देवी की पूजा में श्रीसूक्त का बड़ा महत्व है। सबसे पुराने धर्मग्रंथ ऋग्वेद के इस सूक्त से महालक्ष्मी की अर्चना की जाती है। श्री की पूजा समग्र संपदा के लिए की जाती है। केवल वित्त अथवा अर्थ ही नहीं धर्म से प्राप्त संपदा को श्री कहते है। उत्पादन में सभी नियमों का पालन, प्रकृति की रक्षा, मानवमात्र के कल्याण का ध्यान तथा प्राप्त लाभ का भी धर्म के अनुसार विनियोग श्री की कृपा से होती है। श्रीसूक्त का पाठ करते समय भक्त केवल स्वयं के लिए प्रार्थना नहीं करता है, पूरे राष्ट्र को सर्वांगीण समृद्ध बनाने के लिए माता से निवेदन करता है।

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह, प्रादुर्भूतोsस्मि राष्ट्रेsस्मिन् कीर्तिमृद्धिंच ददातु में ॥

भारत में राष्ट्र की संकल्पना अनादि है। जहां हमने जन्म लिया उस भूमि के प्रति मातृत्व का बोध भी हमें इस सबसे पुरातन ग्रंथ में मिलता हैं। मातृभूमि इस राष्ट्र की सदा से ही आराध्य रही है। भारतमाता की संकल्पना भी उतनी ही सनातन है। इस राष्ट्र के लिए भारत नामाभिधान भी ऋग्वेद में प्राप्त होता है। विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्‌ ॥ ऋ. ३. ५३. १२॥ कुछ लोग जानबूझकर ऐसा भ्रम फैलाते हैं कि अंग्रेजों के आने से पूर्व ये एक राष्ट्र था ही नहीं। भिन्न भिन्न राजा बिखरे हुए आपस में लड़ते रहते थे। अंग्रेजों ने भारत को राष्ट्र के रूप में संगठित किया। अथवा कुछ अन्य तो इसे स्वाधीनता के बाद बना युवा राष्ट्र कहते हैं। यह दोनों तर्क तथ्य पर आधारित नहीं हैं। भारत एक सनातन राष्ट्र है।

इसका एक कारण अनुवाद का भ्रम है। अंग्रेज़ी संकल्पना Nation और राष्ट्र को जब पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है तब संभ्रम उत्पन्न होता है। Nation यह मूलत: वंशाधारित धारणा है। Native आदि शब्द भी इसी से आये है। आज भी अमेरिका में मूलनिवासियों को उनकी जनजाति नाम के साथ nation कहकर जाना जाता है – यथा ‘चेरोकी नेशन’। वैसे ही अफ़्रीका से लाए ग़ुलामों को भी African Nation कहते हैं। बादमें Nation-State यह संकल्पना राजनीतिशास्त्र में विकसित हुई। इसमें राजनीतिक और आर्थिक रूप से Nationnood तय किया जाने लगा। स्व-भाव का आधार ना होने से मनुष्यनिर्मित भाषा, राज्य, आर्थिक हित आदि आधार Nationality के लिए ढूँढें गए। राष्ट्र संकल्पना पूर्ण भिन्न है। यह सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और स्वभावगत विचार है। एक संस्कृति, संस्कार, व्यवहार और जीवनध्येय का पालन करने वाले व्यक्ति अपने सर्वोत्तम अर्थात् विराट को गौरव से प्रगट करते तब उसे राष्ट्र कहा जाता है। अतः यहाँ का निवासी संविधान से अनुबंधित नागरिकता तक ही सीमित नहीं है, वह स्वयं को इस राष्ट्रपुरुष का अंग जानता है। यह विधिक अनुबंध (Legal Contract) नहीं सांस्कृतिक जैविक संबंध है। राष्ट्रीय निवासी को नगर से उपजा पद नागरिक (Citizen) कहा जाता है। इससे ग्राम, वन गिरिवासियों के मन में स्थायी कुंठा और नगर प्रस्थान का आकर्षण उत्पन्न होता है। सारा विकास और प्रशासन का केंद्र नगर महानगर बन जाते है। नागरिक के स्थान पर सांस्कृतिक आध्यात्मिक परिचय राष्ट्रांग देशवासियों को अधिक भावात्मक और आत्मविश्वासी बनाएगा। 

