देश के किसी भी पेट्रोल पंप पर आज जो ईंधन गाड़ी की टंकी में उतरता है, उसका पाँचवाँ हिस्सा दरअसल खाड़ी के किसी तेल के कुएँ से नहीं, बल्कि महाराष्ट्र के किसी गन्ने के खेत या उत्तर प्रदेश के मक्के के खलिहान से आता है। यह महज नारा नहीं, बल्कि पिछले ग्यारह वर्षों के सुनियोजित नीतिगत प्रयासों का परिणाम है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में E 20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर जिस तरह का शोर मचा है, उसमें माइलेज घटने, इंजन खराब होने, बीमा दावा खारिज होने और यहाँ तक कि टंकी में सीधे गन्ने का रस मिलाए जाने जैसे झूठे दावे भी तेजी से प्रसारित हुए हैं। इस बहस का बड़ा हिस्सा तथ्यों से अधिक अफवाहों पर टिका है। इसलिए E20 को आंकड़ों, वैज्ञानिक अध्ययनों और वाहन निर्माताओं के वास्तविक अनुभवों की कसौटी पर परखना आवश्यक है।

एथेनॉल ब्लेंडिंग को अक्सर हाल के वर्षों की 'जल्दबाजी' बताया जाता है, जबकि यह कार्यक्रम 2001 में पायलट परियोजना के रूप में शुरू हुआ था। 2006 में कई राज्यों में पाँच प्रतिशत मिश्रण (E 5) लागू हुआ, जनवरी 2013 में इसे राजपत्र में अधिसूचित किया गया और मई 2018 की राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति ने गन्ने के अलावा मक्का और अतिरिक्त अनाज को भी कच्चे माल में शामिल किया। 2013-14 तक मिश्रण का स्तर डेढ़ प्रतिशत से आगे नहीं बढ़ पाया था, क्योंकि अकेले गन्ने के दम पर पर्याप्त एथेनॉल पैदा करना संभव नहीं था।


निर्णायक मोड़ जून 2021 में आया, जब नीति आयोग ने वाहन निर्माताओं, तेल कंपनियों और कृषि विशेषज्ञों से विस्तृत राय के बाद 2025-26 तक की रोडमैप रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट ने E 10 अप्रैल 2022 तक और E 20 चरणबद्ध ढंग से 2023 से 2025 तक पूरे देश में उपलब्ध कराने की सिफारिश की। हकीकत यह है कि E 10 का लक्ष्य जून 2022 में और बीस प्रतिशत मिश्रण का राष्ट्रीय औसत 2025-26 में हासिल हुआ, मूल 2030 लक्ष्य से पूरे पाँच साल पहले। वर्ष-दर-वर्ष प्रगति 2020-21 में 8.1 प्रतिशत, 2021-22 में 10 प्रतिशत, 2022-23 में 12.1 प्रतिशत, 2023-24 में 14.6 प्रतिशत, 2024-25 में 19.2 प्रतिशत और 2025-26 के नवंबर-जून चक्र में 20 प्रतिशत रही। यह किसी अचानक लिए गए फैसले का नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण और नियामकीय तैयारी के साथ आगे बढ़ी प्रक्रिया का प्रमाण है।


इस नीति की जड़ में सीधा-सा तथ्य है कि भारत अपनी कुल कच्चे तेल की खपत का लगभग 88.5 प्रतिशत आयात करता है। प्रति बैरल आयातित तेल देश को वैश्विक कीमतों और भू-राजनीतिक संकटों के आगे बेबस बना देता है। फरवरी 2026 में शुरू हुए सैन्य संघर्ष के दौरान जब खाड़ी से गुजरने वाले लगभग साठ प्रतिशत एलपीजी आयात पर खतरा मंडराया, तब भी घरेलू आपूर्ति में कोई बड़ी बाधा नहीं आई, जिसका श्रेय काफी हद तक ऊर्जा विविधीकरण की रणनीति को जाता है। लोकसभा में 23 जुलाई 2026 को पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी के लिखित जवाब के मुताबिक, 2014-15 से अब तक इस कार्यक्रम ने लगभग 1.97 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचाई, करीब 316 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का प्रतिस्थापन किया और लगभग 952 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी लाई। इस नीति का महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष किसानों से जुड़ा है। जो पैसा पहले खाड़ी देशों को जाता था, अब उसका बड़ा हिस्सा भारतीय किसानों की जेब में पहुँच रहा है। आँकड़े बताते हैं कि इस कार्यक्रम के तहत किसानों को अब तक 1.66 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का सीधा भुगतान हो चुका है। गन्ने के बकाया भुगतान और मक्के की अनिश्चित लाभप्रदता को दूर करने में इस कार्यक्रम ने ठोस भूमिका निभाई है। किसानों के लिए 'अन्नदाता' के साथ-साथ 'ऊर्जादाता' बनने का यह मॉडल कृषि आय के विविधीकरण की मिसाल है।


