीधे वार करता है और निशुम्भ उद्दंड है, माता को विवाह का प्रस्ताव भेजता है। वर्तमान समय में भी विकास, संपदा और सुविधा का लोभ देकर विज्ञापनों के मधुर प्रलोभनों से कार्य करनेवाले वैश्विक बाज़ार बल (GMF – Global Market Forces) पूरे विश्व को अपने अधीन करने हेतु प्रयत्नरत हैं। पूंजीवाद से प्रारंभ हुआ ये विघटनकारी बल निर्विरोध प्रसार की छूट मिलने के बाद विश्व को बाज़ार के रूप में देख सभी को एक ढाँचे में ढालने के लिए लग गया। मधु का वंशज शुम्भ के समान ही मुक्त बाज़ार का वंशज वर्तमान विश्व बाज़ार बल अधिक दंभी, कपटी बन सर्वत्र हस्तक्षेप कर रहा है। लाभ और स्वार्थ को ही लक्ष्य बनाकर पूरे विश्व का शोषण कर संपन्न होने का अधिकार कुछ सीमित सुयोग्य लोगों के पास है, ऐसी विचारधारा पर यह कार्य करता है। सबके सुख और सम्मान का विचार करनेवाला, विचार, परंपरा और संस्थाओं को समाप्त करने के लिए नैतिक- अनैतिक विधियों का प्रयोग अनिर्बंध करते हैं। शासन-प्रशासन में प्रवेश कर अपने हितों के निर्णय करने के लिए शोध संस्था (Think Tanks), ग़ैर सरकारी संगठन (NGO) के साथ ही संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO), विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी बहुराष्ट्रीय संस्थाओं का प्रयोग भी करने में संकोच नहीं करते। विश्व व्यापार संगठन (WTO) और आंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि (IMF) तो इनके प्रमुख भागीदार हैं ।

कैटभ के समान कटुता से मानवता को नष्ट करने का प्रयत्न करनेवाला विध्वंसक बल है मार्क्सवाद या साम्यवाद। रक्तरंजित बोल्शेविक क्रांति से रशिया में प्रारंभ कर कई देशों में बलपूर्वक सत्ता को स्थापित किया। गंभीर अध्येताओं के अनुसार एक शताब्दी के इतिहास में ही इस विचारधारा ने 10 से 24 करोड़ लोगों की हत्या की है। मुक्त संचार (free media) की व्यवस्था ना होने से यह अनुमान ही है। यह युद्धों में दूसरे देशों के मारे लोगों की संख्या नहीं है। अपने ही देश में विचार का विरोध करनेवालों का दमन करने हेतु किया नरसंहार है।

चीन के थियानमैन चौक में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने ही देश के युवाओं पर कवचयान (Tank) से गोलियाँ बरसाकर दो घंटों में सहस्रों की बलि लेने की घटना तो विश्व के माध्यमों में प्रसारित हुई। संभवतः आतंक हेतु चिन की कम्युनिस्ट पार्टी ने ही जानबूझकर कर कुछ छायाचित्र प्रकाशित होने दिये। मृतों का सही आँकड़ा तो किसी को ही ज्ञात नहीं। सत्तर वर्ष पूर्व चीन में क्रांति के बाद निरंकुश शासक बने माओ झेड़ोंग ने सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर करोड़ों लेखकों, कलाकारों की हत्या की। उनके नाम से माओवाद अनेक देशों में सशस्त्र आंदोलन के नाम पर निरपराध लोगों की हत्या करता है। फिर भी रशिया, चीन सहित सभी देशों में इस विचारधारा का पतन हो चुका है। आर्थिक रूप से सभी देश बाज़ारी व्यवस्था पर ही आ चुके हैं। तानाशाही, संचार माध्यमों पर कठोर नियमन जैसी बातें आज भी इन देशों में दिखाई देती हैं। लोकतांत्रिक देशों में कम्युनिस्ट दल अभिव्यक्ति का अधिकार, मानवाधिकार आदि जिन मूल्यों का डंका पीटते हैं वे इस विचारधारा के ना तो दर्शन में हैं ना ही कहीं पर भी व्यवहार में।