वेदों के अनुसार भारत राष्ट्र का जन्म ही ऋषियों के उग्र तप से विश्वकल्याण के लिए हुआ है। अपने स्वाभाविक एकत्व से यह राष्ट्रीयता विराजित (Glorified) है। इसीलिए अपनी व्यक्तिगत अथवा सामूहिक उपासना में भी राष्ट्र के परम् वैभव की प्रार्थना के साथ ही पूरे विश्व के कल्याण की प्रार्थना प्रत्येक सनातनी हिंदू भारतीय करता है। भारत में सहज विद्यमान अन्य विविधताओं के समान ही राज्य व्यवस्थाओं की भिन्नता से राष्ट्रीय एकात्मता पर कभी विपरीत प्रभाव नहीं हुआ है। प्रतिदिन पूजा के समापन में पुष्पांजलि के साथ गाये जानेवाले वेद मंत्रों में राज्य के विविध प्रकार सूचित किए गए है।

ॐ स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं ।

इतनी विविध राज्यव्यवस्थाएँ होते हुए भी यह एक सार्वभौम और सनातन राष्ट्र है यह अगली पंक्ति में आता है। 

समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात् । पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकरा‌ड इति ॥

पृथ्वी से समुद्रतक एकराड अर्थात् एक राष्ट्र है। राड अथवा पाठभेद में राळ राजृ अर्थात आलोकित धातु से ही विराट, राज, विराजमान यह सभी शब्द आए हैं। राजृ दीप्तौ धातु। इस धातु का सर्वोत्तम आविष्कार राष्ट्र है। संस्कृत में ‘त्र’ प्रत्यय उत्तम, उदात्त इस अर्थ में आता है। पवि अर्थात् स्वच्छ अथवा शुभ्र इसमें त्र उपसर्ग लगते ही पवित्र बन दिव्य हो जाता है। चर अर्थात् चलना और लाक्षणिक अर्थ में आचरण में त्र लगते ही चरित्र हो जाता है। चरित्र अधिक समग्र और सर्वांगीण संकल्पना है। त्र का जुड़ना पद को उदात्त, महान और सर्वोत्तम बना देता है। राष्ट्र = राजृ में ष्ट्रन् प्रत्यय लगते ही राष्ट्र हो जाता है। सबको साथ में लेकर गौरव का अनुभव करते हुए आलोकित होने का नाम है राष्ट्र। यह भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रीयता की धारणा है जिसका अनुवाद नेशन करना भाव केवल सीमित ही नहीं विपरीत कर देता है। 

एक जन, एक मन से एक ध्येय की और भिन्न भिन्न मार्गों से अग्रसर होते हुए एक अंतःकरण से सामूहिक और व्यक्तिगत गौरव, वैभव और ऐश्वर्य का अनुभव करता है तब राष्ट्र विश्वपरिवार में विराजित होता है। जब स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के कोलंबस सभागार में गर्व से हिंदू होने का उद्घोष किया तो भारत के कोने कोने में रहनेवाला प्रत्येक राष्ट्रांग उस स्वाभिमान का अनुभव कर रहा था। भारत पर शासन कर रहे ब्रिटिश रानी को ना जाननेवाले भी इस अनाम संन्यासी के बौद्धिक दिग्विजय को भारत के अश्वमेध पूर्ति सा जान रहे थे। आज भी वे अभिमंत्रित शब्द सुननेवाले प्रत्येक भारतीय अपने सब भेद भुलाकर रोमांचित होता है। सुभाष के जर्मन रेडियो से कहे शब्द ‘आमी सुभाष बोलछी’, बंकिम के ‘त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणी’, लाल बहादुर के ‘जय जवान जय किसान’ के श्रवण में, चांद्रयान के विक्रम की मृदु पदचाप की घोषणा में, कोरोना वैक्सीन को विश्व में भेजने के समाचार पढ़ने में और कोणार्क के समयातीत कालचक्र के सम्मुख विश्व के बलाढ्य देशों द्वारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के समवेत गान में भी वही रोमांच प्राप्त होता है। यह भारत की सर्वसमावेशक, सर्व मंगलकारी, अजातशत्रु राष्ट्रीयता है। हम ‘सर्वेषां अविरोधेण’ (किसी का विरोध मन में रखे बिना) ‘सदा वर्धिष्णु’ (नित्य विकसित) है। किसी पड़ौसी के प्रति शत्रुता हमारा परिचय नहीं है। अंततो गत्वा हमारा ध्येय तो उनके भी कल्याण का है जो हमारे प्रति द्वेष भाव रखते हैं।

