-डाॅ. चन्द्र प्रकाश सिंह

​श्रद्धेय अशोक सिंहल जी की सौवीं जयन्ती है। उनके पावन सानिध्य में दो दशक तक रहने और उनके वैचारिक कार्यों में एक सहयोगी के रूप में कार्य करने का जो अवसर मुझे मिला, उससे मैं यही समझ सका कि उनके व्यक्तित्व का समग्र मूल्यांकन अत्यंत कठिन है। उन्हें किसी एक संगठन, संस्था या किसी आंदोलन विशेष के दायरे में समेट कर नहीं देखा जा सकता।वस्तुतः हिन्दू जीवनमूल्य, सनातन आदर्श और आध्यात्मिक चेतना की व्यापक परिधि में उनका व्यक्तित्व सागर की भाँति गहरा और विस्तृत था। जो भी व्यक्ति इन जीवनमूल्यों और उदात्त भावों से जुड़ा था, वह सीधे उनके हृदय में स्थान पाता था।​उनके व्यक्तित्व का प्रकटीकरण मुख्य रूप से तीन स्तरों पर देखने को मिलता है।

​संगठन और सीमाओं से परे सर्वसमावेशी भाव -
उन्होंने संस्था, संगठन, जाति या वर्ग के किसी भी भेद को कभी आड़े नहीं आने दिया। जो सनातन जीवनमूल्यों को धारण करता था, उसकी हर पीड़ा और समस्या अशोक जी की अपनी बन जाती थी।चाहे कोई संत-महात्मा हों या हिन्दू समाज का कोई भी वर्ग; वे सभी के सुख-दुःख में समान भाव से खड़े रहते थे। यह आत्मीय तत्परता केवल भारत तक सीमित नहीं थी, अपितु वैश्विक स्तर पर भी जब कभी किसी संत या हिन्दू समाज पर संकट आया, वे समाधान के लिए उतनी ही दृढ़ता से सक्रिय रहे।

​आध्यात्मिक साधना और सहज लोक-व्यवहार का संगम-
उनके चरित्र की सबसे विलक्षण बात यह थी कि वे आध्यात्मिक साधना की सर्वोच्च अवस्था में प्रतिष्ठित रहते हुए भी लोक-जीवन में पूरी तरह सहज और स्वाभाविक थे। वे बहुआयामी दृष्टि के धनी थे। ​कोई उन्हें हिन्दू समाज का नेतृत्वकर्ता मानता था, तो कोई संगठन का मुखिया। ​किसी के लिए वे संत और किसी के लिए अनन्य भक्त थे, तो उपेक्षितों और वंचितों के लिए सदैव चिन्ता करने वाले अपने अभिभावक थे, धर्मद्रोही तत्वों के सम्मुख वे एक निर्भीक और प्रभावी नायक थे।वे विद्वानों से लेकर साधारण जनसामान्य तक, प्रत्येक व्यक्ति के बौद्धिक स्तर पर उतरकर संवाद स्थापित करते थे।जनमानस की मनोदशा की इसी गहन समझ ने उन्हें राष्ट्रव्यापी ऐतिहासिक आंदोलनों का अप्रतिम पथ-प्रदर्शक बनाया।

​हिन्दू गौरव और एकात्मता के शिल्पी -
सम्पूर्ण दृष्टि से देखा जाए तो यह कहना किंचित भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि विगत दो शताब्दियों में स्वामी विवेकानन्द के पश्चात् व्यापकता के साथ हिन्दू समाज में स्वाभिमान और गौरव जगाने वाले वे अद्वितीय व्यक्तित्व थे।वैचारिक मतभेदों के बावजूद वे सम्पूर्ण समाज को 'हिन्दू' के रूप में एकाकार करने में सफल रहे। उनके समर्थक हों या वैचारिक विरोधी, कोई भी हिन्दू संस्कृति के प्रति उनके अटूट समर्पण को नकार नहीं सका। अपने विरोधियों के बीच भी उन्होंने जो सम्मान और श्रद्धा अर्जित की, और समाज ने उन्हें जो स्नेह दिया, वह लोक-जीवन में दुर्लभ है।​ऐसे युगद्रष्टा और हिन्दू चेतना के अग्रदूत को शत-शत नमन।

(जन्म-शती 27 सितम्बर 2026 पर विशेष संस्मरण)

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