अब उस दावे की बात, जिसे लेकर सबसे ज्यादा भ्रम फैलाया गया कि E 20 माइलेज बहुत घटा देता है। एथेनॉल की ऊष्मीय क्षमता पेट्रोल से करीब 30 प्रतिशत कम होती है, लेकिन इसका अर्थ माइलेज में सीधे तीस प्रतिशत की कमी नहीं है। मारुति सुजुकी के वरिष्ठ अधिकारी राहुल भारती ने 4 जुलाई 2026 की प्रेस वार्ता में स्पष्ट किया कि E 20 की ऊष्मीय क्षमता E10 से महज तीन से साढ़े तीन प्रतिशत ही कम है। बीस किलोमीटर प्रति लीटर देने वाली गाड़ी के लिए वास्तविक असर मुश्किल से 0.6 किलोमीटर प्रति लीटर बैठता है। टायर का दबाव सही न होना या सर्विसिंग में देरी इससे कहीं ज्यादा माइलेज पर असर डाल सकते हैं। सरकार के आधिकारिक आकलन में भी E 10 के लिए डिजाइन गाड़ियों में ईंधन दक्षता की गिरावट आमतौर पर तीन से पाँच प्रतिशत बताई गई है।


E 20 से इंजन को नुकसान की आशंका भी आधारहीन साबित हुई है। मारुति सुजुकी ने वित्त वर्ष 2025-26 में 2.84 करोड़ गाड़ियों की सर्विसिंग की, जिनमें डेढ़ करोड़ से ज्यादा गाड़ियाँ तीन साल से पुरानी और E 20 के लिए प्रमाणित नहीं थीं, फिर भी संक्षारण या पुर्जे की उम्र घटने का कोई मामला E 20 से नहीं जोड़ा जा सका। हीरो मोटोकॉर्प ने भी अपने सर्विस आँकड़ों के आधार पर नुकसान का कोई अतिरिक्त मामला नहीं पाया। सरकार के अनुसार E 19 - E 20 ईंधन ढाई साल से इस्तेमाल में है और बीस करोड़ से ज्यादा दोपहिया तथा तीन करोड़ से अधिक कारें इसी मिश्रण पर चल रही हैं, बिना किसी इंजन फेल होने की पुष्टि के। टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के कार्यकारी उपाध्यक्ष विक्रम गुलाटी ने कहा कि एथेनॉल नया ईंधन नहीं है और भारत में E20 का फैसला पुरानी गाड़ियों पर व्यापक परीक्षण के बाद लिया गया।

तकनीकी दृष्टि से एथेनॉल बेहतर दहन क्षमता वाला ईंधन है। इसका रिसर्च ऑक्टेन नंबर लगभग 108.5 है, जबकि सामान्य पेट्रोल का आँकड़ा 84.4 के आसपास है। बीस प्रतिशत मिश्रण से भारतीय पेट्रोल की प्रभावी ऑक्टेन रेटिंग करीब 95 तक पहुँचती है, जो हाई-कम्प्रेशन इंजनों के लिए बेहतर एंटी-नॉक गुण और स्मूथ कंबशन सुनिश्चित करती है। एथेनॉल की ज्यादा वाष्पीकरण-ऊष्मा इनटेक मैनिफोल्ड का तापमान घटाकर वायु-ईंधन मिश्रण को सघन बनाती है, जिससे बेहतर एक्सीलरेशन मिलता है। नीति आयोग के जीवनचक्र उत्सर्जन अध्ययन के अनुसार गन्ने से बनी एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में लगभग 65 प्रतिशत और मक्का आधारित एथेनॉल लगभग 50 प्रतिशत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करती है, जबकि E 20 का इस्तेमाल E 10 की तुलना में कार्बन उत्सर्जन में करीब तीस प्रतिशत तक कमी लाता है।

यह भी झूठ फैलाया गया कि E 20 से हुए नुकसान पर बीमा कंपनियाँ दावा खारिज कर देंगी। किसी बीमा कंपनी के एक स्क्रीनशॉट को गलत संदर्भ में पेश किया गया था, जबकि सियाम ने स्पष्ट किया कि मानक-अनुरूप E20 गाड़ियों की वारंटी और बीमा दोनों मान्य रहते हैं। यह भ्रम भी फैला कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में E 20 को 'प्रयोग' स्वीकार किया, जबकि मामला एथेनॉल खरीद अनुबंधों से जुड़ा था, E 20 की उपयोगिता से नहीं।

कुछ राजनीतिक दलों ने यह दुष्प्रचार भी किया कि केंद्र सरकार 'ट्रंप के दबाव' में अमेरिका से एथेनॉल मंगाकर इसे लोगों पर थोप रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 6 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में एथेनॉल आयात को लेकर कोई छूट या प्रतिबद्धता नहीं दी गई है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में बताया कि एथेनॉल को ट्रेड डील की टैरिफ-छूट सूची से बाहर रखा गया है। कालक्रम भी यही कहता है कि E 20 कार्यक्रम 2001 में शुरू हुआ और रोडमैप 2021 में तय हुआ। इसलिए यह मौजूदा ट्रेड डील से वर्षों पुरानी घरेलू नीति है। भारत की नीति अमेरिका की नकल नहीं, बल्कि अपनी आयात-निर्भरता घटाने और किसानों को बाजार देने की जरूरत से तय हुई है।
निष्कर्षतः E 20 को लेकर उठे ज्यादातर प्रश्न जायज चिंता से जन्मे हैं, लेकिन उनके उत्तर अफवाहों में नहीं, तथ्यों में मिलेंगे। ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की समृद्धि और स्वच्छ पर्यावरण - इन तीन स्तंभों पर टिकी यह नीति भारत के आत्मनिर्भर भविष्य की एक मजबूत आधारशिला है। इसलिए E 20 पर बहस होनी चाहिए, लेकिन वह आंकड़ों, वैज्ञानिक तथ्यों और वास्तविक अनुभवों के आधार पर होनी चाहिए, न कि बेबुनियाद दावों और डर फैलाने वाली अफवाहों के आधार पर।

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