समीक्षक - अमरेंद्र झा 'उन्मेष'

लौकिक जीवन में यदि कोई तत्त्व मनुष्य को सर्वाधिक प्रभावित करता है, तो वह है—‘दुःख’। यह दुःख किसी व्यक्ति की मानसिक निष्पत्ति का परिणाम हो सकता है; सांसारिक यशैषणा और वित्तैषणा से उत्पन्न हो सकता है; प्रारब्ध अथवा पूर्वजन्म के कर्मफल के रूप में प्राप्त हो सकता है; या फिर असफलता, उपेक्षा तथा जीवनानुकूल अवसरों के अभाव से भी जन्म ले सकता है। दुःख के कारण भिन्न-भिन्न हो सकते हैं, किंतु उसका प्रभाव प्रायः एक ही होता है—वह मनुष्य को भीतर तक झकझोर देता है। उसके मूक प्रहार से अनेक लोग टूट जाते हैं, जबकि कुछ लोग उसका सामना कर जीवन-पथ का नया आलोक खोज लेते हैं और स्वयं को पुनः अभिविन्यस्त कर लेते हैं।

दुःख से उबरकर अपनी राह तलाशने वाले अपेक्षाकृत कम होते हैं। इसके विपरीत, उसके आगोश में पड़कर अधिकांश लोग टूट-बिखर जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों में से अनेक आत्मघाती कदम उठाकर असमय काल-कवलित भी हो जाते हैं। उनके भीतर दुःख का सामना करने के लिए आवश्यक आत्मबल, साहस और विवेक का नितांत अभाव होता है।

ऐसे ही दुःख से साक्षात्कार कराने वाली, आत्मबल और साहस का संचार करने वाली तथा दुःख के व्यवहारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधारों की अनुसंधानपरक पड़ताल प्रस्तुत करने वाली कृति है—‘दुःख : उद्भव, कारण और निदान’। यह पुस्तक दुःख की प्रत्यक्ष चिकित्सा तो नहीं करती, किंतु यह अवश्य कहती है कि दुःख को समझे बिना उससे मुक्ति संभव नहीं। मेरे जैसे एक पाठक की अनुभूति है कि इस पुस्तक का गंभीर अध्ययन व्यक्ति को दुःख के प्रति एक नई दृष्टि प्रदान करता है। निःसंदेह, जिन पाठकों ने इस कृति का मनन किया होगा, वे भी इससे किसी-न-किसी स्तर पर सहमत होंगे।

यह पुस्तक कमलेश कमल के व्यापक अध्ययन, गहन अनुभव, वैचारिक अवगाहन तथा सामाजिक और वैयक्तिक विषमता-बोध की परिणति है। मनोवैज्ञानिकता की कसौटी पर परखी गई यह कृति सुधी पाठकों के समक्ष एक गंभीर जीवन-दर्शन के रूप में उपस्थित होती है। अनेक पुस्तकों के प्रणेता, उच्च चिंतक और प्रतिष्ठित भाषाविद् कमलेश कमल की वर्षों की तपःसाधना से प्रसूत यह पुस्तक केवल साहित्यिकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन सभी के लिए पठनीय है, जो दारुण दुःख से उबरने की राह तलाश रहे हैं अथवा अपने जीवन को अधिक संतुलित और सार्थक बनाना चाहते हैं।

यह उल्लेखनीय है कि कमलेश कमल केवल साहित्यकार ही नहीं, अपितु एक गंभीर भाषाविद् भी हैं। परिणामतः इस निबंध-संग्रह में प्रयुक्त कुछ शब्द कहीं-कहीं दुर्बोध प्रतीत हो सकते हैं, जो स्वाभाविक है। अनेक शब्द लेखक की कारयित्री प्रतिभा से निष्पन्न हैं। स्मर्तव्य है कि गहन साहित्यिक भावों के प्रस्तुतीकरण में समृद्ध शब्द-भंडार केवल भावों की सूक्ष्मता को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि उन्हें विशिष्ट प्रवाह और गरिमा भी प्रदान करता है।

अलबत्ता, पुस्तक पढ़ते समय भाषा की दुरूहता के बीच भी अर्थ-ग्रहण की प्रक्रिया में एक विशेष प्रकार की बौद्धिक उत्सुकता जाग्रत होती है। लेखक के स्व-निर्मित तथा अपेक्षाकृत अपूर्व-प्रयुक्त शब्द पाठकीय जिज्ञासा को उद्दीप्त करते हैं और उसे विचार के नए आयामों तक ले जाते हैं। यही कारण है कि लेखक के भाव, भाषा और गुंफित विचारों की तारतम्यता संपूर्ण निबंध-संग्रह में अनुस्यूत दिखाई देती है।

गौरतलब है कि यह पुस्तक दुःख में भटके हुए राही को सन्मार्ग पर तो लाती ही है, साथ ही उसे एक ऐसी आत्मानुभूति से भी परिचित कराती है, जो भीतर सुकून और संतुलन का संचार करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह पुस्तक एक ऐसी यात्रा है, जिसमें अनेक आलोकित पड़ाव आते हैं और जहाँ पहुँचकर दुःखी व्यक्ति शनैः-शनैः अपने दुःख से ऊपर उठने लगता है। संभवतः किसी सार्थक यात्रा का उद्देश्य भी यही होता है कि मनुष्य अपने तनाव और क्लेश से कुछ दूरी बनाकर आत्मशांति का अनुभव कर सके।