यही एकत्वबोध और सनातन गौरव हम भारतवासियों द्वारा स्वाधीनता के बाद स्वयं को ही प्रदत्त संविधान में भी अभिव्यक्त हुआ है। अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी उतने ही आग्रह से चर्चा करनेवाला यह अद्वितीय संविधान है। संविधान सभा के ऋषियों के माध्यम से शाश्वत सनातन सत्य को ही लिपिबद्ध करता यह अभिलेख अधुनातन स्मृति ग्रन्थ ही है। परिचायिका (Preamble) में प्रत्येक राष्ट्रांग को बिना किसी भेद भाव के समानता, न्याय और स्वातंत्र्य का संपूर्ण अधिकार सुरक्षित किया है। साथ ही सबसे अपेक्षा की है कि हम बंधुता, देश की अखंडता और एकात्मता को बनाये रखेंगे। जैसे व्यक्ति के मौलिक अधिकार हैं वैसे ही राष्ट्र के भी है। लोकयात्रा में सामाजिक विभेद अथवा सांस्कृतिक दुर्लक्ष (neglect) के कारण पिछड़ गए बंधुओं को आरक्षण के द्वारा अधिक अवसर प्रदान कर उनका विकास सुनिश्चित करना भी भारतीय परिवार भाव का ही उद्घोष है। सबके समन्वित पोषण का ध्यान रखती माता जैसे रुग्ण अथवा अशक्त पुत्र/पुत्री को सहज अधिक दूध देती है उसी भाव का व्यावहारिक रूप यह सामाजिक न्याय का उपाय है। भौतिक समानता (Uniformity) नहीं, अनुपातिक समता (Equity) और उससे भी बढ़कर सामाजिक समरसता (Social Harmony) ही संविधानकर्ताओं का मानस है। हिंदुत्व का सर्वपंथसमभाव ही विदेशी प्रभाव में पंथनिरपेक्षता (Secularism) के नाम से परिचायिका में जोड़ा गया है। स्मरण रहें 42 वे संविधान संशोधन के समय तत्कालीन विधी मंत्री एल एम सिंघवी जी ने सेक्युलर शब्द का हिंदी अनुवाद धर्मनिरपेक्ष नहीं पंथनिरपेक्ष ही किया है। संविधान सभा की चर्चा को पढ़ते हैं तो और स्पष्ट होता हैं की संविधान निर्माताओं को बहुसंख्य भारतीयों के सर्वपंथसमभाव में पूर्ण विश्वास था। संविधान की प्रथम प्रति में समाविष्ट रामायण, महाभारत, बुद्ध जीवन आदि के चित्र ही नहीं संविधान के सभी प्रावधान ही इस सनातन राष्ट्र की कालजयी ऐतिहासिक यात्रा को प्रतिध्वनित करते हैं।

पंचमी की देवी देवसेनापति षड़ानन की माता स्कन्दमाता है। राष्ट्र के मृत्युंजय होने का ही यह प्रतीक है। जब जब धर्म सोयेगा तब तब सज्जनों के परिहार और दुष्टों के संहार हेतु मैं बारंबार अवतार लूँगा। ‘सम्भवामि युगे युगे’ के शाश्वत ईश्वरीय आश्वासन का मूल स्कन्दमाता की महिमा में है। तारकासुर के राज्य में जब धर्म संकट में आया तब सेनापति का प्रजनन, प्रशिक्षण कर वीरमाता ने गर्व से युद्ध में भेजा है। यही राष्ट्ररक्षा का संकल्प प्रत्येक राष्ट्रांग को इस नवरात्रि में ग्रहण करना है । 

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