क्लासिकल मार्क्सिज्म (Classical Marxism) के विफल होने की आशंका से इसके नव अवतार समाजवाद, वाम स्वतंत्र (Left Liberal) आदि अनेक नामों से विश्व में अग्रणी विश्वविद्यालयों से निकलते रहते हैं। कैटभ के वंशज निशुम्भ के अनुसार ही ये सब बौद्धिक उद्दंडता से सभी स्थापित सभ्यताओं के उन्मूलन की प्रगट योजना बनाते हैं। इन सबको एकत्रित रूप से सांस्कृतिक मार्क्सिस्ट बल (CMF – Cultural Marxist Forces) के नाम से जाना जाता है। संस्कृति से इनका कोई संबंध नहीं है किंतु संस्कृति को तोड़ने के लिए विश्वविद्यालयों में संस्कृति अध्ययन (Cultural Studies) के विभाग खोलकर इस छद्म युद्ध का प्रारम्भ हुआ और इसके प्रवर्तकों ने शास्त्रीय (Classical) के स्थान पर सांस्कृतिक (Cultural) मार्क्सिज्म का नाम दिया। आज ये मायावी बहुरूपिये की तरह भारत सहित देश के सभी विश्विद्यालयों, कला संस्थाओं, माध्यमों में प्रस्थापित हो गये हैं।

शासन किसी का भी हो वैचारिक और शैक्षिक तंत्र पर इनका पूर्ण प्रभाव और नियंत्रण रहता है। भेद को खोजना, द्वैत (Binary) को चिन्हित कर उसे परस्पर विरोधी बना समाज को तोड़ना ताकि क्रांति हो सकें यही इनकी सुविचारित रणनीति है। लिंग, जाति, भाषा, वर्ण, वंश के द्वैतों में विभेद उत्पन्न कर शोषक-शोषित संघर्ष खड़ा कर अव्यवस्था को फैलाते हैं और राजनीति में प्रवेश कर लेते हैं। सत्ता प्राप्त करना ही इनका अंतिम उद्देश्य होता है। मानवी मन की कमज़ोरियों को उभार कर सभी प्रकार से संयम, सामाजिक निर्बंध का विरोध करना, युवाओं को नशे, यौन स्वैराचार, अनुशासन हीनता के लिए प्रोत्साहित कर उस अपराध वृत्ति को विचारधारा की उदात्त शब्दावली प्रदान करते हैं।

शुम्भ-निशुम्भ के समान ये दोनों भौतिकवादी विचारधाराएँ आज विश्व मानवता के लिए बड़ा संकट बन चुकी हैं। हिंदुत्व, भारत और सभी सांस्कृतिक संस्थान इनका प्रमुख लक्ष्य हैं क्योंकि ये ही उन्हें रोक सकते हैं। इसलिए भारत में ये सब संगठित हो रक्तबीज के समान संस्थाओं, संगठनों और प्रबुद्ध वर्ग का निर्माण करते हैं। इनके विरोध हेतु इनका पूर्ण अध्ययन कर इनके वास्तविक स्वरूप को समाज और इनके अनुयायियों के सम्मुख लाना आवश्यक है। इन दोनों विचारधाराओं को माननेवाले देशों के समाज की दयनीय स्थिति का तथ्यात्मक विवरण ही इनके षड़यंत्रों को अनावृत्त (Expose) कर सकता है। इसमें किसी कपट, छल अथवा अर्धसत्य की आवश्यकता नहीं है। इनकी सत्य स्थिति ही भयावह है।

दूसरी रणनीति प्रबुद्ध वर्ग में सही अर्थ में सांस्कृतिक और सकारात्मक विचार पर कार्य करनेवाले वैचारिक वीरों की सेना का निर्माण। कालरात्रि माता ने भी अपनी 7 सहयोगी शक्तियों की टोली बनाकर ही शुम्भ-निशुम्भ की सेना पर विजय पायी थी। आवश्यकता पड़ने पर रक्तबीज का रक्त भी प्राशन किया। मायावी से युद्ध करते समय माया का प्रभाव हो ही जाता है। इसलिए GMF-CMF से लड़ते समय अपने मूल स्वरूप महागौरी का स्मरण और अधिक आवश्यक है। अपने शुद्ध सात्विक विचारों के स्वाध्याय के गंगाजल से तप और युद्ध के मैल को धो पुनः निर्मल हो, शुभ्र वस्रा महागौरी का दर्शन, प्रसाद भी प्राप्त करें यही निवेदन।

 

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