इस पुस्तक का परायण भी उसी प्रकार किया जाना चाहिए, जैसे कोई यात्री दुर्गम यात्रा में पड़ाव लेकर उसके सौंदर्य और रोमांच का अनुभव करता है। जिस प्रकार शैल-शिखरों और वन-प्रांतरों की कठिन यात्राएँ थकान के बावजूद आनंद प्रदान करती हैं, उसी प्रकार इस पुस्तक का क्रमशः और ठहर-ठहरकर किया गया अध्ययन इसके गंभीर भावबोध का वास्तविक सुख प्रदान करता है।व्यक्ति के दुःख के सांगोपांग पक्षों की पड़ताल इस पुस्तक में की गई है। पुस्तक का शीर्षक ही उसके वैचारिक फलक का परिचय देता है।

वस्तुतः यह कृति लेखक की बहुविस्तृत एवं प्रौढ़ ज्ञान-संपदा का प्रतिफल है। लेखक ने दुःख को विविध परिप्रेक्ष्यों में परखा है, उसकी जटिल अंतर्ग्रंथियों का सूक्ष्म अन्वेषण किया है तथा उसके उद्भव, कारण और निदान पर गंभीर संधान करते हुए अनेक व्यवहारिक दृष्टांतों के माध्यम से जीवनोपयोगी निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणार्थ, क्रोध पर विजय प्राप्त करने के संदर्भ में लेखक लिखते हैं—

“क्रोध की चर्चा के साथ ही, देखना समीचीन होगा कि सौम्य बनने की चेष्टा क्रोध पर जय करने का अमोघ अस्त्र है। इस दृष्टि से विचारणीय है कि भारत की आत्मा ही मूलतः सौम्य है और अतिवाद यहाँ कभी भी जन-स्वीकृति नहीं पा सका। यहाँ का नायक भी वही हो सकता है, जिसमें समंजन की अपार शक्ति हो, जो धीरोदात्त हो। समंजन की शक्ति और सौम्य रूप के एक बेहतरीन उदाहरण श्रीराम हैं। श्रीराम अगर भगवान् राम हैं तो उनमें यह महती क्रियात्मिका शक्ति है कि उन्होंने कुलीन, आमजन, वनवासी, निषाद ही नहीं, वानरदल पर्यन्त को साध लिया। इसलिए राम यहाँ पूज्य हुए।”

यहाँ एक तथ्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अनेक कवियों और लेखकों ने दुःख पर लिखा है, किंतु अधिकांश ने दुःख को केवल अभिव्यक्त किया है। दुःख के कारणों और उसके निदान पर इतना व्यापक, अनुसंधानपरक और बहुआयामी लेखन विरल ही दिखाई देता है। इस पुस्तक में 24 ललित किन्तु वैचारिक एवं मनोवैज्ञानिक निबंध हैं तथा 12 अन्य निबंध बुद्ध के दुःख-विमर्श और उनके दर्शन को आधुनिक संदर्भों में पुनर्पाठित करते हैं। लेखक ने यह दिखाने का सफल प्रयास किया है कि दुःख व्यक्ति को जिस रूप में प्राप्त होता है, उसका समाधान भी उसी के अनुरूप संदर्भों में खोजा जाना चाहिए।

पुस्तक की भाषा यत्र-तत्र किंचित् क्लिष्ट होते हुए भी सर्वग्राह्य है। व्यवहारिक दृष्टांतों, मनोवैज्ञानिक विश्लेषणों तथा जीवन-सापेक्ष उदाहरणों के कारण इसकी भावाभिव्यंजना सहज, प्रभावी और बोधगम्य बन पड़ी है। लेखक का शब्द-संयोजन, अभिव्यक्ति-विन्यास तथा वैचारिक अनुशासन अद्भुत है। अनेक स्थलों पर उनकी भाव-प्रस्तुति ‘गागर में सागर’ की उक्ति को चरितार्थ करती प्रतीत होती है। साहित्यानुरागियों, भाषा-मर्मज्ञों तथा जीवन-दर्शन के जिज्ञासुओं के लिए यह कृति एक रससिक्त, विचारोत्तेजक और आत्ममंथनकारी शब्द-यात्रा का अनुभव कराती है।

निस्संदेह, ‘दुःख : उद्भव, कारण और निदान’ केवल एक निबंध-संग्रह नहीं, बल्कि दुःख को समझने, स्वीकारने और उससे ऊपर उठने की एक गंभीर वैचारिक यात्रा है। यह पुस्तक पाठक को निराशा से आशा की ओर, क्लेश से समंजन की ओर और दुःख-बोध से जीवन-बोध की ओर अग्रसर करती है। समकालीन हिंदी साहित्य में यह कृति एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखी जानी चाहिए। विश्वास है कि आने वाले समय में भी यह पुस्तक पाठकों को मार्गदर्शन, आत्मबल और जीवन-दृष्टि प्रदान करती रहेगी।

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